डरी-सहमी-रोती आई थी इशरत जहां, लौटी समेटे उम्मीदों का आसमां; DSCI में कैसे कायापलट?

Pramod Praveen लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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बकौल इशरत, यहां के डॉक्टर सिर्फ मेडिकल साइंस के विशेषज्ञ ही नहीं, बल्कि हमारी उम्मीद के रचनाकार भी हैं। उन्होंने मुझे कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि मैं एक गंभीर बीमारी से लड़ रही हूँ।

डरी-सहमी-रोती आई थी इशरत जहां, लौटी समेटे उम्मीदों का आसमां; DSCI में कैसे कायापलट?

राष्ट्रीय राजधानी में दिल्ली सरकार के कैंसर हॉस्पिटल यानी दिल्ली स्टेट कैंसर इन्स्टीट्यूट (DSCI) कैंसर मरीजों के देखभाल और इलाज में नए मानक गढ़ रहा है। रोते-बिलखते आए मरीजों के चेहरों पर खुशियां बिखेर रहा है। मरीज यहां इलाज करवाकर उम्मीदों का आसमां समेटे लौट रहे हैं। ये हम नहीं कह रहे बल्कि यहां की मरीज कह रही हैं, जो अपना इलाज कराकर खुशी-खुशी लौटी हैं।

इशरत जहां नाम की एक महिला मरीज ब्रेस्ट कैंसर का इलाज कराने यहां पहुंची थी। वह बहुत परेशान थीं और भविष्य को लेकर आशंकित थीं लेकिन डॉक्टरों से इलाज और मानवीय देखभाल से वह सारे गम भूल गईं। वह अब अस्पताल के डॉक्टर और स्टाफ को अपना परिवार बता रही हैं। कह रही हैं कि यहां घर जैसी देखभाल मिली।

इशरत जहां ने कहा, "मुझे पहली बार अपने कैंसर के बारे में पता चला, तो ऐसा लगा जैसे मेरी पूरी दुनिया रुक गई हो। डर, अनिश्चितता और अनगिनत सवालों ने मुझे घेर लिया था लेकिन कहते हैं न … जब ज़िंदगी सबसे कठिन मोड़ पर लाती है, तब वह सबसे अच्छे लोगों से भी मिलवाती है। मेरे लिए दिल्ली स्टेट कैंसर अस्पताल के डॉक्टर्स, नर्सिंग स्टाफ और पूरा अस्पताल परिवार बन गया।"

बकौल इशरत, "यहां के डॉक्टर सिर्फ मेडिकल साइंस के विशेषज्ञ ही नहीं, बल्कि हमारी उम्मीद के रचनाकार भी हैं। उन्होंने मुझे कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि मैं एक गंभीर बीमारी से लड़ रही हूँ। हर परामर्श में उन्होंने पहले मेरे मन का इलाज किया, फिर मेरे शरीर का। जब मेरी आँखों में डर होता, उनकी आवाज़ में भरोसा होता। जब मैं कमजोर पड़ती, उनके शब्द मेरी ताकत बन जाते। उनके लिए यह भले ही रोज़ का काम हो, लेकिन मेरे लिए यह जीवनदान है। जिसके लिए इनका जितना आभार व्यक्त करूं कन है।"

उन्होंने नर्सिंग स्टाफ को भी फरिश्ते से कम नहीं बताया, जो दिन-रात की भागदौड़ के बावजूद उनके चेहरे की मुस्कान कभी कम होने नहीं देती थीं। इशरत कहती हैं, "दर्द में कराहते समय एक हल्का सा स्नेह भरा स्पर्श, रातों में बार-बार आकर हाल पूछना, दवा के समय प्यार से समझाना—इन छोटी-छोटी बातों ने मेरी यात्रा को सरल बनाया। उन्होंने मुझे सिर्फ मरीज नहीं, परिवार का हिस्सा समझा।"

इशरत ने बताया कि उपचार के दौरान कई दिन ऐसे आए जब लगा कि शायद मैं टूट जाऊँ, लेकिन तभी मेरे डॉक्टर की कही एक बात याद आती थी कि इलाज हम करेंगे, लड़ाई आप लड़ेंगे, जीत हम साथ मनाएँगे। और सच में, इस जीत में मैं अकेली नहीं हूँ… यह जीत हम सबकी है। उन्होंने कहा, "आज जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो केवल दर्द नहीं, मुझे मिले अपार प्रेम, देखभाल और दुआएँ भी दिखती हैं। मुझे एहसास हुआ कि ठीक होना सिर्फ बीमारी का चले जाना नहीं, बल्कि आशा और जीवन का फिर से लौट आना है और यह मेरे जीवन में लौट पाया, इन्हीं अद्भुत लोगों की वजह से।"

