यमुना सफाई के ₹2454 करोड़ 'नाले' में! 20 साल बाद खुलासा- इंटरसेप्टर प्रोजेक्ट सिर्फ 60% सफल
केंद्र द्वारा कराए गए एक निरीक्षण में यह पाया गया है कि यह आईएसपी प्रोजेक्ट सीवेज की उस मात्रा का केवल 60 प्रतिशत ही रोक पाया है, जिसके बारे में दिल्ली जल बोर्ड ने दावा किया था, उसने यमुना में जाने से रोक दिया है।

यमुना को स्वच्छ बनाने के लिए दो दशकों से चल रहे दिल्ली जल बोर्ड (DJB) के सबसे बड़े इंटरसेप्टर सीवेज प्रोजेक्ट (ISP) पर केंद्र सरकार के ऑडिट ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, ₹2,454 करोड़ से अधिक खर्च करने के बाद भी यह प्रोजेक्ट यमुना में गिरने वाले सीवेज को रोकने में काफी हद तक नाकाम रहा है। केंद्र द्वारा कराए गए एक निरीक्षण में यह पाया गया है कि यह प्रोजेक्ट सीवेज की उस मात्रा का केवल 60 प्रतिशत ही रोक पाया है, जिसके बारे में DJB ने दावा किया था उसने यमुना में जाने से रोक दिया है।
एचटी की रिपोर्ट के अनुसार, 2006 में शुरू किए गए इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट का मकसद यमुना में गिरने वाले छोटे नालों को रोकना और कच्चे सीवेज को सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) की ओर मोड़ना था। इस साल फरवरी में केंद्र सरकार के आदेश पर दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (DPCC) द्वारा किए गए निरीक्षणों में दिल्ली जल बोर्ड के परफॉर्मेंस डेटा में बड़े पैमाने पर गड़बड़ियां पाई गईं।
क्या था दिल्ली जल बोर्ड का दावा?
एचटी को मिली डीपीपीसी की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली जल बोर्ड ने दावा किया था कि उसने हर दिन 238 मिलियन गैलन (MGD) सीवेज को रोककर दूसरी तरफ मोड़ दिया है, लेकिन ISP के तहत उठाए गए कदमों से सिर्फ 142 MGD सीवेज ही रोका जा सका। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि 117 MGD से अधिक बिना ट्रीट किया हुआ कचरा अभी भी उन नालों से नदी में बह रहा है, जिन्हें बोर्ड ने ‘पूरा हो चुका’ घोषित कर दिया था। इसके अलावा, छोटे नालों में सीवेज का अपडेटेड बहाव बढ़कर कुल 260 MGD हो गया था।
निरीक्षण के दौरान 109 इंटरसेप्टर पॉइंट्स में से केवल 56 पॉइंट्स पर ही बहाव को सफलतापूर्वक मोड़ा जा सका। बाकी पॉइंट्स पर कुल 117.7 MGD सीवेज या तो बिना इस्तेमाल के पड़ा था या फिर ओवरफ्लो हो रहा था।
मॉनिटरिंग में भी गंभीर कमियां पाई गईं
डीपीसीसी की रिपोर्ट में बताया गया है कि बहुत अधिक कचरा फेंके जाने के चलते 5 पॉइंट्स की जांच नहीं की जा सकी। वहां इंफ्रास्ट्रक्चर गायब था और निर्माण कार्य के चलते नुकसान हुआ था। निरीक्षण के दौरान मॉनिटरिंग में भी गंभीर कमियां पाई गईं। दिल्ली जल बोर्ड ने सिर्फ 12 जगहों पर फ्लो मीटर लगाए थे, जिनमें से चार पहले से ही खराब थे। बताया गया था कि 23 जगहों पर सीसीटीवी कैमरे लगाए गए थे, लेकिन सिर्फ 8 ही चालू पाए गए। बोर्ड का 310.26 MGD का सीवेज पंपिंग क्षमता का दावा भी बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया पाया गया, जबकि असल क्षमता 259.72 MGD थी।
दिल्ली जल बोर्ड ने सवालों का भी कोई जवाब नहीं दिया
दिल्ली सरकार ने पिछले साल केंद्र सरकार को एक रिपोर्ट में बताया था कि ISP एक स्वतंत्र मूल्यांकन के जरिए "पूरा और सत्यापित" हो चुका है। DJB ने 22 सितंबर 2025 को केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय को दी गई अपनी रिपोर्ट में कहा, ''यमुना निगरानी समिति ने एक टीम के जरिये ISP का स्वतंत्र मूल्यांकन करवाया। टीम ने पुष्टि की है कि ISP का सीवेज रोकने वाला हिस्सा पूरा हो चुका है।" जल बोर्ड ने तर्क दिया था कि सीवेज रोकने का काम तो हो गया है, लेकिन उसका ट्रीटमेंट तभी बेहतर होगा जब पुराने एसटीपी को ठीक किया जाएगा।
क्या था ISP प्रोजेक्ट?
2006 में लॉन्च हुए इस प्रोजेक्ट का लक्ष्य दिल्ली के तीन बड़े नालों (नजफगढ़, शाहदरा और सप्लीमेंट्री ड्रेन) में गिरने वाले छोटे नालों के गंदे पानी को रोकना और उसे ट्रीटमेंट प्लांट (STP) तक भेजना था। काम 2011 में शुरू हुआ और इसे 2015 तक पूरा होना था, लेकिन एक दशक की देरी के बाद भी इसके परिणाम जमीन पर नजर नहीं आ रहे हैं।


