उम्रकैद काट रहे दोषी को राहत; बेटी के एडमिशन के लिए मिली परोल, क्या बोला दिल्ली HC?
दिल्ली हाई कोर्ट के अनुसार, सह-दोषी के पैरोल पर होने से दूसरे दोषी की फरलो नहीं रोकी जा सकती है। अदालत ने उम्रकैद काट रहे व्यक्ति को दो हफ्ते की छुट्टी देने का आदेश दिया है ताकि वह बेटी का दाखिला करा सके…

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि किसी अपराधी का साथी पहले से पैरोल पर बाहर है तो केवल इस आधार पर दूसरे अपराधी को फरलो देने से इनकार नहीं किया जा सकता है। अदालत ने उम्रकैद की सजा काट रहे एक व्यक्ति को 2 हफ्ते की फरलो पर रिहा करने का आदेश दिया ताकि वह अपनी 16 साल की बेटी का 11वीं कक्षा में दाखिला करा सके। जेल प्रशासन ने पहले उसे छोड़ने से मना कर दिया था, लेकिन कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अच्छे व्यवहार के लिए मिलने वाली फरलो पर सह-दोषी के बाहर होने से कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए। खासकर तब जब मामला बच्चे के भविष्य और जरूरी पारिवारिक जिम्मेदारी से जुड़ा हो।
जेल अधिकारियों ने क्यों नहीं किया रिहा?
जस्टिस मनोज जैन की पीठ ने यह आदेश आजीवन कारावास काट रहे दोषी की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। इस दोषी की 2 हफ्ते की फरलो मंजूर की गई लेकिन जेल अधिकारियों ने उसे इस आधार पर रिहा नहीं किया कि उसका सह-दोषी पहले से ही पैरोल पर है।
बेटी के दाखिले के लिए मिली पैरोल
याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट में याचिका दायर करते हुए हुए कहा कि उसकी 16 साल की बेटी का कक्षा ग्याहरवीं में दाखिला करवाने के लिए उसकी मौजूदगी जरूरी है। उसने इस बात की भी आशंका जताई कि उसका सह-दोषी अपने पैरोल की अवधि बढ़वाने की कोशिश कर सकता है, जिससे उसकी अपनी रिहाई में और देरी हो सकती है।
एक साथ रिहाई मंजूर नहीं
पीठ ने इस बात पर ध्यान दिया कि दिल्ली जेल नियमों के तहत सह-दोषियों की एक साथ रिहाई आमतौर पर मंजूर नहीं होती, लेकिन ऐसी रिहाई पर कोई पूरी तरह से रोक भी नहीं है।
नहीं आनी चाहिए रुकावट
फरलो के मकसद पर जोर देते हुए (जो कि अच्छे आचरण के लिए एक प्रोत्साहन है) पीठ ने कहा कि सिर्फ इस बात से कि कोई सह-आरोपी पैरोल पर है, फरलो में कोई रुकावट नहीं आनी चाहिए। खासकर तब जब दोषी की मौजूदगी किसी जरूरी पारिवारिक जिम्मेदारी को निभाने के लिए जरूरी हो। पीठ ने कहा कि फरलो देना महज़ अच्छे आचरण के लिए एक प्रोत्साहन है। सिर्फ इस बात से कि कोई सह-आरोपी पहले से ही पैरोल पर है, दोषी के बच्चे का दाखिला करवाने में कोई रुकावट नहीं आनी चाहिए। इसलिए पीठ ने संबंधित अधिकारी को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को पहले से मंजूर की गई दो हफ्ते की फरलो अवधि के लिए तीन दिनों के अंदर रिहा किया जाए।
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Krishna Bihari Singhकृष्ण बिहारी सिंह वरिष्ठ पत्रकार और स्टेट टीम का हिस्सा (दिल्ली-NCR, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, राजस्थान और गुजरात )
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