
नियमों को दरकिनार कर झूला जोन बना दिया
फरीदाबाद। केशव भारद्वाज सूरजकुंड मेला परिसर में झूलों के लिए मानकों को ताक
फरीदाबाद। केशव भारद्वाज सूरजकुंड मेला परिसर में झूलों के लिए मानकों को ताक पर रखकर झूलों के लिए जगह आवंटित कर दी गई थी। झूलों के ज़ोन में बफर जोन नहीं बनाया गया। यदि कोई झूला गिर भी जाए तो वहां मौजूद दर्शकों के लिए बचने की कोई गुंजाइश ही न बचे। ऐसा लग रहा है कि जगह आवंटन के दौरान यहां सुरक्षा मानकों को ज्यादा तवज्जो नहीं दी गई। दिल्ली गेट की ओर बनाए गए मनोरंजन पार्क में करीब 30 झूले खड़े हुए हैं। किसी भी झूले में झूले के साइज के हिसाब से दूरी नहीं रखी गई है। वहीं, झूलों के बीच थोड़ा-बहुत अंतर भी है तो वह जगह फास्ट फूड स्टॉल के लिए आवंटित कर दी गई।
इससे मनोरंजन पार्क के अंदर भीड़भाड़ होने पर पैदल चलना भी मुश्किल होता था। झूलों के बीच जगह इतनी संकरी कि कोई अफवाह मच जाए तो भगदड़ में भी लोगों की जान चली जाए। मेले में तैनात पुलिसकर्मियों का मानना था कि झूलों को लगाने के लिए सुरक्षा मानकों की अनदेखी की गई। मेला प्राधिकरण ने झूलों को लगाने की अनुमति देने के दौरान सुरक्षा मानकों के बजाय कमाई को तवज्जो दी। इस हादसे में पुलिस इंस्पेक्टर की जान जाने, कई पुलिसकर्मियों समेत दर्शकों, स्टाल संचालकों के चोटिल होने के बाद से पुलिसकर्मी व्यथित हैं। उनका मानना है कि सुबह से लेकर रात तक यहां झूले चलते रहते थे। यहां पर कभी भी किसी टीम को यहां झूलों की जांच करते हुए नहीं देखा गया। यदि झूलों की जांच की जाती है तो यह बड़ा हादसा क्यों होता। -- हाइड्रा क्रेन वगैरहा का भी नहीं था इंतजाम: हादसा होने के बाद झूलेमें सवार लोगों को उतारने के लिए सीढ़ी मंगवाई गई थी। सीढ़ी एक वैकल्पिक इंतजाम था। यदि हाइड्रा क्रेन आदि मशीनरी का इंतजाम होता तो झूले को हाइड्रा क्रेन की सहायता से रोका जाता सकता था। क्रेन से रोका जाता तो झूला इस तरह अचानक धड़ाम न हुआ होता। दरअसल, झूला ज़ोन में काफी भारी झूले हैं। जिनका वजन टन में है। उनको क्रेन की मदद से लगाया जाता है और उतारा जाता है। एक्सपर्ट का कहना है कि खराब होने की सूरत में झूले को ठीक करने के लिए क्रेन की जरूत पड़ती है, लेकिन झूला ज़ोन में लोगो के चलने के लिए थोड़ी जगह है, वहां क्रेन को पहुंचाने के लिए जगह नहीं है। -- झूलों की रोज जांच का दावा: प्रदेश के पर्यटन मंत्री अरविंद शर्मा ने दावा किया कि झूलों की सुरक्षा जांच होती थी। शनिवार सुबह भी प्रशासन की ओर से सुरक्षा जांच करवाई गई थी। पुलिस प्रदेश के मंत्री के दावे पर सवाल खड़े हो रहे हैं। जब इस झूले की जांच की गई थी तो फिर यह टूटकर क्यों गिर पड़ा। इससे साबित होता है कि झूलों की जांच के नाम पर खानापूर्ति होती रही। सुरक्षा सर्टिफिकेट जारी करने वाले अधिकारी खानापूर्ति करते रहे। -- सुरक्षा उपकरणों से जांच नहीं की गई: सेवानिवृत्त डीएसपी एवं मेले में आठ वर्ष तक नोडल अधिकारी के तौर पर जिम्मेदारी संभाल चुके दर्शन लाल मलिक बताते हैं कि कि सूरजकुंड मेले में जो झूला टूटा है, यह खतरनाक श्रेणी वाले झूलों में शामिल है। इस तरह के झूलों की सिर्फ देखने भर से ठीक होने का सुरक्षा सर्टिफिकेट जारी नहीं किया जा सकता है। इस तरह के झूलों की जांच के लिए खास तरह की डिवाइस आती हैं। इनके जरिए ही झूलों को सुरक्षित करार दिया जाता है। अलग-अलग विभाग के विशेषज्ञ इसमें शामिल होते हैं। यदि इस तरह मानकों को ध्यान में रखते हुए झूले की जांच की जाती तो यह बड़ा हादसा न हुआ होता। उन्होंने बताया कि ऐसा लगता है कि झूलों की जांच जिम्मेदारों द्वारा मौके पर खड़े न होकर कागजों में की जा रही होगी। उन्होंने बताया कि झूलों को एक कमाई के तौर पर देखा जाता है, जो