टैक्सी में टक्कर लगी तो ड्राइवरों ने लड़की को घेरा, 37 मिनट बाद पहुंची गुरुग्राम पुलिस; देरी पर उठे सवाल

पीटीआई, गुरुग्राम
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गुरुग्राम में टैक्सी ड्राइवरों के एक ग्रुप ने कथित तौर पर कार में सफर कर रही एक लड़की को परेशान किया और उसके ड्राइवर पर हमला किया। लड़की की मां का आरोप है कि बार-बार फोन करने के बावजूद पुलिस देरी से मौके पर पहुंची और कोई कार्रवाई भी नहीं की।

cab drivers

गुरुग्राम में टैक्सी ड्राइवरों के एक ग्रुप ने कथित तौर पर कार में सफर कर रही एक लड़की को परेशान किया और उसके ड्राइवर पर हमला किया। लड़की की मां का आरोप है कि बार-बार फोन करने के बावजूद पुलिस देरी से मौके पर पहुंची और कोई कार्रवाई भी नहीं की।

गुरुग्राम के सोहना रोड पर एक प्राइवेट कार और एक कैब के बीच टक्कर होने के बाद टैक्सी ड्राइवरों के एक ग्रुप ने कथित तौर पर कार में सफर कर रही एक लड़की को परेशान किया। कैब ड्राइवरों ने लड़की के ड्राइवर पर हमला भी किया। लड़की की मां ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट के जरिए इस पूरी घटना के बारे में बताया। शुक्रवार को एक सीनियर अधिकारी ने बताया कि इस मामले का संज्ञान लेते हुए पुलिस ने जांच शुरू कर दी है। सामने आने वाले तथ्यों के आधार पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

टक्कर के बाद टैक्सी ड्राइवरों ने घेरा

पोस्ट में महिला ने बताया कि उनकी बेटी 12वीं क्लास की छात्रा है। वह अपनी प्राइवेट कार में सफर कर रही थी तभी उसकी टक्कर एक टैक्सी से हो गई। इसके बाद कथित तौर पर टैक्सी ड्राइवरों के एक ग्रुप ने उसकी बेटी की कार को घेर लिया और बार-बार उसका दरवाजा खोलने की कोशिश की। टैक्सी ड्राइवरों ने कथित तौर पर लड़की के ड्राइवर के साथ मारपीट भी की।

पुलिस को 20 बार फोन किया

डर के मारे लड़की ने खुद को कार के अंदर बंद कर लिया और रोते हुए अपनी मां से मदद मांगी। उसने अपनी मां को इस घटना के बारे में बताया। महिला ने आरोप लगाया कि उन्होंने पुलिस को करीब 20 बार फोन किया, लेकिन पुलिस टीम ने तुरंत जवाब देने के बजाय 37 मिनट बाद मौके पर पहुंची। इस दौरान उनकी बेटी को टैक्सी ड्राइवरों की बदतमीजी झेलने के लिए छोड़ दिया। महिला ने बताया कि पुलिस के मौके पर पहुंचने के बाद भी टैक्सी ड्राइवरों ने बदतमीजी करना जारी रखा। आखिरकार, उनकी बेटी को 2000 रुपये देकर समझौता करने पर मजबूर होना पड़ा।

पुलिस टीम 37 मिनट बाद मौके पर पहुंची

लड़की की मां ने आरोप लगाया कि मेरी बेटी ने शाम 5:02 बजे पुलिस को पहली कॉल की। पुलिस ने शाम 5:10 बजे कॉल करके उसकी लोकेशन पूछी। जब उसे कोई मदद नहीं मिली तो उसने मुझे वीडियो कॉल करके इस बारे में बताया। इसके बाद हम दोनों ने कंट्रोल रूम में 20 से ज्यादा कॉल किए, लेकिन पुलिस टीम 37 मिनट बाद मौके पर पहुंची। लड़की की मां ने गुरुवार शाम 6:30 बजे सोशल मीडिया पर इस कथित घटना के बारे में पोस्ट किया। इसके बाद पुलिस की सोशल मीडिया टीम ने उनसे संपर्क किया और कहा कि वे इस मामले की जांच करेंगे।

