दिल्ली दंगाः 7 गवाहों के सच ने दिलाया अंकित को इंसाफ, चश्मदीदों ने सुनाई आंखों देखी दास्तां
दिल्ली दंगा के दौरान आईबी अधिकारी अंकित शर्मा की हत्या मामले में ताहिर हुसैन को दोषी ठहराने में कोर्ट ने 7 लोगों के गवाही को अहम माना। अभियोजन पक्ष द्वारा कुल 91 गवाह पेश किए गए। इनमें से सात गवाह ऐसे थे, जिन्हें इस जघन्य हत्याकांड का चश्मदीद माना गया।

उत्तर-पूर्वी दिल्ली में दंगों के दौरान आईबी अधिकारी अंकित शर्मा की हत्या मामले में सात प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही को अदालत ने अहम माना। इन गवाहों ने अदालत के सामने पूरी बात रखी, जिससे घटना की कड़ी जुड़ती चली गई। इसके साथ ही अदालत ने फैसले में वैज्ञानिक साक्ष्यों के साथ-साथ अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए कुल 91 गवाहों के बयानों को भी बेहद महत्वपूर्ण और न्यायसंगत माना है। इन 91 गवाहों में प्रत्यक्षदर्शी, पुलिस अधिकारी, चिकित्सक, फोरेंसिक विशेषज्ञ, जांच अधिकारी, मोबाइल कंपनियों के नोडल अधिकारी और अन्य औपचारिक गवाह शामिल थे।
ट्रायल के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि इन 91 गवाहों में से केवल सात गवाह ऐसे थे, जिन्हें इस जघन्य हत्याकांड का चश्मदीद माना गया। इन प्रत्यक्षदर्शियों में बनी बेकरी की दुकान के मालिक विकल्प कोचर और ज्ञानेंद्र कोचर, प्रदीप वर्मा, हेड कांस्टेबल राहुल, हेड कांस्टेबल प्रवीण, आकाश और भारत शामिल थे। अदालत में चली बहस के दौरान पाया गया कि इनमें से विकल्प और ज्ञानेंद्र प्रत्यक्षदर्शी थे, क्योंकि वारदात के वक्त वे घटनास्थल के बिल्कुल पास मौजूद अपनी दुकान पर ही थे।
चश्मदीदों की आंखों देखी दास्तां
अंकित हत्याकांड के प्रत्यक्षदर्शी और चांद बाग पुलिया स्थित ‘बनी बेकरी’ के मालिक विकल्प कोचर की गवाही को कोर्ट ने आरोपियों का अपराध सिद्ध करने में सबसे ठोस माना। विकल्प ने कोर्ट को बताया कि फरवरी 2020 में दंगों के दौरान हिंसक भीड़ ने उनकी बेकरी की दुकान को आग के हवाले कर दिया था। वारदात वाले दिन शाम करीब चार से साढ़े पांच बजे के बीच जब उनकी दुकान जल रही थी और कुछ बच्चे व लड़के वहां से चॉकलेट और खाने-पीने का सामान लूट रहे थे, उसी समय आईबी में काम करने वाले अंकित शर्मा अपने दो-तीन साथियों के साथ उस हिंसक भीड़ की तरफ बढ़े थे। जैसे ही अंकित ने भीड़ के भीतर प्रवेश किया, दंगाइयों ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया और हमले किए।
तख्ते की मदद से नाले में फेंका
