ऑनलाइन गेम की गिरफ्त में बचपन, फरीदाबाद के अस्पतालों में रोज पहुंच रहे 100 बच्चे

Anubhav Shakya हिन्दुस्तान, फरीदाबाद
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फरीदाबाद के प्रमुख अस्पतालों में हर दिन 100 से अधिक बच्चे मोबाइल और ऑनलाइन गेम्स की लत के कारण मनोचिकित्सकों के पास पहुंच रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अत्यधिक गेमिंग से बच्चों में चिड़चिड़ापन, अवसाद और सामाजिक दूरी बढ़ रही है।

ऑनलाइन गेम की गिरफ्त में बचपन, फरीदाबाद के अस्पतालों में रोज पहुंच रहे 100 बच्चे

बच्चों में मोबाइल और ऑनलाइन गेम्स की लत लगातार बढ़ती जा रही है। शहर के अस्पतालों में रोजाना 100 से अधिक ऐसे मामले पहुंच रहे हैं। मनोचिकित्सकों ने अभिभावकों को सावधान रहने की सलाह दी है।

फरीदाबाद में ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल, बीके सहित करीब 15 बड़े अस्पताल हैं। इनमें रोजाना करीब 100 ऐसे बच्चे और किशोर पहुंच रहे हैं, जिनमें अत्यधिक गेमिंग के कारण पढ़ाई में गिरावट, नींद की कमी, चिड़चिड़ापन और सामाजिक दूरी जैसी समस्याएं सामने आ रही हैं। कुछ मामलों में बच्चों में अवसाद, आत्मविश्वास की कमी और आत्मघाती विचार तक देखे जा रहे हैं। बुधवार को गाजियाबाद में मोबाइल पर कोरियन लव गेम के आदी तीन नाबालिग बहनों की घटना ने अभिभावकों को झकझोर कर रख दिया है। इसका असर फरीदाबाद में भी देखा जा रहा है, जहां बड़ी संख्या में बच्चे मोबाइल फोन और ऑनलाइन गेम्स के आदी होते जा रहे हैं।

धीरे-धीरे वास्तविक दुनिया से कटने लगते हैं बच्चे

ग्रेटर फरीदाबाद स्थित एकॉर्ड अस्पताल की मनोचिकित्सक डॉ. सिमरन मलिक ने कहा कि डिजिटल गेम्स में हार-जीत बच्चों के मन पर गहरा असर डालती है। बार-बार हारने पर आत्मविश्वास कम होता है और वे खुद को दूसरों से कमतर समझने लगते हैं, जिससे वे धीरे-धीरे वास्तविक दुनिया से कटने लगते हैं। इसलिए मोबाइल या गेम्स पूरी तरह बंद करना समाधान नहीं है, बल्कि समय-सीमा तय करना जरूरी है। अभिभावकों को बच्चों से रोज बातचीत करनी चाहिए, उनके साथ समय बिताना चाहिए और खेल-कूद व रचनात्मक गतिविधियों के लिए प्रेरित करना चाहिए। यदि बच्चे के व्यवहार में लगातार बदलाव दिखे तो देर न करें और किसी मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से संपर्क करें। डॉ. अंकुर ने कहा कि पैरेंटल कंट्रोल ऐप्स, समय-सीमा तय करने वाले टूल्स और सुरक्षित ब्राउजिंग सेटिंग्स का उपयोग अभिभावकों को जरूर करना चाहिए।

चिड़चिड़ापन, गुस्सा, अकेलापन जैसी समस्याएं बढ़ रहीं

ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. अंकुर सचदेवा ने बताया कि डिजिटल गेम्स की लत बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है। अस्पताल में हर महीने 5 से 6 बच्चे और किशोर मानसिक परेशानी के इलाज के लिए पहुंच रहे हैं, जिनमें से करीब दो बच्चे मोबाइल और गेम्स की अत्यधिक लत से जूझ रहे होते हैं। लगातार स्क्रीन पर समय बिताने से बच्चों में चिड़चिड़ापन, गुस्सा, अकेलापन और ध्यान की कमी जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। कई बच्चे पढ़ाई में पिछड़ने लगते हैं और नींद व खानपान का संतुलन भी बिगड़ जाता है। उन्होंने बताया कि बच्चे अक्सर अपनी परेशानी शब्दों में नहीं कह पाते, बल्कि व्यवहार से संकेत देते हैं। अचानक ज्यादा चुप रहना, अकेले रहना पसंद करना, दोस्तों से दूरी बनाना और छोटी बातों पर गुस्सा होना मानसिक दबाव के लक्षण हो सकते हैं।

क्या करना चाहिए?

  • बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम तय करें और उसका पालन करवाएं।
  • मोबाइल उपयोग को लेकर बच्चों से खुलकर संवाद बनाए रखें।
  • आउटडोर खेल, हॉबी और रचनात्मक गतिविधियों के लिए प्रेरित करें।
  • घर में बेडरूम और खाने की मेज को स्क्रीन-फ्री जोन बनाएं।
  • पैरेंटल कंट्रोल के जरिए बच्चों की डिजिटल गतिविधियों पर नजर रखें।
  • व्यवहार, नींद या पढ़ाई में बदलाव दिखे तो तुरंत ध्यान दें।
  • जरूरत पड़ने पर काउंसलर या मनोवैज्ञानिक की मदद लें।
  • खुद भी डिजिटल अनुशासन अपनाकर बच्चों के लिए उदाहरण बनें।

क्या न करें?

  • बच्चों को लंबे समय तक बिना निगरानी मोबाइल न दें।
  • जिद या रोने पर फोन देकर चुप कराने की आदत न डालें।
  • देर रात तक गेम खेलने या इंटरनेट इस्तेमाल की अनुमति न दें।
  • बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों को पूरी तरह नजरअंदाज न करें।
  • अचानक मोबाइल छीनने या सख्त पाबंदी लगाने से बचें।
  • चिड़चिड़ापन, गुस्सा या सामाजिक दूरी जैसे संकेतों को हल्के में न लें।
  • पढ़ाई में गिरावट को सामान्य समझकर अनदेखा न करें।

Anubhav Shakya

लेखक के बारे में

Anubhav Shakya
भारतीय जनसंचार संस्थान नई दिल्ली से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद जी न्यूज से करियर की शुरुआत की। इसके बाद नवभारत टाइम्स में काम किया। फिलहाल लाइव हिंदुस्तान में बतौर सीनियर कंटेंट प्रोड्यूसर काम कर रहे हैं। किताबों की दुनिया में खोए रहने में मजा आता है। जनसरोकार, सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों में गहरी दिलचस्पी है। एनालिसिस और रिसर्च बेस्ड स्टोरी खूबी है। और पढ़ें
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