UPSC से छल! फर्जी एक्सपीरियंस सर्टिफिकेट से पाई सरकारी जॉब, गजेटेड अफसर बन 25 साल काटी मौज; ऐसे खुली पोल
दिल्ली की एक कोर्ट ने फर्जी एक्सपीरियंस सर्टिफिकेट के सहारे यूपीएससी को चकमा देकर सरकारी नौकरी हासिल करने वाले शख्श को दोषी करार दिया है। आरोपी गजेटेड अफसर बनकर 25 साल तक मौज काटता रहा, लेकिन बाद में वही फर्जी एक्सपीरियंस सर्टिफिकेट उसके खिलाफ बड़ा सबूत बन गया।

कहते हैं कि झूठ की बुनियाद पर खड़ा किया गया महल चाहे कितना भी आलीशान क्यों न हो, एक न एक दिन वह ढह ही जाता है। दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट से एक ऐसा ही मामला सामने आया है, जहां एक शख्स ने फर्जी एक्सपीरियंस सर्टिफिकेट के दम पर न सिर्फ संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) जैसी प्रतिष्ठित संस्था को चकमा दे दिया, बल्कि 25 साल तक केंद्र में एक राजपत्रित (गजेटेड) अधिकारी के रूप में नौकरी भी करता रहा। अब वही सर्टिफिकेट उसकी दोषसिद्धि का सबसे बड़ा आधार बन गया।
अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट मयंक गोयल की अदालत ने अपने 198 पन्नों के फैसले में आरोपी गौरव मलिक को दोषी करार दिया है। मामले की शुरुआत वर्ष 2000 में हुई थी। उस दौरान संघ लोक सेवा आयोग ने कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय के तहत प्रशिक्षण महानिदेशालय (डीजीटी) में ‘प्रशिक्षण अधिकारी (बिजनेस सर्विसेज)’ के पद पर भर्ती निकाली थी। इस पद के लिए एमबीए की डिग्री के साथ-साथ किसी उद्योग या संस्थान में दो साल का एक्सपीरियंस होना अनिवार्य था।
कंपनी के रजिस्ट्रेशन से पहले का बनाया सर्टिफिकेट
आरोपी के पास योग्यता तो थी, लेकिन एक्सपीरियंस का पेंच फंस रहा था। इसके लिए उसने शातिर रास्ता चुना और भोपाल स्थित ‘कृष्णा इंजीनियरिंग कंपनी’ के लेटरहेड पर फर्जी एक्सपीरियंस सर्टिफिकेट तैयार करवा लिया। इस सर्टिफिकेट में दावा किया गया कि गौरव साल 1993 से वहां सेल्स मैनेजर के रूप में कार्यरत था, जबकि हकीकत यह थी कि कंपनी का रजिस्ट्रेशन ही साल 1995 में हुआ था। जब वह इंटरव्यू में शामिल हुआ, तो उसने इन्हीं फर्जी कागजातों को पेश किया। कागजों का सतही तौर पर मूल प्रतियों से मिलान कर गौरव को योग्य मानकर नियुक्ति की सिफारिश कर दी गई। आरोपी की 2001 में नोएडा के नेशनल वोकेशनल ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट में राजपत्रित अधिकारी (ग्रुप बी) के तौर पर जॉइनिंग हुई थी।
गुमनाम शिकायत पर जांच
वर्ष 2011-12 में मंत्रालय को मिली एक शिकायत के आधार पर शुरू हुई जांच में जब संबंधित पते पर सत्यापन किया गया, तो ‘कृष्णा इंजीनियरिंग कंपनी’ का कोई अस्तित्व नहीं मिला। मामला गंभीर होने पर वर्ष 2016 में जांच सीबीआई को सौंपी गई। जांच में कंपनी के मालिक राकेश अग्रवाल ने अदालत में स्पष्ट बयान दिया कि गौरव मलिक नाम का कोई व्यक्ति उनके यहां कभी कार्यरत नहीं रहा।
नष्ट कर दिए थे सबूत
सीबीआई ने जांच के दौरान गौरव से उन मूल एक्सपीरियंस सर्टिफिकेट की मांग की, जिन्हें दिखाकर उसने नौकरी हासिल की थी। गौरव ने कहा कि वह मूल दस्तावेज खो चुके हैं। जांच में स्पष्ट हो गया कि गौरव ने खुद ही जाली दस्तावेज नष्ट कर दिया ताकि फॉरेंसिक जांच में उसका झूठ न पकड़ा जा सके।