हमले के कारण खून से लथपथ अंकित बेहोश होकर गिर गए। भीड़ में से हेलमेट पहने एक शख्स आगे आया और दो अन्य लड़कों ने उसे कपड़ों से तैयार एक फंदा थमाया, जिसे अंकित के गले में डाल दिया गया। शव भारी होने के कारण हेलमेट वाला शख्स उसे अकेले नहीं घसीट पाया, जिसके बाद उन दोनों लड़कों ने भी उसकी मदद की। ये तीनों मिलकर शव को घसीटकर पुलिया के बीच तक ले गए और एक लकड़ी के तख्ते की मदद से उसे नाले में फेंकने की कोशिश की, लेकिन वहां लगी लोहे की ऊंची ग्रिल और फेंसिंग के कारण वे नाकाम रहे। इसके बाद दंगाई शव को घसीटते हुए पुलिया के दूसरी तरफ ले गए, जहां का गेट खुला हुआ था और दीवार छोटी थी। दंगाइयों ने उसी लकड़ी के तख्ते का इस्तेमाल कर अंकित के शव को नीचे धकेल दिया।
मृतक के पिता के हस्ताक्षरों को बताया था फर्जी
बचाव पक्ष ने अदालत में मुख्य शिकायत पर ही गंभीर सवाल उठाते हुए इसे पुलिस की साजिश करार दिया। वकीलों ने दलील दी कि जब मृतक अंकित शर्मा के पिता रविंद्र शर्मा को अदालत में उनकी कथित लिखित शिकायत दिखाई गई, तो उन्होंने साफ तौर पर कह दिया कि इस शिकायत पर उनके हस्ताक्षर नहीं हैं। उन्होंने अदालत को बताया कि उस दस्तावेज पर अंग्रेजी में हस्ताक्षर किए गए थे, जबकि वह हमेशा केवल हिंदी में ही हस्ताक्षर करते हैं। इस विसंगति को आधार बनाते हुए बचाव पक्ष ने कोर्ट में तर्क दिया कि पुलिस ने ताहिर हुसैन को इस मामले में जबरन घसीटने के लिए खुद ही यह फर्जी शिकायत तैयार की थी।
ताहिर की पीसीआर कॉल पर कोर्ट को संदेह
सुनवाई के दौरान ताहिर हुसैन ने अदालत में दावा किया कि वह दंगों में शामिल नहीं थे, बल्कि स्वयं हिंसा के शिकार थे। बचाव पक्ष ने चार्जशीट और कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर) का हवाला देते हुए बताया कि 24 फरवरी 2020 को दोपहर 3:53 बजे ताहिर ने पुलिस कंट्रोल रूम (पीसीआर) को फोन कर घर की छत पर लोगों के चढ़ने और पथराव की सूचना दी थी। हालांकि, अदालत ने इस कॉल पर संदेह जताते हुए कहा कि उस समय तक उनके घर की छत के इस्तेमाल की खबरें सामने आ चुकी थीं। इसलिए अदालत ने पूछा कि यह कॉल मदद के लिए थी या बचाव की रणनीति।
लेखक के बारे में
Subodh Kumar Mishraसुबोध कुमार मिश्रा पिछले 19 साल से हिंदी पत्रकारिता में योगदान दे रहे हैं। वर्तमान में वह 'लाइव हिन्दुस्तान' में स्टेट डेस्क पर बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। दूरदर्शन के 'डीडी न्यूज' से इंटर्नशिप करने वाले सुबोध ने पत्रकारिता की विधिवत शुरुआत 2007 में दैनिक जागरण अखबार से की। दैनिक जागरण के जम्मू एडीशन में बतौर ट्रेनी प्रवेश किया और सब एडिटर तक का पांच साल का सफर पूरा किया। इस दौरान जम्मू-कश्मीर को बहुत ही करीब से देखने और समझने का मौका मिला। दैनिक जागरण से आगे के सफर में कई अखबारों में काम किया। इनमें दिल्ली-एनसीआर से प्रकाशित होने वाली नेशनल दुनिया, नवोदय टाइम्स (पंजाब केसरी ग्रुप), अमर उजाला और हिन्दुस्तान जैसे हिंदी अखबार शामिल हैं। अखबारों के इस लंबे सफर में खबरों को पेश करने के तरीकों से पड़ने वाले प्रभावों को काफी बारीकी से समझने का मौका मिला।
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