‘FIR में रेप और पोक्सो क्यों नहीं?’ गाजियाबाद पुलिस की लापरवाही पर भड़का SC, आरोपी के ‘एनकाउंटर’ पर ये कहा

Mohit पीटीआई, गाजियाबाद
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सुनवाई के दौरान सीजेआई ने कहा कि 'कथित अपराध का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा दो कथित प्राइवेट अस्पताल और स्थानीय पुलिस की लापरवाही और संवेदनहीन रवैया है।' 16 मार्च को, आरोपी पड़ोसी ने कथित तौर पर चॉकलेट दिलाने के बहाने बच्ची को फुसलाया था।

‘FIR में रेप और पोक्सो क्यों नहीं?’ गाजियाबाद पुलिस की लापरवाही पर भड़का SC, आरोपी के ‘एनकाउंटर’ पर ये कहा

सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद में चार साल की बच्ची के रेप और मर्डर के मामले में जांच को लेकर गाजियाबाद पुलिस को जमकर फटकार लगाई और पुलिस कमिश्नर सहित वरिष्ठ अधिकारियों को 13 अप्रैल को केस रिकॉर्ड के साथ तलब किया है। कोर्ट ने इसपर भी ध्यान दिया कि मामले में आगे की जांच के लिए कोर्ट की निगरानी में ही एसआईटी या फिर एक केंद्रीय जांच एजेंसी की जरूरत है।

सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और विपुल एम पंचोली की बेंच ने शुक्रवार को सुनवाई के दौरान पीड़िता के पिता, जो एक दिहाड़ी मजदूर हैं, की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील एन हरिहरन की दलीलों पर ध्यान दिया और मामले में राज्य पुलिस द्वारा अबतक की गई जांच के तरीके पर नाराजगी जाहिर की। वहीं हरिहरन ने मामले में न्यायिक हस्तक्षेप का आग्रह किया।

सुनवाई के दौरान सीजेआई ने कहा कि 'कथित अपराध का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा दो कथित प्राइवेट अस्पताल और स्थानीय पुलिस की लापरवाही और संवेदनहीन रवैया है।'

हरिहरन ने कोर्ट को बताया, ‘पुलिस इस मामले की जांच सिर्फ हत्या के पहलू से करना चाहती थी। पुलिस रिपोर्ट में लिखा गया है कि जब तक मामला उनके (पुलिस) के पास आया तब तक बच्ची की मौत हो चुकी थी। जबकि एक वीडियो रिकॉर्डिंग है जिसमें बच्ची जीवित दिख रही है। पड़ोसियों को नोटिस दिया गया है कि वे शांति भंग कर रहे हैं। कृप्या आप भी वीडियो देखें।’

'एफआईआर में रेप-पोक्सो नहीं जोड़ा'

वहीं बेंच ने कहा कि पीड़ित परिवार का दुख उस समय और बढ़ गया जब इस मामले की सूचना स्थानीय पुलिस को दी गई। संज्ञान लेने के बजाय, याचिकाकर्ता और परिवार के सदस्यों के साथ मारपीट की गई। उन्हें घटना के बारे में चुप रहने के लिए कहा गया। एफआईआर अगले दिन यानी 17 मार्च को दर्ज की गई। वहीं बेंच ने इस बात पर भी गौर किया कि आरोपी के खिलाफ पोक्सो के तहत कोई अपराध या रेप का आरोप एफआईआर में नहीं जोड़ा गया, जबकि मामला स्पष्ट रूप से यौन उत्पीड़न से जुड़ा लग रहा था। ऐसा लगता है कि जब अपराध की गंभीरता का एहसास हुआ, तब जाकर आरोपी को 18 मार्च को पकड़ा और गिरफ्तार किया गया।'

बेंच ने इसके साथ ही पुलिस के 'एनकाउंटर' की कहानी पर भी संदेह जताते हुए कहा कि आरोपी जब पुलिस टीम को घटनास्थल पर ले जा रहा था तो उसके पास बंदूक कैसे आई। बेंच ने सवाल किया, 'हिरासत में मौजूद व्यक्ति के पास बंदूक कैसे थी? आप कह रहे हैं कि उसे रुमाल की पहचान कराने के लिए ले जाया गया था और फिर उसने पुलिस पर गोली चला दी और इसके बाद पुलिस ने उस पर गोली चलाई। कृपया पुलिस की रिपोर्ट को ध्यान से पढ़ें।'

वहीं सरकारी वकील की ओर से जांच रिपोर्ट पूरी होने के दावे और उसे स्वीकार करने से मना करते हुए सीजेआई ने कहा कि आप यह सब हेरा-फेरी करते हैं और उसके बाद चार्जशीट दाखिल करते हैं।

अगली सुनवाई सोमवार को होगी

कोर्ट ने कहा, ‘हम इस बात से संतुष्ट हैं कि इस मामले में कोर्ट की निगरानी में एक समय-सीमा के भीतर एसआईटी या किसी केंद्रीय एजेंसी से जांच कराने की जरूरत है। नोटिस जारी किया जाए। उत्तर प्रदेश सरकार के वकील को इसकी कॉपी दी जाए और स्टेटस रिपोर्ट फाइल की जाए। गाजियाबाद के पुलिस कमिश्नर और नंदग्राम के एसएचओ व्यक्तिगत रूप से (कोर्ट में) मौजूद रहें। उन प्राइवेट अस्पतालों को भी नोटिस भेजा जाए जिन्होंने बच्ची को भर्ती करने से मना कर दिया था। इस मामले की अगली सुनवाई सोमवार को होगी।’

क्या हुआ था बच्ची के साथ?

बता दें कि 16 मार्च को, आरोपी पड़ोसी ने कथित तौर पर चॉकलेट दिलाने के बहाने बच्ची को फुसलाया था। जब बच्ची वापस नहीं लौटी, तो उसके पिता ने ढूंढने की कोशिश की और उसे खून से लथपथ बेहोशी की हालत में पाया। कोर्ट ने इस बात पर गहरा दुख जताया कि गाजियाबाद के दो निजी अस्पतालों ने खून से लथपथ बच्ची को भर्ती करने से मना कर दिया था और अंत में एक सरकारी अस्पताल में उसे मृत घोषित कर दिया गया।

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