इशरत ने दिल्ली कैंसर इन्स्टीट्यूट दिलशाद गार्डेन के सभी डॉक्टर्स को धन्यवाद देते हुए कहा कि उन्होंने हमें इलाज ही नहीं बल्कि आत्मविश्वास भी दिया। उन्होंने उन नर्सों को भी याद किया जिन्होंने रातों को सुकून और दिनों में मुस्कान दी। अस्पताल से जाते हुए इशरत ने कहा, आज मैं नया जीवन जी रही हूँ, डर नहीं, उम्मीद संभाल कर, हौसला थाम कर और एक नई शुरुआत लेकर। आशा और विश्वास मेरे लिए अब केवल शब्द नहीं, मेरी वास्तविकता है।

इशरत जहां के इन शब्दों को सुनकर पैलेटिव केयर के सहायक प्रोफेसर डॉक्टर विक्रम प्रताप सिंह आह्लादित हैं। उन्होंने कहा, "कैंसर के मरीजों को उपचार से ज्यादा अस्पताल से उचित व्यवहार, प्यार की दरकार होती है। हमारी मुस्कराहट उनको लड़ने के लिए तैयार करती है। उनमें विश्वास बढ़ता है कि डॉक्टर खुश हैं मतलब डरने की बात नहीं है।"

क्लिनिकल oncologist की डॉक्टर अफ़साना शाह ने बताया कि ब्रेस्ट कैंसर मेट्रोपॉलिटन सिटी में सबसे कॉमन कैंसर है और पेशेंट को स्क्रीनिंग का नॉलेज ना होने की वजह से ज्यादातर पेशेंट एडवांस स्टेज में आते हैं और कुछ मरीज़ mets के साथ आते हैं जिनके बोन में मेटस पहुंच चुके होते हैं। इस वजह से वह काफी दर्द झेल रहे होते हैं। उन्होंने बताया कि इसमें हमारी पैलेटिव टीम का बहुत अच्छा रोल होता है जो न सिर्फ मरीज को दवा देते हैं बल्कि ट्रीटमेंट के साथ ढेर सारा प्यार देते हैं और उनका हौसला बढ़ाते हैं।

उन्होंने बताया कि अधिकांश मामलों में क्लिनिकल साइड से देखें तो हम पहले कीमो और रेडिएशन स्टार्ट करते हैं। जरूरत के हिसाब से सर्जरी की जाती है। उन्होंने कहा कि यह सारा ट्रीटमेंट उनको ठीक करने में और उनके दर्द को कम करने में बहुत कारगर होता है। उन्होंने बताया कि इशरत के साथ भी यही प्रोटोकॉल अपनाया गया। जब डॉक्टर अफसाना बता रही थीं, तब इशरत वहां भाव विभोर होकर मुस्करा रही थीं। उनके आसपास खड़ी पूरी टीम खुश नजर आ रही थी।

Pramod Praveen

लेखक के बारे में

Pramod Praveen

प्रमोद कुमार प्रवीण देश-विदेश की समसामयिक घटनाओं और राजनीतिक हलचलों पर चिंतन-मंथन करने वाले और पैनी पकड़ रखने वाले हैं। ईटीवी से पत्रकारिता में करियर की शुरुआत की। कुल करीब दो दशक का इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम करने का अनुभव रखते हैं। संप्रति लाइव हिन्दुस्तान में विगत तीन से ज्यादा वर्षों से समाचार संपादक के तौर पर कार्यरत हैं और अमूमन सांध्यकालीन पारी में बहुआयामी पत्रकारीय भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप से पहले NDTV, जनसत्ता, ईटीवी, इंडिया न्यूज, फोकस न्यूज, साधना न्यूज और ईटीवी में कार्य करने का अनुभव है। कई संस्थानों में सियासी किस्सों का स्तंभकार और लेखक रहे हैं। विश्वविद्यालय स्तर से लेकर कई अकादमिक, शैक्षणिक और सामाजिक संगठनों द्वारा विभिन्न मंचों पर अकादमिक और पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित भी हुए हैं। रुचियों में फिल्में देखना और पढ़ना-पढ़ाना पसंद, सामाजिक और जनसरोकार के कार्यों में भी रुचि है।

अकादमिक योग्यता: भूगोल में जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर और संवेदनशील विषय पर पीएचडी उपाधिधारक हैं। इसके साथ ही पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर भी हैं। पीएचडी शोध का विषय- 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन-एक भौगोलिक अध्ययन' रहा है। शोध के दौरान करीब दर्जन भर राष्ट्रीय और अंततराष्ट्रीय सम्मेलनों में शोध पत्र पढ़ने और प्रस्तुत करने का अनुभव है। भारतीय विज्ञान कांग्रेस में भी शोध पोस्टर प्रदर्शनी का चयन हो चुका है। शोध पर आधारित एक पुस्तक के लेखक हैं। पुस्तक का नाम 'मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन' है। पत्रकारिता में आने से पहले महाविद्यालय स्तर पर शिक्षण कार्य भी कर चुके हैं।

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