
ग्रेटर नोएडा का ग्रैंड वेनिस प्रोजेक्ट रहने लायक नहीं, इन्वेस्टर्स का 1000 करोड़ फंसा; सुप्रीम कोर्ट
सरल शब्दों में कहें- ये रहने लायक नहीं है। रिपोर्ट में बताया गया है कि प्रोजेक्ट का निर्माण कार्य अधूरा है। इसके चलते यहां बुनियादी जरूरतों की घोर कमी है। जबकि इनवेस्टर्स बीते 15 साल से अधिक समय से अपने ऑफिस, दुकान और होटल यूनिट का इंतजार कर रहे हैं।
ग्रेटर नोएडा के ग्रैंड वेनिस प्रोजेक्ट को सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित पैनल ने ऑक्यूपेंसी के लिए अनफिट करार दिया है। सरल शब्दों में कहें- "ये रहने लायक नहीं है।” रिपोर्ट में बताया गया है कि प्रोजेक्ट का निर्माण कार्य अधूरा है। इसके चलते यहां बुनियादी जरूरतों की घोर कमी है। जबकि इनवेस्टर्स बीते 15 साल से अधिक समय से अपने ऑफिस, दुकान और होटल यूनिट का इंतजार कर रहे हैं।
इन्वेस्टर्स का 1000 करोड़ रुपये फंसा
पैनल के मुताबिक, प्रोजेक्ट में सीढ़ियां, लिफ्ट, एयर कंडीशनिंग, टॉयलेट और जरूरी लीगल मंजूरियां तक पूरी नहीं हैं। एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक- पेश की गई रिपोर्ट में डेवलपर भासिन इंफोटेक एंड इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड (BIIPL) की बड़ी लापरवाही को जिम्मेदार ठहराया गया है। हालांकि, प्लॉट नंबर SH3, सूरजपुर साइट-4 में ग्राउंड फ्लोर पर एक मॉल फिलहाल चालू है, लेकिन बाकी सभी ढांचे अधूरे पड़े हैं। इस प्रोजेक्ट में इन्वेस्टर्स के करीब 1,000 करोड़ रुपये फंसे हुए हैं।
90% भुगतान के बाद भी कब्जा नहीं मिला
पैनल ने बताया कि डेवलपर ने 2010 में 6,500 से 10,000 रुपये प्रति वर्ग फुट के प्रीमियम रेट पर यूनिट्स बेची थीं। लगभग 75 प्रतिशत अलॉटीज ने कुल रकम का 90% तक डाउन पेमेंट कर दिया था, लेकिन अब तक उन्हें यूनिट्स नहीं मिली हैं। कब्जा न मिलने से नाराज निवेशकों ने BIIPL और उसके प्रमोटर सतींदर सिंह भासिन के खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज कराए हैं।
15वीं मंजिल गायब, यूनिट्स की पहचान भी मुश्किल
इस प्रोजेक्ट की तकनीकी जांच सीपीडब्ल्यूडी के पूर्व स्पेशल डीजी अनंत कुमार ने की। इन्होंने साइट पर के लिए एक्सेप्ट किए गए नक्शों से बड़े पैमाने पर खामियां पाई हैं। रिपोर्ट में बताया गया कि प्रोजेक्ट में 15वीं मंजिल का निर्माण अब तक हुआ ही नहीं है, जबकि 9वीं से 14वीं मंजिल के बीच पार्टिशन वॉल नहीं होने के कारण अलग-अलग यूनिट्स की पहचान तक संभव नहीं है।
न पूरा हुआ, न लीगल मानकों पर खरा उतरता
इसके अलावा, 25 जुलाई 2025 को मिली फायर क्लियरेंस सिर्फ 57.15 मीटर ऊंचाई (आठवीं मंजिल) तक ही वैध है, जबकि पूरी इमारत 15 मंजिल की है। अनंत कुमार ने पैनल को बताया कि मौजूदा हालात में यह प्रोजेक्ट न तो पूरा माना जा सकता है और न ही लीगल मानकों पर खरा उतरता है।
कोर्ट का दरवाजा खटखटाने को मजबूर इन्वेस्टर्स
पैनल की यह रिपोर्ट उन हजारों इन्वेस्टर्स के लिए एक और झटका है, जो सालों से अपने पैसे और प्रोजेक्ट के पूरे होने की उम्मीद लगाए बैठे हैं। अब सभी की नजरें सुप्रीम कोर्ट के अगले आदेश पर टिकी हैं।





