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वकीलों के आफिस कॉमर्शियल प्लेस नहीं; दिल्ली HC का बड़ा फैसला, NDMC की दलील खारिज

वकीलों के आफिस कॉमर्शियल प्लेस नहीं; दिल्ली HC का बड़ा फैसला, NDMC की दलील खारिज

संक्षेप: दिल्ली हाई कोर्ट ने बुधवार को वकीलों के हक में एक बड़ा निर्णय देते हुए कहा कि आवासीय बेसमेंट से वकील का ऑफिस चलाना एनडीएमसी अधिनियम के तहत परिसर का दुरुपयोग नहीं माना जा सकता है। विस्तृत जानकारी के लिए पढ़ें यह रिपोर्ट…

Wed, 15 Oct 2025 06:34 PMKrishna Bihari Singh एएनआई, नई दिल्ली
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दिल्ली हाई कोर्ट ने बुधवार को वकीलों के हक में एक बड़ा निर्णय देते हुए कहा कि एनडीएमसी अधिनियम के तहत किसी वकील के ऑफिस को कॉमर्शियल गतिविधि के तौर पर नहीं माना जा सकता है। इसके साथ ही जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने एक अधिवक्ता के खिलाफ 22 साल पुरानी आपराधिक शिकायत को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि आवासीय बेसमेंट से वकील का ऑफिस चलाना परिसर का दुरुपयोग नहीं माना जा सकता है। इसे लैंड यूज यानी जमीन के इस्तेमाल में बदलाव भी नहीं माना जा सकता है।

अदालत ने कहा कि किसी भी वकील का दफ्तर खोलना कोई कॉमर्शियल गतिविधि नहीं है। कानूनी पेशा व्यक्तिगत योग्यता और बौद्धिक कौशल पर निर्भर एक पेशा है। यह लाभ-हानि वाले व्यापार या व्यवसाय से अलग है। इसके साथ ही अदालत ने एनडीएमसी की दलील को खारिज कर दी।

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि कानूनी पेशा लाभ-हानि वाले व्यापार या व्यवसाय से अलग है। इसे कॉमर्शियल गतिविधि के दायरे में नहीं रखा जा सकता है। इसकी तुलना कॉमर्शियल उपक्रमों से नहीं की जा सकती है।

अदालत ने बॉम्बे हाईकोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट के फैसलों का भी हवाला दिया। केस NDMC की ओर से 2004 में दाखिल एक शिकायत से निकला था। आरोप था कि वकील ने NDMC की अनुमति के बिना सुजान सिंह पार्क स्थित गोल्फ अपार्टमेंट्स स्थित अपने बेसमेंट का गलत इस्तेमाल करते हुए ऑफिस चलाया।

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एनडीएमसी ने अपनी दलील में कहा कि वकील का यह कृत्य एनडीएमसी एक्ट 1994 की धारा 252 और 369(1) का उल्लंघन है। यह कानून बिना अनुमति के परिसर के इस्तेमाल में बदलाव को रोकता है। जस्टिस कृष्णा की अदालत ने कहा कि दिल्ली मास्टर डेवलपमेंट प्लान (एमडीपी) 2001 और भवन उपनियम, 1983 आवासीय संपत्ति के 25 फीसदी तक हिस्से का व्यावसायिक उद्देश्यों जैसे वकील का दफ्तर के लिए इस्तेमाल की अनुमति देते हैं।

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अदालत ने आगे कहा कि उक्त कानून का उपनियम खंड 14.12.1(vii) भी दफ्तर के लिए बेसमेंट के इस्तेमाल की अनुमति देता है बशर्ते वह एसी हो जैसा कि याचिकाकर्ता का दफ्तर था। इसके साथ अदालत ने अपने फैसले में कहा कि दो दशक से अधिक समय बाद आपराधिक मामले को जारी रखने की अनुमति देना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। ऐसे में यह अदालत शिकायत और अन्य कार्यवाहियों को रद्द करती है। राष्ट्रीय राजधानी में काम करने वाले वकीलों के लिए इस फैसले को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

Krishna Bihari Singh

लेखक के बारे में

Krishna Bihari Singh
पत्रकारिता में करीब 14 वर्षों से केबी उपनाम से पहचान रखने वाले कृष्ण बिहारी सिंह लाइव हिन्दुस्तान में कार्यरत हैं। वह लोकमत, राष्ट्रीय सहारा, अमर उजाला और दैनिक जागरण अखबार में विभिन्न पदों पर काम कर चुके हैं। उन्होंने साल 2019 में जागरण डॉट कॉम से डिजिटल मीडिया में कदम रखा। मूलरूप से यूपी के मऊ जिले से ताल्लुक रखने वाले केबी महाराष्ट्र, हरियाणा और दिल्ली में पत्रकारिता कर चुके हैं। लॉ और साइंस से ग्रेजुएट केबी ने महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन में एमफिल किया है। वह भारतीय राजनीति और वैश्विक मामलों के साथ जन सरोकार और क्राइम की खबरों पर पैनी नजर रखते हैं। और पढ़ें
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