भी झूला कंपनी ज्यादा रुपये देती है उसे मेले में झूला लगाने की अनुमति दे दी जाती है। सुरक्षा मानक को इतनी तवज्जो नहीं दी जाती। उन्होंने बताया कि झूलों के सुरक्षा मानक होते हैं। इनकी अनदेखी करना हादसे को न्योता देना होता है। ---------------- झूले पुराने होने का भी अंदेशा: सूरजकुंड मेले में शनिवार को तीसरी बार झूलों से हादसा हुआ है। वर्ष 2001 में तीन लोगों की मौत हो गई थी। वर्ष 1998 में एक व्यक्ति घायल हुआ था। शनिवार को एक इंस्पेक्टर के शहीद होने के बाद 13 लोग घायल हो गए थे। जानकारों का कहना है कि जिस झूले से यह हादसा हुआ है, उसमें कुछ खामियों जरूर रही होंगी। क्योंकि 31 जनवरी को यह झूला लाया गया था और सात फरवरी को यह टूट गया। सुरक्षा जांच के बाद भी टूटा है तो इसके पुराने होने का अंदेशा लग रहा है। -------------------- जांच पर उठे सवाल सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय मेले में झूला टूटने की घटना के बाद मेला प्राधिकरण सवालों के घेरे में आ गया है। हादसे के कुछ ही घंटों बाद रात में ही टूटा हुआ झूला मौके से हटा दिया गया। इसे हटाने की ठोस वजह कोई भी अधिकारी साफ तौर पर नहीं बता रहा है। रविवार को जांच के लिए प्रशासन की टीम और फोरेंसिक टीम मौके पर पहुंची, लेकिन वहां झूला मौजूद नहीं था। ऐसे में लोगों ने सवाल उठाए कि जब झूला ही नहीं है, तो जांच किस आधार पर की जा रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि सबूत हटाने से जांच प्रभावित हो सकती है। अब सभी की नजरें प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं। ------ बफर जोन की अनदेखी मेला परिसर में लगाए जाने वाले झूलों के आसपास बफर जोन का विशेष महत्व होता है। बफर जोन वह सुरक्षित खाली क्षेत्र होता है, जो झूले और आम जनता के बीच रखा जाता है, ताकि किसी भी प्रकार की दुर्घटना की स्थिति में लोगों को नुकसान न पहुंचे। बड़े और तेज गति से चलने वाले झूलों, जैसे सुनामी या जायंट व्हील के लिए पर्याप्त बफर जोन रखना बेहद जरूरी होता है। इनके लिए परिधि 20 से 30 फुट तक होती है। ताकि झूले के घूमने वाले हिस्सों, टूटे हुए पुर्जों या अचानक खराबी का प्रभाव सीधे दर्शकों तक नहीं पहुंचता। एक्सपर्ट के मुताबिक बफर जोन में किसी भी प्रकार की दुकान, ठेला, कुर्सी या भीड़ की अनुमति नहीं होनी चाहिए। यहां बैरिकेडिंग और चेतावनी बोर्ड लगाए जाने चाहिए, ताकि लोग सुरक्षित दूरी बनाए रखें। प्रशासन और आयोजकों की जिम्मेदारी है कि वे बफर जोन के नियमों का सख्ती से पालन करें। सही ढंग से बनाया गया बफर जोन न केवल दुर्घटनाओं को रोकता है, बल्कि मेले की व्यवस्था और विश्वसनीयता को भी बढ़ाता है। इंस्पेक्टर के एक परिजन को सरकारी नौकरी मिलेगी फरीदाबाद। हस्तशिल्प मेले में झूला टूटने से हुए दुखद हादसे पर हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने गहरा शोक व्यक्त किया है। मुख्यमंत्री ने कुरुक्षेत्र से घटना पर तुरंत संज्ञान लेते हुए मृतक एवं घायलों के लिए राहत और सहायता संबंधी कई महत्वपूर्ण घोषणाएं की हैं। मुख्यमंत्री ने आश्वासन दिया कि शहीद पुलिसकर्मी के परिवार को हरसंभव सहायता प्रदान की जाएगी। परिवार की आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उनके परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी दी जाएगी, ताकि परिवार को भविष्य में किसी प्रकार की आर्थिक परेशानी का सामना न करना पड़े। उन्होंने घोषणा की कि गंभीर रूप से घायल व्यक्तियों को राज्य सरकार की ओर से एक-एक लाख रुपये की वित्तीय सहायता प्रदान की जाएगी। साथ ही अन्य घायलों को भी नियमानुसार सहायता उपलब्ध करवाई जाएगी।

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