इमरजेंसी सिस्टम की नाकामी

एक्स पर एक यूजर ने इस घटना पर लिखा कि सच में यह बहुत ही परेशान करने वाली बात है। जब कोई बच्चा घिरा हुआ हो और उसे डराया-धमकाया जा रहा हो, ऐसे में 37 मिनट तक इंतजार करना। यह गुरुग्राम में दिनदहाड़े इमरजेंसी सिस्टम की एक ऐसी नाकामी है, जिसे बिल्कुल भी स्वीकार नहीं किया जा सकता। हमें 10 मिनट के अंदर डिलीवरी मिल जाती है, लेकिन पुलिस को पहुंचने में लगभग 40 मिनट लग जाते हैं।

मामले की जांच चल रही है

एक सीनियर पुलिस अधिकारी ने कहा कि यह मामला हमारी सोशल मीडिया टीम के संज्ञान में आया है। इस मामले की जांच चल रही है। इस बात का भी पता लगाया जा रहा है कि पुलिस टीम को घटनास्थल पर पहुंचने में इतना ज्यादा समय क्यों लगा। जांच में जो भी तथ्य सामने आएंगे, उनके आधार पर कार्रवाई की जाएगी।

Subodh Kumar Mishra

लेखक के बारे में

Subodh Kumar Mishra

सुबोध कुमार मिश्रा पिछले 19 साल से हिंदी पत्रकारिता में योगदान दे रहे हैं। वर्तमान में वह 'लाइव हिन्दुस्तान' में स्टेट डेस्क पर बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। दूरदर्शन के 'डीडी न्यूज' से इंटर्नशिप करने वाले सुबोध ने पत्रकारिता की विधिवत शुरुआत 2007 में दैनिक जागरण अखबार से की। दैनिक जागरण के जम्मू एडीशन में बतौर ट्रेनी प्रवेश किया और सब एडिटर तक का पांच साल का सफर पूरा किया। इस दौरान जम्मू-कश्मीर को बहुत ही करीब से देखने और समझने का मौका मिला। दैनिक जागरण से आगे के सफर में कई अखबारों में काम किया। इनमें दिल्ली-एनसीआर से प्रकाशित होने वाली नेशनल दुनिया, नवोदय टाइम्स (पंजाब केसरी ग्रुप), अमर उजाला और हिन्दुस्तान जैसे हिंदी अखबार शामिल हैं। अखबारों के इस लंबे सफर में खबरों को पेश करने के तरीकों से पड़ने वाले प्रभावों को काफी बारीकी से समझने का मौका मिला।

ज्यादातर नेशनल और स्टेट डेस्क पर काम करने का अवसर मिलने के कारण राजनीतिक और सामाजिक विषयों से जुड़ी खबरों में दिलचस्पी बढ़ती गई। कई लोकसभा और विधानसभा चुनावों की खबरों की पैकेजिंग टीम का हिस्सा रहने के कारण भारतीय राजनीति के गुणा-भाग को समझने का मौका मिला।

शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो सुबोध ने बीएससी (ऑनर्स) तक की अकादमिक शिक्षा हासिल की है। साइंस स्ट्रीम से पढ़ने के कारण उनके पास चीजों को मिथ्यों से परे वैज्ञानिक तरीके से देखने की समझ है। समाज से जुड़ी खबरों को वैज्ञानिक कसौटियों पर जांचने-परखने की क्षमता है। उन्होंने मास कम्यूनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा किया है। इससे उन्हें खबरों के महत्व, खबरों के एथिक्स, खबरों की विश्वसनीयता और पठनीयता आदि को और करीब से सीखने और लिखने की कला में निखार आया। सुबोध का मानना है कि खबरें हमेशा प्रमाणिकता की कसौटी पर कसा होना चाहिए। सुनी सुनाई और कल्पना पर आधारित खबरें काफी घातक साबित हो सकती हैं, इसलिए खबरें तथ्यात्मक रूप से सही होनी चाहिए। खबरों के चयन में क्रॉस चेकिंग को सबसे महत्वपूर्ण कारक मानने वाले सुबोध का काम न सिर्फ पाठकों को केवल सूचना देने भर का है बल्कि उन्हें सही, सुरक्षित और ठोस जानकारी उपलब्ध कराना भी है।

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