कौन था बहलोल लोदी? जिसका मकबरा बना दिल्ली में शराबियों का अड्डा, गंदगी और टूटी कब्रें

Jan 18, 2026 12:29 pm ISTUtkarsh Gaharwar लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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चिराग दिल्ली दरगाह के ठीक पीछे स्थित यह मकबरा अब कचरा फेंकने की जगह बन गया है। रखरखाव का कोई नामो-निशान तक नहीं दिखता। 'हिंदुस्तान टाइम्स' (HT) के गुरुवार को किए गए निरीक्षण में यह जानकारी सामने आई है।

कौन था बहलोल लोदी? जिसका मकबरा बना दिल्ली में शराबियों का अड्डा, गंदगी और टूटी कब्रें

चिराग दिल्ली की गलियों के भीतर लोदी वंश के संस्थापक बहलोल लोदी का मकबरा आज बदहाली और भारी उपेक्षा का शिकार है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की ओर से संरक्षित होने के बावजूद, यह ऐतिहासिक स्थल अपनी पहचान खो रहा है। यहां टूटी हुई कब्रें और चारों तरफ से इस जगह को घेरते नए निर्माण दिखाई देते हैं। परिसर अब खुलेआम शराब पीने वालों का अड्डा बन चुका है। इस पूरे परिसर में ऐतिहासिक स्मारक होने का एकमात्र संकेत कोने में लगा एक सुनसान और पुराना ASI का साइनबोर्ड है।

समय के साथ क्या बदल गया?

चिराग दिल्ली दरगाह के ठीक पीछे स्थित यह मकबरा अब कचरा फेंकने की जगह बन गया है। रखरखाव का कोई नामो-निशान तक नहीं दिखता। 'हिंदुस्तान टाइम्स' (HT) के गुरुवार को किए गए निरीक्षण में यह जानकारी सामने आई है। शहर में हेरिटेज वॉक आयोजित करने वाले संगठन 'दिल्ली कारवां' के आसिफ खान देहलवी ने बताया कि वह इस क्षेत्र से अच्छी तरह परिचित हैं और कुछ दशक पहले यहां ऐसी स्थिति नहीं थी। पहले स्थानीय लोग इस जगह के इतिहास का सम्मान करते थे और मकबरे का पिछला दरवाजा चिराग दिल्ली दरगाह के साथ साझा होता था। समय के साथ दरगाह ने वह दरवाजा बंद कर दिया, जिससे मकबरा और भी अलग-थलग पड़ गया। इस अलगाव के कारण स्थानीय युवाओं ने इसका गलत इस्तेमाल शुरू कर दिया है, जो नियमित रूप से वहां शराब पीते हैं और हुड़दंग मचाते हैं।

कौन था बहलोल लोदी?

बहलोल लोदी (1451-1489 ई.) दिल्ली सल्तनत के लोदी वंश के संस्थापक थे, जो अफगान मूल के थे और सैयद वंश के पतन के बाद 1451 में सुल्तान बने। उन्होंने अपने शासनकाल में जौनपुर सल्तनत को जीतकर राज्य का विस्तार किया और अफगान सरदारों के साथ मेल-मिलाप की नीति अपनाई, जिससे राज्य में स्थिरता आई। उन्होंने जौनपुर सल्तनत को जीतकर अपने राज्य की सीमाओं का विस्तार किया और ग्वालियर, मेवात जैसे क्षेत्रों पर भी कब्जा किया था। 1489 में दिल्ली में उनकी मृत्यु हो गई और उनके पुत्र सिकंदर लोदी ने उनका उत्तराधिकारी संभाला था। यह वही लोदी वंश है जिसे हराकर बाबर ने बाद में मुगल साम्राज्य की स्थापना की थी।

bahlol lodi tomb

पुरातत्व विभाग (ASI) की 2001 में प्रकाशित पुस्तक “Delhi and Its Neighbourhood” के अनुसार, मालवीय नगर-कालकाजी रोड पर स्थित यह गांव धीरे-धीरे नासिरुद्दीन महमूद की दरगाह के चारों ओर बसा था। नासिरुद्दीन महमूद को 'रोशन चिराग-ए-दिल्ली' (दिल्ली का जगमगाता चिराग) की उपाधि दी गई थी। वे हजरत निजामुद्दीन के शिष्य थे और उनके बाद चिश्ती संप्रदाय के प्रमुख बने। पुस्तक के अनुसार, यह मकबरा लोदी वंश के संस्थापक बहलोल लोदी (शासनकाल: 1451-88) का है।

