
साफ हवा चाहिए तो दिल्ली में लगाना होगा कोविड जैसा लॉकडाउन; किसने दिए सुझाव?
एक नई स्टडी की सलाह अगर मानी जाए तो दिल्ली 20240 तक साफ हो जाएगी, लेकिन इसके लिए कोविड जैसा लॉकडाउन लगाना पड़ेगा। 0 तक 2040: दिल्ली के वायु गुणवत्ता लक्ष्य तक पहुंचने में निष्क्रियता और देरी की कीमत) शीर्षक वाले इस अध्ययन ने 1989 से 2025 तक 36 वर्षों में दिल्ली की PM 2.5 सांद्रता का विश्लेषण किया।
दिल्ली साफ हवा को तरस रही है। हर सांस पर भारी पड़ती जहरीली हवा ने लोगों का जीना मुहाल कर रखा है। हर समस्या का समाधान है, सो पलूशन का भी है। एक नई स्टडी की सलाह अगर मानी जाए तो दिल्ली 20240 तक साफ हो जाएगी, लेकिन इसके लिए कोविड जैसा लॉकडाउन लगाना पड़ेगा। '40 by 2040: Cost of inaction and delays in reaching Delhi’s air quality target' (40 तक 2040: दिल्ली के वायु गुणवत्ता लक्ष्य तक पहुंचने में निष्क्रियता और देरी की कीमत) शीर्षक वाले इस अध्ययन ने 1989 से 2025 तक 36 वर्षों में दिल्ली की PM 2.5 सांद्रता (Concentrations) का विश्लेषण किया।
हवा के गुणवत्ता का अध्ययन करने वाले शोधकर्ताओं, सरथ गुट्टीकुंडा और साई कृष्णा दम्मलापति की ओर से किए गए इस विश्लेषण का तर्क है कि प्रदूषण के निम्नलिखित संयुक्त उपायों से शहर को केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की ओर से निर्धारित 40 $\mu g/m^3$ के राष्ट्रीय परिवेश मानक तक पहुंचने में मदद मिल सकती है-
➤सभी मानवजनित (anthropogenic) स्रोतों से उत्सर्जन में 55% तक की कमी।
➤सर्दियों में हीटिंग (गर्माहट) के लिए होने वाले उत्सर्जन में 75% की कमी।
➤पराली जलाने से होने वाले उत्सर्जन में 100% की कमी।
अध्ययन में कहा गया है कि 2019 से 2025 के बीच, कई नीतिगत घोषणाओं के बावजूद, शहर का वार्षिक औसत प्रदूषण लगातार 100 \mu g/m^3 के आसपास रहा है। यह राष्ट्रीय मानक से 2.5 गुना अधिक और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के 5 \mu g/m^3 के दिशानिर्देश से 20 गुना अधिक है। अध्ययन इसका कारण वैज्ञानिक या नीतिगत जानकारी की कमी के बजाय सीधे तौर पर कार्यान्वयन (implementation) में होने वाली देरी को मानता है। यह बताता है कि अगर 'राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम' (National Clean Air Programme) की 2019 की स्वच्छ वायु योजना में सूचीबद्ध हर कार्रवाई को तय समय पर लागू किया गया होता, तो दिल्ली 2040 तक या उससे पहले भी राष्ट्रीय वार्षिक परिवेश मानक को पूरा कर सकती थी।
शोधकर्ता कोविड-19 लॉकडाउन को एक मानक (benchmark) के रूप में इस्तेमाल करते हैं यह बताने के लिए कि तकनीकी रूप से क्या संभव है। वे कहते हैं कि लॉकडाउन प्रतिबंधों के दौरान केवल दो ऐसे सेक्टर थे जो अप्रभावित रहे:
➤हीटिंग (गर्माहट): यह केवल सर्दियों के महीनों तक सीमित एक घटना है इसलिए मार्च, अप्रैल और मई के दौरान अप्रभावी रही।
➤पराली जलाना: कटाई के बाद के कृषि अवशेषों को जलाने का यह कार्य भी वसंत (spring) के उन महीनों के दौरान बहुत सीमित था।





