कोर्ट ने सेक्टर-चार के दुकानदारों की याचिका खारिज की

Apr 07, 2026 11:13 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, गुड़गांव
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गुरुग्राम में हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (एचएसवीपी) ने सेक्टर-चार में पांच एससीओ को खाली करने का नोटिस दिया था। दुकानदारों ने इसके खिलाफ कोर्ट में याचिका दायर की, जिसे जिला अदालत ने खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि दुकानदारों को पहले एचएसवीपी में अपील करनी चाहिए थी।

कोर्ट ने सेक्टर-चार के दुकानदारों की याचिका खारिज की

गुरुग्राम, गौरव चौधरी। हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (एचएसवीपी) के द्वारा सेक्टर-चार में पांच एससीओ को खाली करने का दुकानदारों को नोटिस दिया गया था। नोटिस के खिलाफ दुकानदारों ने कोर्ट में याचिका दायर की गई थी। याचिका पर सुनवाई करते हुए जिला अदालत ने खारिज कर दिया है। अदालत ने माना कि दुकानदारों को एचएसवीपी के नोटिस के खिलाफ विभाग में समय पर अपील करनी चाहिए थी। यह आदेश सिविल जज दिपांशु सरकार की अदालत ने दिया है। एचएसवीपी की तरफ से तीन मार्च 2022 को एससीओ खाली करने का नोटिस दिया गया था। इसके बाद बूथ नंबर -तीन की तरफ से विजय, बूथ नंबर 2 की तरफ से बबीता बंसल , बूथ नंबर चार की तरफ से मनोज बंसल, बूथ नंबर -19 की तरफ से तेजपाल और बूथ नंबर 20 की तरफ से पुरुषोत्तम ने अदालत में याचिका दायर कर इसको रोकने की मांग की थी।

उनका कहना था कि यह बूथ उन्हें अलॉट किए गए थे। वह इसका किराया भी प्राधिकरण को देते है।प्राधिकरण की तरफ से अदालत में अधिवक्ता विवेक वर्मा ने दलील दी गई कि बूथ नंबर -दो को 26 अप्रैल 1973 को धर्मपाल के नाम पर 110 रुपये प्रति महीने के आधार पर अलॉट किया गया था। बूथ-तीन एक अप्रैल 1977 को 130 रुपये प्रति महीने के हिसाब से अलॉट किया गया था। विजय के नाम पर कोई बूथ अलॉट ही नहीं किया गया। बूथ नंबर-4 को 19 मार्च 1986 को 355 रुपये प्रति महीने से अलॉट किया गया। अलॉट करते हुए शर्त रखी गई थी एक महीने के नोटिस पर इसको खाली कराया जा सकता है। बूथ नंबर-19 जय प्रकाश को नौ फरवरी 1977 को 130 रुपये के हिसाब से अलॉट किया गया था। कुछ समय बाद उनकी मौत हो गई थी। बूथ नंबर 20 को 150 रुपये प्रति महीने से अलॉट किया गया था। प्राधिकरण की तरफ से दलील दी कि किसी भी याचिकाकर्ता ने प्राधिकरण में कोई भी दलील नहीं दी। नोटिस मिलने के कई महीने बाद अदालत में याचिका दायर की गई। अदालत ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद याचिका को खारिज करते हुए माना कि याचिकाकर्ता को नियमों के अनुसार पहले प्राधिकरण में अपना पक्ष रखना चाहिए था।

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