मकबरे की वास्तुकला

पुस्तक में बताया गया है कि यह स्मारक एक चौकोर कक्ष के रूप में बना है। इसके प्रत्येक तरफ तीन मेहराबदार द्वार हैं। इस संरचना के ऊपर पांच गुंबद बने हुए हैं, जिनमें बीच वाला गुंबद बाकी अन्य गुंबदों से बड़ा है। मेहराबों को कुरान की आयतों और पदकों से सजाया गया है। 'हिंदुस्तान टाइम्स' (HT) के निरीक्षण में पाया गया कि यहां इसके ऐतिहासिक महत्व को बताने वाली कोई स्पष्ट जानकारी मौजूद नहीं है। परिसर के एक कोने में एएसआई का इकलौता साइनबोर्ड लगा है। इस बोर्ड पर चेतावनी लिखी है कि प्राचीन स्मारक और पुरातत्व स्थल अवशेष अधिनियम 1958 के तहत इसे राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित किया गया है। बोर्ड के अनुसार, जो कोई भी इस स्मारक को नष्ट करेगा, हटाएगा, नुकसान पहुंचाएगा या इसका दुरुपयोग करेगा, उसे जेल की सजा हो सकती है।

bahlol lodi image

बहाली और गंदगी की समस्या

इस ऐतिहासिक ढांचे को नष्ट कर दिया गया है और इसकी सूरत पूरी तरह बिगाड़ दी गई है। परिसर के भीतर निर्माण सामग्री (जैसे मलबा) जमा है और सीवेज का पानी भी अंदर रिस रहा है। एक स्थानीय निवासी ने बताया कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के लोग आकर परिसर की सफाई तो करते हैं, लेकिन कुछ ही दिनों में स्थिति फिर वैसी ही हो जाती है। स्थानीय निवासी के अनुसार, कई स्थानीय युवक मकबरे के परिसर में अवैध नशीले पदार्थों का सेवन करते हैं। ये लोग वहां से गुजरने वाले अन्य स्थानीय लोगों के साथ बदतमीजी भी करते हैं, जिससे यह जगह एक बड़ी परेशानी बन गई है। यहां आने वाले लोगों को इस मकबरे के समृद्ध इतिहास की कोई परवाह नहीं है।

निवासी ने पुष्टि की कि लगभग एक दशक पहले दरगाह और मकबरे के बीच के साझा दरवाजे को स्थायी रूप से बंद कर दिया गया था, जिसके बाद मकबरे की उपेक्षा और बढ़ गई। आधिकारिक तौर पर यह मकबरा दरगाह के परिसर का हिस्सा नहीं है; पहले दरगाह आने वाले लोग सम्मान के तौर पर यहां भी आ जाते थे। दरगाह के बुजुर्गों की ओर से स्थानीय लोगों से सहयोग की अपील के बावजूद जब कचरा फेंकने की घटनाएं बढ़ीं, तो सुरक्षा के लिहाज से दरवाजा बंद करने का फैसला लिया गया।

ASI अधिकारी का क्या कहना है?

एएसआई (ASI) दिल्ली सर्कल के अधीक्षक पुरातत्वविद् राजकुमार पटेल ने इस स्थिति पर अपना पक्ष रखते हुए स्वीकार किया कि इस स्मारक के बारे में लोगों को और अधिक संवेदनशील और जागरूक बनाने की आवश्यकता है। पटेल ने बताया कि एएसआई के तमाम प्रयासों के बावजूद स्थानीय निवासियों से उन्हें सहयोग नहीं मिल रहा है, जो लगातार मकबरे के परिसर में कचरा फेंक रहे हैं। उन्होंने यह भी जानकारी दी कि परिसर को प्रतिदिन साफ करने के लिए एक विशेष टीम तैनात की गई है जो लगातार काम कर रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि मुख्य ढांचे को किसी बड़े मरम्मत कार्य की आवश्यकता नहीं है, लेकिन अवैध निर्माण के कारण स्मारक की बाउंड्री वॉल (चारदीवारी) क्षतिग्रस्त हो गई है। इस समस्या के समाधान के लिए एएसआई इसे अगले वित्तीय वर्ष के लिए एक प्राथमिकता वाली परियोजना (Priority Project) के रूप में शामिल करने का प्रयास कर रहा है।

Utkarsh Gaharwar

लेखक के बारे में

Utkarsh Gaharwar
एमिटी और बेनेट विश्वविद्यालय से पत्रकारिता के गुर सीखने के बाद अमर उजाला से करियर की शुरुआत हुई। अमर उजाला में बतौर एंकर सेवाएं देने के बाद 3 साल नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में डिजिटल कंटेंट प्रोड्यूसर के पद पर काम किया। वर्तमान में लाइव हिंदुस्तान में डिजिटल कंटेंट प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हूं। एंकरिंग और लेखन के अलावा मिमिक्री और थोड़ा बहुत गायन भी कर लेता हूं। और पढ़ें
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