मंदिरों में तीसरे स्वरूप मां चंद्रघंटा की विशेष पूजा-अर्चना की
चैत्र नवरात्र:-भक्त देवी के मस्तक पर घंटे के आकार के अर्धचंद्र वाली प्रतिमा की अराधना -माता को लाल फूल और दूध से बनी मिठाई का भोग लगाकर सुख शांति मांग

गुरुग्राम, कार्यालय संवाददाता। मिलेनियम सिटी में शनिवार को चैत्र नवरात्र में दुर्गा के तीसरे स्वरूप मां चंद्रघंटा की विशेष पूजा-अर्चना की गई। प्रमुख मंदिरों में सुबह और शाम तक श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी। नवरात्र के व्रत रखने वाले श्रद्धालु छोटी देवी और बड़ी देवी मंदिर में माथा टेकने के लिए पहुंचे। शीतला माता मंदिरों में दर्शन करने वाले श्रद्धालुओं की संख्या अधिक रहीं। सुबह से ही मंदिरों में दर्शन के लिए उमड़े और मंत्र के साथ माता को सिंदूर चढ़ाया। भक्त देवी के मस्तक पर घंटे के आकार के अर्धचंद्र वाली प्रतिमा की अराधना की। माता को लाल फूल और दूध से बनी मिठाई का भोग लगाकर सुख शांति मांगी।
शीतला माता मंदिर के पुजारी देवानंद शास्त्री ने बताया कि नवरात्र पर्व के दौरान मां दुर्गा अलग-अलग स्वरूपों की साधना की जाती है। मैया के सिर पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है। इस वजह से इन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। देवी चंद्रघंटा का वाहन सिंह है। इनकी 10 भुजाएं और तीन आंखें हैं। आठ हाथों में खड्ग, बाण आदि दिव्य अस्त्र-शस्त्र हैं।मंदिरों में दर्शन करने के लिए पहुंचे श्रद्धालु:चैत्र नवरात्र के तीसरे दिन शहर के प्रमुख मंदिरों में सुबह से ही श्रद्धालुओं की दर्शन करने को लेकर भीड़ देखने को मिली। इसमें प्राचीन घंटेश्वर मंदिर, सिद्धेश्वर मंदिर, गौरी शंकर मंदिर, डीएलएफ स्थित साईं मंदिर, चिंतपूर्णी मंदिर, छोटी माता मंदिर और राजीव नगर के गुफा वाला मंदिर समेत अन्य प्रमुख मंदिर शामिल रहे। इन मंदिरों में सुबह से शाम तक भक्तों का दर्शन करने को आना जाना लगा रहा।अलग-अलग राज्यों से आते हैं श्रद्धालु:शक्तिपीठ शीतला माता मंदिर काफी प्रसिद्ध है। यहां हर साल भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिलती है। चैत्र नवरात्र के मौके पर देश के अलग-अलग राज्यों से श्रद्धालु माता शीतला के दर्शन करने के लिए पहुंचे। ऐसे में शीतला माता मंदिर में श्रद्धालुओं को किसी तरह की समस्या न हो। इसको लेकर मंदिर प्रशासन की ओर से तमाम तैयारियां की गई है। सुरक्षा व्यवस्था को देखते हुए मंदिर परिसर में पुलिस के जवानों की संख्या बढ़ा दी गई है।गुरुग्राम मे सिद्धेश्वर मंदिर का इतिहास :सेवादास ने बरगद के पेड़ के नीचे बैठकर तपस्या कर सोहना चौक स्थित सिद्धेश्वर मंदिर की स्थापना की थी। इस मंदिर का इतिहास 109 साल से भी अधिक पुराना है। आजादी से काफी पहले मंदिर अस्तित्व में था। लेकिन मंदिर की स्थापना कब हुई। के बारे में किसी को सही जानकारी नहीं है। लेकिन शहर के प्राचीन मंदिरों में इस सिद्धेश्वर मंदिर का नाम भी शुमार है।मंदिर के मुताबिक आजादी से पहले मंदिर को कुटिया वाले बाब के नाम से जाना जाता था। 109 साल पहले सिद्धी प्राप्त महंत यहां आए थे। उनका नाम सेवादास बताया जा रहा है। वह यहां पर मौजूद बड़ के पेड़ के नीचे बैठकर तपस्या करते थे। उन्होंने ही मंदिर के शिवलिंग की स्थापना की थी। धीरे-धीरे मंदिर से भक्तों का आजा-जाना बढ़ता चला गया। श्रद्धालुओं की भीड़ को देखकर मंदिर कमेटी बनाई गई। मंदिर में श्रद्धालुओं का जुड़ाव बढ़ने की वजह से मंदिर का विकास हुआ। यहां पर राधा कृष्ण, श्याम बाबा, शिव परिवार समेत विभिन्न प्रकृति के देवों की चुकी है। इसमें महालक्ष्मी, शनि देव व नवग्रह के भव्य दरबार भी है। मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ पूरे साल खासतौर नत्ररात्र के समय भीड़ रहती है। सुबह आठ बजे से दस बजे तक हवन यज्ञ और शाम को भजन कीर्तन होता है। नवरात्र के समय श्रद्धालुओं को बड़े पर्दे पर रामानंद सागर कृत रामायण दिखायी जाती है।
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