काम की बात: जीटीबी अस्पताल में यमुनापार का पहला ट्रॉमा सेंटर बनेगा, 6 मंजिला भवन में 250 बेड की सुविधा मिलेगी

Subodh Kumar Mishra हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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दिल्ली में यमुनापार इलाके में रहने वाले लोगों के अच्छी खबर है। दिल्ली सरकार के जीटीबी अस्पताल में 250 बेड का ट्रॉमा सेंटर बनेगा। प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना के तहत करीब 245 करोड़ की लागत से इसके निर्माण के लिए डीपीआर तैयार हो गई है। छह मंजिला भवन में करीब 75 आईसीयू बेड होंगे।

जीटीबी अस्पताल में यमुनापार का पहला ट्रॉमा सेंटर बनेगा, 6 मंजिला भवन में 250 बेड की सुविधा मिलेगी

दिल्ली में यमुनापार इलाके में रहने वाले लोगों के अच्छी खबर है। दिल्ली सरकार के जीटीबी अस्पताल में 250 बेड का ट्रॉमा सेंटर बनेगा। प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना (पीएमएसएसवाई) के तहत करीब 245 करोड़ की लागत से इसके निर्माण के लिए डीपीआर (डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट) तैयार हो गई है। अब डीपीआर को दिल्ली और केंद्र सरकार से स्वीकृति मिलने का इंतजार है।

अस्पताल के डॉक्टर बताते हैं कि उम्मीद है कि इस माह डीपीआर भी स्वीकृत हो जाएगी। इसके बाद टेंडर प्रक्रिया शुरू होगी। टेंडर आवंटन के बाद 16 माह में यह ट्रॉमा सेंटर बनकर तैयार होगा। जहां एक छत के नीचे हादसा पीड़ितों को अत्याधुनिक जांच व इलाज की सुविधा मिल पाएगी।

दिल्ली का पांचवां व यमुना पार का पहला ट्रॉमा सेंटर होगा

यह दिल्ली का पांचवां व यमुना पार का पहला ट्रॉमा सेंटर होगा। इसलिए इस ट्रॉमा सेंटर के निर्माण से दिल्ली में हादसा पीड़ितों के इलाज का बुनियादी ढांचा मजबूत होगा। इससे यमुना पार के हादसा पीड़ितों के साथ-साथ एनसीआर के मरीजों को भी फायदा होगा।

मौजूदा समय में यमुना पार में एक भी ट्रॉमा सेंटर नहीं है। लेकिन जीटीबी अस्पताल की इमरजेंसी में प्रतिदिन करीब 150 हादसा पीड़ित इलाज के लिए पहुंचते हैं। इस अस्पताल की इमरजेंसी में पूर्वी दिल्ली के अलावा गाजियाबाद और आसपास के क्षेत्रों से भी मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं।

एआईटीईएस को दी गई जिम्मेदारी

केंद्र ने पीएमएसएसवाई के तहत देश भर के 75 अस्पतालों में चिकित्सा सेवाओं में विस्तार की योजनाओं में जीटीबी को भी शामिल किया था, लेकिन तत्कालीन दिल्ली सरकार की उदासीनता के कारण योजना लंबित रही। जबकि 71 अस्पतालों के विस्तार की योजना पूरी हो चुकी है। केंद्र के अलावा अब दिल्ली सरकार ने भी इस योजना को सैद्धांतिक स्वीकृति मिलने के बाद परियोजना को पूरा करने की जिम्मेदारी एआईटीईएस (एचएलएल इंफ्राटेक सर्विस लिमिटेट) को दी गई है। एक डॉक्टर ने बताया कि डीपीआर भी तैयार कर स्वीकृति के लिए भेजी जा चुकी है।

