अगर हमने उन्हें मारा तो हमें किसने मारा; संसद में बैठे नेताओं पर भी बोले पूर्व ACP
दिल्ली पुलिस के एक पूर्व अधिकारी ने कहा कि पैलेट गन को लेकर हौवा बनाया जा रहा है। आम जनता नहीं जानती कि पैलेट गन क्या होती है। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि अगर हमने उग्र प्रदर्शनकारियों को मारा तो हमें किसने मारा। इस बात का हमें जवाब चाहिए।

दिल्ली पुलिस महासंघ के एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में पूर्व ACP केपी कुकरेती ने संसद मार्च के दौरान हुई हिंसा को लेकर पुलिसकर्मियों का बचाव किया। कहा कि जब किसी पुलिस अधिकारी की जान को सीधा खतरा हो तो उन्हें मौके पर जरूरी कार्रवाई करने का अधिकार होता है। पूर्व एसीपी ने कहा कि संसद में जिम्मेदार नेता बैठे हैं। वे कभी पुलिस अधिकारी नहीं रहे, न ही उन्होंने कोई पुलिस ट्रेनिंग ली है, और न ही वे कानूनी विशेषज्ञ हैं। मुझे नहीं पता कि वे किस आधार पर ऐसे दावे करते हैं कि केंद्रीय गृह मंत्री व्यक्तिगत रूप से आदेश जारी करते हैं और सब कुछ उनके निर्देश पर होता है।
पूर्व एसीपी ने कहा कि आखिर पैलेट गन क्या है? एक हौवा बना दिया गया है पैलेट गन का। पैलेट गन क्या होती है, यह आम जनता को नहीं पता। आम जनता के पास एक भ्रामक संदेश गया है। इसमें कहा गया है कि केंद्रीय गृह मंत्री इसके इस्तेमाल का आदेश देते हैं। यह सरासर गलत है। हमारे भी बच्चे हैं। हमारे पास पूरी तरह से लोकतांत्रिक व्यवस्था है।
…तो पुलिस के पास क्या विकल्प बचता है?
पूर्व अधिकारी ने कहा कि छात्रों के पास संवैधानिक और मौलिक अधिकार हैं। विरोध-प्रदर्शन होते हैं। और क्यों न हों? हमने अनगिनत विरोध-प्रदर्शन देखे हैं। हालांकि, भीड़ को नियंत्रित करना एक अलग बात है। भीड़ को आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है। लेकिन जब भीड़ हिंसक और उग्र हो जाती है और गैर-कानूनी जमावड़ा बना लेती है, तो उसका हर सदस्य जिम्मेदार हो जाता है। जब भीड़ बेकाबू हो जाती है, लोग चीजें फेंकते हैं, लाठियों और पत्थरों का इस्तेमाल करते हैं, बैरिकेड तोड़ते हैं और धारा 163 के तहत दी गई चेतावनियों (जिनमें जमावड़े को गैर-कानूनी घोषित किया गया हो) को नजरअंदाज करते हैं, तो पुलिस के पास क्या विकल्प बचता है? गोली चलाना जरूरी हो सकता है। कानून खुद ऐसे हालात में ऐसी कार्रवाई की इजाजत देता है।
पुलिस अधिकारी की जान को खतरा हो तो…
पूर्व एसीपी ने कहा कि जब किसी पुलिस अधिकारी की जान को सीधा खतरा हो तो उन्हें मौके पर जरूरी कार्रवाई करने का अधिकार होता है। ऐसी जगह पर न तो गवर्नर, न मुख्यमंत्री और न ही गृह मंत्री मौजूद होते हैं। मौके पर मौजूद सीनियर अधिकारी को ही यह तय करना होता है कि अपनी जान, आम लोगों, सरकारी संपत्ति, संसद भवन और खुद सांसदों की सुरक्षा कैसे की जाए। उन्होंने कहा कि इससे बड़ी अराजकता क्या होती कि लोग संसद में घुस जाते।
जितना अधिकार जनता को उतना ही पुलिसवालों को
पूर्व एसीपी ने कहा कि जहां कमिश्नरेट सिस्टम होता है, वहां मौके पर मौजूद सक्षम अधिकारी ही बल प्रयोग करने का आदेश देता है। आज तक हमने सैकड़ों विरोध-प्रदर्शन हैंडल किए हैं। कभी किसी ने शिकायत नहीं की। सेल्फ डिफेंस का जितना अधिकार आम जनता को है, उतना ही पुलिसवालों को भी है। उन्होंने कहा कि 128 पुलिसकर्मियों के घायल होने का मतलब है कि उन्होंने काफी संयम दिखाया है।
हमें जवाब चाहिए
उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि अगर हमने उन्हें मारा तो हमें किसने मारा। इस बात का जवाब हमें चाहिए। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में जो कुछ कहा है, हम उससे संतुष्ट हैं। हमें उसके बारे में कुछ नहीं कहना है। पूर्व एसीपी ने यह ही कहा कि हम उन पुलिसकर्मियों के परिजनों के साथ खड़े हैं, जो विरोध-प्रदर्शन में घायल हुए हैं।


