
कर्मचारियों की कमी से जूझ रहा दिल्ली का चिड़ियाघर, बंदर के हमले में दैनिक कर्मी बुरी तरह घायल
दिल्ली चिड़ियाघर में बंदर के बाड़े में खाना डालते वक्त बंदरों ने एक दैनिक कर्मी पर हमला करके बुरी तरह घायल कर दिया। कर्मचारियों का कहना है कि चिड़ियाघर में स्टाफ की बेहद कमी है और ऐसे में काम का दबाव का काफी ज्यादा रहता है।
राजधानी दिल्ली के राष्ट्रीय प्राणी उद्यान (चिड़ियाघर) में कर्मचारियों की सुरक्षा को लेकर लापरवाही का मामला सामने आया है। यहां काम करने वाले दैनिक वेतन भोगी भैरों प्रताप सिंह को बोनट बंदर ने बुरी तरह घायल कर दिया। वहीं कर्मचारी के परिवार का आरोप है कि चिड़ियाघर प्रशासन की तरफ से केवल प्राथमिक उपचार करके उसे बेहोशी की हालत में ही घर छोड़ दिया गया। हालांकि बाद में राम मनोहर लोहिया अस्पताल में इलाज करवाया गया है।
बंदर के हमले की वजह से पीड़ित के हाथ और पैर में गंभीर घाव हो गए हैं। पीड़ित के परिवार का कहना है कि शुक्रवार को एक बार फिर इलाज के लिए चिड़ियाघर प्रशासन भैरों प्रताप सिंह को अस्पताल ले गया है। पीड़ित की पत्नी पूजा सिंह ने घटना को लेकर हजरत निजामुद्दीन पुलिस थाने में शिकायत भी दी थी। इसमें उन्होंने चिड़ियाघर प्रशासन पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए बताया था कि 2016 में भी एक बार इसी तरह की घटना हो चुकी है। उस समय शेर के बाड़े में खाना देते वक्त शेर ने हमला कर दिया था जिसमें पीड़ित को एक उंगली गंवानी पड़ी थी। उस समय चिड़ियाघर प्रशासन की ओर से कोई मुआवजा नहीं मिला था। वहीं ईएसआई की तरफ से दो हजार रुपये की मासिक पेंशन का इंतजाम किया गया था। इसके बाद कहीं और काम मिलने में बेहद मुश्किल हो रही है। मजबूर होकर उन्होंने कुछ महीने पहले ही दैनिकभोगी कर्मचारी के तौर पर चिड़ियाघर में काम करना शुरू किया।
पीड़ित की पत्नी का कहना है कि डॉ. मनोज नाम के शख्स ने उन्हें काम पर लगवाया था। उन्होंने कहा कि चिड़ियाघर में स्टाफ की बेहद कमी है और चार आदमी का काम एक को ही करना पड़ता है। पीड़ित भैरो प्रताप सिंह को भी एक साथ तीन-तीन बीट पर काम करना पड़ता था। पीड़ित परिवार ने जब ठेकेदार से बात की तो उनका कहना है कि वह केवल कर्मचारियों को अंदर भेजते हैं। वहां किससे कौन सा काम लिया जाता है, इसकी जम्मेदारी उनकी नहीं है। वहीं पीड़ित का कहना है कि अगर कर्मचारी काम के प्रेशर को लेकर शिकायत करता है तो उसे नौकरी से निकालने की धमकी दी जाती है। पीड़ित की पत्नी का कहना है कि विकलांग होने की वजह से परिवार चलाने में खासी दिक्कत आ रही है। ऐसे में उनकी माली हालत और चिड़ियाघर में कार्य करने के दौरान अंग हानी को देखते हुए स्थायी नियुक्ति की जानी चाहिए।
चिड़ियाघर के दैनिक कर्मियों का कहना है कि कुछ दिन पहले शेर की चोट की ड्रेसिंग करते वक्त भी एक कर्मचारी घायल हो गया था। उनका कहना है कि चिड़ियाघर में खाली पद होने के बाद भी रेंजर तैनात नहीं किए ए हैं। ऐसे में क्यूरेटर डॉ. मनोज कुमार अतिरिक्त प्रभार के तौर पर रेंजर की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। इसके अलावा उनपर अन्य विभागीय कार्यों की भी जिम्मेदारी रहती है। कर्मचारियों का कहना है कि स्टाफ पर काम का दबाव काफी ज्यादा है। वहीं सुरक्षा के इंतजाम भी पुख्ता नहीं हैं, ऐसे में कर्मचारियों की जान पर बनी रहती है।

लेखक के बारे में
Ankit Ojhaविद्यालयी जीवन से ही कलात्मक अभिव्यक्ति, विचारशील स्वभाव और मिलनसार व्यक्तित्व और सामान्य के अंदर डुबकी लगाकर कुछ खास खोज लाने का कौशल पत्रकारिता के लिए अनुकूल साबित हुआ। अंकित ओझा एक दशक से डिजिटल पत्रकारिता के क्षेत्र में लगातार सक्रिय हैं। उत्तर प्रदेश के बाराबंकी के रहने वाले अंकित ओझा समाचारों की दुनिया में तथ्यों के महत्व के साथ ही संवेदनशीलता के पक्ष को साधने में निपुण हैं। पिछले चार साल से हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप के 'लाइव हिन्दुस्तान' के लिए चीफ कॉन्टेंट प्रड्यूसर पद पर कार्य कर रहे हैं। इससे पहले 'टाइम्स ऑफ इंडिया' और 'इंडियन एक्सप्रेस' ग्रुप के साथ भी कार्य कर चुके हैं।
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अकादमिक योग्यताः अंकित ओझा ने प्रारंभिक शिक्षा नवोदय विद्यालय से पूरी करने के बाद जामिया मिल्ल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता में ही ग्रैजुएशन किया है। इसके बाद भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) से पोस्ट ग्रैजुएट डिप्लोमा और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन में एमए किया है। जामिया में अध्ययन के दौरान ही इटैलियन और उर्दू भाषा में भी कोर्स किए हैं। इसके अलावा पंजाबी भाषा की भी अच्छी समझ रखते हैं। विश्वविद्यालय में NCC का 'C सर्टिफिकेट' भी प्राप्त किया है। IIMC और ऑक्सफर्ड से स्वास्थ्य पत्रकारिता का सर्टिफिकेट भी प्राप्त किया है।
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