JNU प्रोफेसर ने राष्ट्रपति मुर्मू को लिखा पत्र, यूनिवर्सिटी के लिए जताई चिंता; कर दी ये मांग
प्रोफेसर ने पत्र में लिखा है कि जेएनयू की पहचान को सुरक्षित रखने की जरूरत है जिसमें छात्र और फैकल्टी मेंबर्स के बीच विचारों का आदान-प्रदान खुले तौर पर होता है और सभी लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखते हैं।

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) के प्रोफेसर ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को एक पत्र लिखा है जिसमें उन्होंने कैंपस में चर्चा और बहस के गिरते स्तर पर चिंता जताई है। स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज के फैकल्टी मेंबर एम क्रिस्टु डॉस ने राष्ट्रपति को यह पत्र 6 मार्च को लिखा है। पत्र में उन्होंने अकादमिक संवाद, संस्थान की संस्कृति और यूनिवर्सिटी के भीतर बौद्धिक ईमानदारी को बनाए रखने से जुड़े मुद्दों को उठाया है।
राष्ट्रपति जो कि सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों की विजिटर भी होती हैं उनसे इस पत्र में मांग की गई है कि वे उच्च शिक्षण संस्थानों में बहस, तार्किक सोच और अकादमिक गरिमा की संस्कृति को बनाए रखने के लिए ध्यान दें। इसके साथ ही उन्होंने कहा है कि विश्वविद्यालयों में संवाद, असहमति और छात्रों के बीच होने वाली डिबेट जिम्मेदारी के साथ-साथ तथ्यों पर भी आधारित हो। शैक्षणिक संस्थानों को जानकारी पर आधारित चर्चाओं को बढ़ावा देना चाहिए।
पहचान को सुरक्षित रखने की जरूरत
प्रोफेसर ने पत्र में लिखा है कि जेएनयू की पहचान को सुरक्षित रखने की जरूरत है जिसमें छात्र और फैकल्टी मेंबर्स के बीच विचारों का आदान-प्रदान खुले तौर पर होता है और सभी लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखते हैं।
उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और शिक्षा मंत्री को भी भेजी गई हैं कॉपी
पत्र में लिखा गया है कि जेएनयू का कोई भी जिम्मेदार छात्र यह समझ जाएगा कि जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन (JNUTA) का जानबूझकर किया गया प्रचार, जो सच को तोड़-मरोड़कर पेश करता है वह जेएनयू के बड़े बौद्धिक समाज की राय नहीं है। आपको बता दें कि इस पत्र की कॉपी उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और केंद्रीय शिक्षा मंत्री को भी भेजी गई हैं।
विवादों से यूनिवर्सिटी का पुराना नाता
आपको बता दें कि प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटीज में शामिल जेएनयू अकादमिक उत्कृष्टता के लिए जाना जाता है, लेकिन विवादों से इसका रिश्ता भी अक्सर सुर्खियों में बना रहता है। अक्सर यूनिवर्सिटी के भीतर से छात्रों संगठनों के गुटों के बीच झड़प की खबरें भी आती रहती हैं। यह वैचारिक टकराव का मैदान बन जाता है। ऐसे में कहा जा रहा है कि यूनिवर्सिटी में वैचारिक संवाद का स्तर लगातार गिर रहा है, जिससे परिसर में तनाव और हिंसा बढ़ी है।
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