दो सीटी स्कैन, एक एमआरआई मशीन होगी

इस ट्रॉमा सेंटर में ब्लड बैंक का भी प्रावधान किया गया है। इसके अलावा दो सीटी स्कैन व एक एमआरआई मशीन लगेगी। इसके अलावा एक्सरे, अल्ट्रसाउंड इत्यादि जांच की सुविधाएं होंगी। इससे मरीजों को जांच के लिए भागदौड़ करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

अभी एम्स ट्रॉमा सेंटर पर है ज्यादा बोझ

अभी एम्स ट्रॉमा सेंटर के अलावा सुश्रुत ट्रॉमा सेंटर है। इसके अलावा आरएमएम अस्पताल में भी ट्रॉमा सेंटर है। हाल ही में संजय गांधी स्मारक अस्पताल में ट्रॉमा सेंटर बना है। लेकिन हादसा पीड़ितों का ज्यादा बोझ एम्स ट्रॉमा सेंटर पर ही है।

75 आईसीयू बेड की सुविधा होगी

इस ट्रॉमा सेंटर का भवन छह मंजिला होगा। इसमें एक तिहाई बेड (करीब 75) आईसीयू बेड होंगे। इसमें इमरजेंसी मेडिसिन, ऑर्थोपेडिक सर्जरी, न्यूरो सर्जरी, जनरल सर्जरी, बर्न एवं प्लास्टिक व वैस्कुलर सर्जरी के विभाग होंगे। इन विभागों के विशेषज्ञ डॉक्टर 24 घंटे उपलब्ध रहेंगे।

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लेखक के बारे में

Subodh Kumar Mishra

सुबोध कुमार मिश्रा पिछले 19 साल से हिंदी पत्रकारिता में योगदान दे रहे हैं। वर्तमान में वह 'लाइव हिन्दुस्तान' में स्टेट डेस्क पर बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। दूरदर्शन के 'डीडी न्यूज' से इंटर्नशिप करने वाले सुबोध ने पत्रकारिता की विधिवत शुरुआत 2007 में दैनिक जागरण अखबार से की। दैनिक जागरण के जम्मू एडीशन में बतौर ट्रेनी प्रवेश किया और सब एडिटर तक का पांच साल का सफर पूरा किया। इस दौरान जम्मू-कश्मीर को बहुत ही करीब से देखने और समझने का मौका मिला। दैनिक जागरण से आगे के सफर में कई अखबारों में काम किया। इनमें दिल्ली-एनसीआर से प्रकाशित होने वाली नेशनल दुनिया, नवोदय टाइम्स (पंजाब केसरी ग्रुप), अमर उजाला और हिन्दुस्तान जैसे हिंदी अखबार शामिल हैं। अखबारों के इस लंबे सफर में खबरों को पेश करने के तरीकों से पड़ने वाले प्रभावों को काफी बारीकी से समझने का मौका मिला।

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शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो सुबोध ने बीएससी (ऑनर्स) तक की अकादमिक शिक्षा हासिल की है। साइंस स्ट्रीम से पढ़ने के कारण उनके पास चीजों को मिथ्यों से परे वैज्ञानिक तरीके से देखने की समझ है। समाज से जुड़ी खबरों को वैज्ञानिक कसौटियों पर जांचने-परखने की क्षमता है। उन्होंने मास कम्यूनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा किया है। इससे उन्हें खबरों के महत्व, खबरों के एथिक्स, खबरों की विश्वसनीयता और पठनीयता आदि को और करीब से सीखने और लिखने की कला में निखार आया। सुबोध का मानना है कि खबरें हमेशा प्रमाणिकता की कसौटी पर कसा होना चाहिए। सुनी सुनाई और कल्पना पर आधारित खबरें काफी घातक साबित हो सकती हैं, इसलिए खबरें तथ्यात्मक रूप से सही होनी चाहिए। खबरों के चयन में क्रॉस चेकिंग को सबसे महत्वपूर्ण कारक मानने वाले सुबोध का काम न सिर्फ पाठकों को केवल सूचना देने भर का है बल्कि उन्हें सही, सुरक्षित और ठोस जानकारी उपलब्ध कराना भी है।

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