बहन ने लिवर दान कर भाई को नया जीवन दिया

Apr 18, 2026 08:25 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, फरीदाबाद
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फरीदाबाद, धनंजय चौहान। विश्व लिवर दिवस के अवसर पर शहर में एक प्रेरणादायक मामला

बहन ने लिवर दान कर भाई को नया जीवन दिया

फरीदाबाद, धनंजय चौहान। विश्व लिवर दिवस के अवसर पर शहर में एक प्रेरणादायक मामला सामने आया है, जहां एक छोटी बहन ने अपने बड़े भाई को लिवर का हिस्सा दान कर उसे नया जीवन दिया।श्रीनगर निवासी 52 वर्षीय राजेश कुमार परिजनों ने बताया कि पिछले कई सालों से राजेश गंभीर लिवर सिरोसिस की बीमारी से पीड़त थे। शुरुआत में उन्होंने गृह क्षेत्र में ही कई अस्पतालों में दिखाया। डॉक्टरों ने दवाईयां शुरू कर दी। लेकिन आराम नहीं मिला। परिवार के कुछ सदस्य फरीदाबाद में रहते हैं। उन्होंने राजेश को सेक्टर-16 स्थित अस्पताल में दिखाने की सलाह दी। यहां प्राथमिक जांच में मरीज के दिल के अंदर मौजूद माइट्रल वाल्व ठीक से बंद नहीं हो रहा था, जिससे खून आगे जाने की बजाय उल्टा वापस बहने लगता था, जिससे मरीज की हालत लगातार गंभीर होती जा रही थी।

इस दौरान डॉक्टरों की टीम ने परिजनों को मरीज का लिवर ट्रांसप्लांट की सलाह दी। अस्पताल के लिवर ट्रांसप्लांट विभाग के निदेशक डॉ. पुनीत सिंगला ने बताया कि मरीज की 44 वर्षीय छोटी बहन सुदेश कुमारी ने परिवार की सहमति से लिवर दान करने का निर्णय लिया। सभी कानूनी और चिकित्सकीय प्रक्रियाएं पूरी करने के बाद मार्च में करीब 12 घंटे चले ऑपरेशन में बहन ने अपने लिवर का दाहिना हिस्सा दान किया। ऐसे में पहले कार्डियक सर्जरी टीम ने दिसंबर में सफलतापूर्वक हार्ट वाल्व रिप्लेसमेंट किया, जिसके बाद मरीज ट्रांसप्लांट के लिए फिट हो गया। ट्रांसप्लांट सफल रहा और अब दोनों स्वस्थ हैं। यह सफल लिवर ट्रांसप्लांट सेक्टर-16 स्थित मेरिंगो एशिया अस्पताल में किया गया।--बढ़ रहे फैटी लिवर के मामलेशराब का सेवन न करने वाले लोगों में भी लिवर की बीमारी तेजी से बढ़ रही है। नॉन एल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज के मरीजों में पिछले पांच वर्षों में करीब 25 फीसदी तक इजाफा हुआ है। ग्रेटर फरीदाबाद सेक्टर-86 स्थित अस्पताल के गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग के चेयरमैन डॉ. रामचंद्र सोनी के अनुसार अव्यवस्थित लाइफस्टाइल, तला-भुना और हाई कैलोरी भोजन, व्यायाम की कमी इसके प्रमुख कारण हैं। इस बीमारी में लिवर में वसा जमा हो जाती है, जिससे उसकी कार्यप्रणाली प्रभावित होती है और समय पर इलाज न मिलने पर सिरोसिस का खतरा बढ़ जाता है। डॉक्टरों का कहना है कि 30 वर्ष के बाद नियमित जांच जरूरी है।--सरकारी अस्पतालों नहीं ट्रांसप्लांट की सुविधाऔद्योगिक नगरी में सरकारी अस्पतालों में आज भी लिवर ट्रांसप्लांट की सुविधा उपलब्ध नहीं है। वर्ष 2014 में 800 करोड़ की लागत से बने ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज में 12 साल बाद भी यह सुविधा शुरू नहीं हो सकी। ऐसे में गंभीर लिवर रोगियों को मजबूरन महंगे निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ रहा है, जिससे इलाज आम लोगों की पहुंच से दूर होता जा रहा है।--

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