नगर निगम के पास गरीबों के पुनर्वास के लिए महज 14 सौ फ्लैट
फरीदाबाद में नेहरू कॉलोनी में बुलडोजर से बेघर हुए गरीबों का पुनर्वास नगर निगम के लिए चुनौती बन गया है। शहर में 66 स्लम बस्तियों से लगभग 10 लाख लोग प्रभावित हैं, जबकि केवल 1400 फ्लैट उपलब्ध हैं। पुनर्वास की प्रक्रिया को चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाने पर विचार किया जा रहा है।

फरीदाबाद, सरसमल। अवैध नेहरू कॉलोनी पर चले बुलडोजर से बेघर हुए गरीबों का पुनर्वास नगर निगम के लिए चुनोती बन गया है। जिसकी चिंता सताने लगी है। दरअसल, इस कॉलोनी सहित शहर में करीब 66 स्लम बस्ती हैं, जहां करीब दस लाख लोग रह रहे हैं। जबकि नगर निगम के पास उनके पुनर्वास के लिए करीब 1400 फ्लैट उपलब्ध हैं। पिछ्ले सप्ताह शुरू हुई तोड़फोड़ के बाद पुनर्वास के लिए तैयार की जा रही रिपोर्ट में इसका खुलासा हुआ है। सूत्रों के मुताबिक नेहरू कॉलोनी में तोड़फोड़ के बाद नगर निगम अब प्रभावित परिवारों के पुनर्वास के विकल्प पर काम कर रहा है। इसके लिए आला अधिकारियों ने योजना शाखा और राजस्व शाखा कर अधिकारियों से वपोर्टर तलब की है। लेकिन उपलब्ध संसाधन और जरूरत के बीच बड़ा अंतर दिखाई दे रहा है। निगम के रिकॉर्ड के अनुसार शहर की 66 स्लम बस्तियों में दस लाख से अधिक लोग रहते हैं। इनके लिए डबुआ कॉलोनी में जवाहर लाल नेहरू अर्बन रिन्यूवल मिशन के तहत बने करीब 1400 फ्लैट ही खाली पड़े हैं। ऐसे में सभी पात्र परिवारों को एक साथ आवास उपलब्ध कराना संभव नहीं दिख रहा। यही वजह है कि पुनर्वास की प्रक्रिया को चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाने पर विचार किया जा रहा है।
डबुआ के फ्लैटों की हालत चिंता का कारण
पुनर्वास की उम्मीद जिन फ्लैटों पर टिकी है, उनकी मौजूदा स्थिति भी आसान रास्ता नहीं दिखाती। लंबे समय से खाली पड़े रहने के कारण कई फ्लैटों में रखरखाव नहीं हो पाया है। दीवारों में दरारें आ चुकी हैं, बिजली और पानी की व्यवस्थाएं खराब हो गई हैं तथा कई जगह दरवाजे और खिड़कियां भी क्षतिग्रस्त हैं। अधिकारियों का कहना है कि बिना मरम्मत के इन फ्लैटों में लोगों को बसाना संभव नहीं होगा। ऐसे में पहले व्यापक मरम्मत कार्य कराया जाएगा, उसके बाद ही आवंटन की प्रक्रिया शुरू हो सकेगी।
खोरी कॉलोनी जैसा मॉडल फिर चर्चा में
नगर निगम के सामने यह स्थिति नई नहीं है। करीब तीन वर्ष पहले खोरी कॉलोनी हटाने के दौरान भी पुनर्वास को लेकर इसी प्रकार की चुनौती सामने आई थी। उस समय डबुआ के फ्लैटों को तैयार करने के लिए करीब 11 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे। मरम्मत और आवंटन की प्रक्रिया पूरी होने में काफी समय लगा था। कई परिवारों को वैकल्पिक व्यवस्था का इंतजार करना पड़ा था। अब नेहरू कॉलोनी के मामले में भी निगम उसी मॉडल पर आगे बढ़ने की तैयारी कर रहा है। पुराने अनुभवों के आधार पर इस बार प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित और तेज बनाने की कोशिश की जाएगी।
जमीन की कमी सबसे बड़ी बाधा
सूत्रों के मुताबिक पुनर्वास की स्थायी व्यवस्था के लिए नई आवासीय परियोजनाओं की जरूरत है, लेकिन जमीन की उपलब्धता बड़ी समस्या बनी हुई है। नगर निगम के पास फिलहाल इतनी खाली भूमि नहीं है कि बड़े स्तर पर नई कॉलोनियां विकसित की जा सकें। अधिकांश स्थानों पर एक-दो एकड़ से अधिक जमीन उपलब्ध नहीं है। जबकि लाखों परिवारों को बसाने के लिए बड़े भूखंडों की आवश्यकता होगी। इसी कारण फिलहाल निगम की पूरी रणनीति डबुआ के मौजूदा फ्लैटों और सीमित संसाधनों पर आधारित नजर आ रही है।
स्लम मुक्त शहर का सपना अधूरा
फरीदाबाद को स्लम मुक्त बनाने की योजना वर्षों से चर्चा में रही है। विभिन्न योजनाओं के तहत बस्तियों को व्यवस्थित कॉलोनियों में स्थानांतरित करने की बात कही जाती रही है, लेकिन जमीन और बजट की कमी के कारण यह लक्ष्य अब तक पूरा नहीं हो पाया। समाजसेवी विष्णु का कहना है कि शहर में मौजूद 66 बस्तियों के पुनर्वास के लिए हजारों नए फ्लैटों और बड़े निवेश की आवश्यकता होगी। निगम अधिकारियों को उम्मीद है कि केंद्र और राज्य सरकार की विभिन्न योजनाओं से भविष्य में सहायता मिल सकती है। हालांकि ऐसी परियोजनाओं को धरातल पर आने में समय लगता है।
तोड़फोड़ के साथ पुनर्वास की वैकल्पिक व्यवस्था की तैयारी
सूत्रों के मुताबिक नेहरू कॉलोनी के बाद नगर निगम की प्राथमिकता डबुआ के फ्लैटों को जल्द तैयार करना और पात्र परिवारों की सूची तैयार करना होगा। इसकी तैयारी करने के संकेत आला अधिकारियों ने दिए हैं। नियमानुसार पहले सर्वे और दस्तावेजों के आधार पर पात्रता तय की जाएगी। इसके बाद चरणबद्ध तरीके से फ्लैट आवंटित किए जाएंगे। जिन परिवारों का नाम शुरुआती सूची में होगा, उन्हें प्राथमिकता दी जाएगी। वहीं बाकी लोगों के लिए अस्थायी आश्रय, किराये की सहायता या अन्य विकल्पों पर भी विचार किया जा रहा है। दरअसल, नगर निगम के लिए यह केवल नेहरू कॉलोनी का मामला नहीं, बल्कि शहर की बाकी 65 स्लम बस्तियों के भविष्य से जुड़ा बड़ा सवाल भी है।
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