गुरुग्राम में विस्थापित कोटे के प्लॉटों के आवंटन में फर्जीवाड़ा, 2 पूर्व IAS समेत 4 पर केस
गुरुग्राम में विस्थापित कोटा के तहत दो बेशकीमती प्लॉटों के अवैध आवंटन का मामला सामने आया है। इस मामले में दो पूर्व आईएएस अधिकारियों समेत चार लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया गया है। आरोप है कि एचएसवीपी के अधिकारियों ने फर्जीवाड़े और पद का दुरुपयोग कर सरकार को करोड़ों रुपए का नुकसान पहुंचाया।

हरियाणा राज्य सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने गुरुग्राम के सेक्टर-39 और सेक्टर-40 में ओस्टिज कोटे (विस्थापित कोटा) के तहत दो बेशकीमती प्लॉटों के अवैध आवंटन का पर्दाफाश किया है। हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (एचएसवीपी) के अधिकारियों ने फर्जीवाड़े और पद का दुरुपयोग कर सरकार को करोड़ों रुपये का नुकसान पहुंचाया । इस मामले में दो पूर्व आईएएस अधिकारी समेत नौ लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है।
इस पूरे घोटाले में उच्च न्यायालय के फैसलों, सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों और विभाग के खुद के नियमों को ताक पर रख दिया गया। एसीबी ने मामले की जांच के बाद दो अलग-अलग एफआईआर दर्ज की है। इनमें एचएसवीपी के तत्कालीन मुख्य प्रशासक और सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी डी. सुरेश, तत्कालीन प्रशासक व सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी गिरीश कुमार, तत्कालीन जिला अटॉर्नी अनिल कुमार अग्रवाल और अधीक्षक नितिन हुड्डा समेत नौ लोगों को आरोपी बनाया गया है। मामले की शुरुआत जून 2024 में कन्हई गांव निवासी द्वारा दी गई एक शिकायत से हुई।
सीधा अलॉटमेंट लेटर जारी करवा दिया
जांच में सामने आया कि सिविल लाइंस निवासी जगदीश चंद्र गुप्ता को ओस्टिज कोटे के तहत ड्रॉ में सेक्टर-40 में 200 वर्ग मीटर का प्लॉट नंबर 833ए निकला। जमीन के अन्य सह-मालिकों से अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) न दे पाने के कारण उन्हें अलॉटमेंट लेटर जारी नहीं किया गया। सात सितंबर 2015 को जगदीश चंद्र की पत्नी सुभाष रानी ने पति की मृत्यु की सूचना देते हुए प्लॉट अपने नाम करने की मांग की, जिसे अधिकारियों ने खारिज कर दिया। 15 मई 2019 को डिपार्टमेंटल लिटिगेशन कमेटी की बैठक में तत्कालीन मुख्य प्रशासक डी.सुरेश, प्रशासक गिरीश कुमार और डीए अनिल कुमार अग्रवाल ने कथित तौर पर आपस में सांठगांठ की। 24 मई 2019 को पंचकूला अर्बन ब्रांच के अधीक्षक नितिन हुड्डा के माध्यम से सीधा अलॉटमेंट लेटर जारी करवा दिया।
पत्र मिलते ही भूखंड बेच दिए
एसीबी की जांच में यह गंभीर तथ्य सामने आया है कि दोनों मामलों में जैसे ही आरोपी सुभाष रानी और श्याम सिंह को अलॉटमेंट लेटर मिले, उन्होंने एक साजिश के तहत तुरंत इन संपत्तियों को दूसरे व्यक्तियों के नाम ट्रांसफर कर दिया। एसीबी के अनुसार यदि केवल सेक्टर-40 के प्लॉट को ई-नीलामी के जरिए बेचा जाता, तो राज्य सरकार को लगभग चार करोड़ का राजस्व प्राप्त होता। अधिकारियों ने अपने पदों का दुरुपयोग कर पुराने दामों पर प्लॉट री-अलॉट किए और सरकार को भारी वित्तीय नुकसान पहुंचाने का आरोप है।
डीएसपी स्तर के अधिकारी कर रहे जांच
पुलिस अधीक्षक राज्य सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो गुरुग्राम मंडल के आदेशानुसार अग्रिम जांच का जिम्मा उप पुलिस अधीक्षक को सौंपा गया है। जांच के दौरान अन्य अधिकारियों व बिचौलियों की संलिप्तता पाए जाने पर उनके खिलाफ भी सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
पूर्व आईएएस पर दर्ज हो चुके तीन मामले
पूर्व आईएएस डी.सुरेश पर एसीबी ने गुरुग्राम में तीन मामले दर्ज किए है। सेक्टर-23 में भी जब्त किए गए प्लॉट को गलत तरीके से आंवटन करने के मामले में आरोपी बनाया गया है। डी.सुरेश 31 अगस्त 2026 को सेवानिवृत हो चुके है। घोटाले की दूसरी कड़ी सेक्टर-39 के प्लॉट नंबर 257ए (चार मरला/100 वर्ग गज) से जुड़ी है। 13 जुलाई 1994 को झाड़सा निवासी श्याम सिंह ने ओस्टिज कोटे के तहत 10 हजार 425 जमा कर आवेदन किया था। श्याम सिंह ने अन्य सह-मालिकों के हस्ताक्षर वाला शपथ पत्र प्रस्तुत किया, लेकिन 24 जून 1998 को झाड़सा निवासी भगत सिंह और अन्य सह-मालिकों ने लिखित शिकायत दी कि उनके हस्ताक्षर धोखाधड़ी से करवाए गए हैं। सह-मालिकों के विरोध के चलते 10 फरवरी 1999 को विभागीय नोटिंग में स्पष्ट लिखा गया कि श्याम सिंह को प्लॉट आवंटित नहीं किया जा सकता और आवंटन प्रक्रिया रोक दी गई।


