मां-बाप की लड़ाई में बच्चे ही पिसते हैं; महिला की याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट की बड़ी टिप्पणी
एक महिला ने फैमिली कोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी। हाई कोर्ट ने बच्चे की कस्टडी को लेकर एक याचिका में सुनवाई करते हुए कहा कि मां-बाप के झगड़े में बच्चे ही पिसते हैं।

Delhi High Court News: मां-बाप की लड़ाई में बच्चे ही पिसते हैं, उनको मानसिक और शारिरिक कष्ट होता है...। शुक्रवार को एक मामले की सुनवाई करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने अहम टिप्पणी की। मामला बच्चे को कस्टडी से जुड़ा है। महिला ने फैमिली कोर्ट के आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। जिसे हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया।
हाई कोर्ट ने टिप्पणी की कि माता-पिता में से कोई भी बच्चे को दूसरे जीवनसाथी को सौंपने में देरी करने पर अपनी औलाद को ही मानसिक व शारीरिक तौर पर नुकसान पहुंचाते हैं। बच्चे को कई बार अदालत के चक्कर लगाने पड़ते हैं, जोकि उसके विकास के लिए उचित नहीं है।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति तेजस करिया व न्यायमूर्ति मधु जैन की पीठ ने एक मां की अपील खारिज करते हुए यह बात कही। मां ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश के खिलाफ अपील की थी, जिसमें पिता को गर्मियों की छुट्टियों के दौरान अपनी नाबालिग बेटी की अंतरिम कस्टडी दी गई थी।
पीठ ने कहाः कस्टडी के मामले में बच्चे का हित सर्वोपरी
पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि कस्टडी के मामलों में बच्चे का हित सबसे जरूरी होता है। नाबालिग को अपने दोनों माता-पिता के साथ सार्थक संबंध बनाने व बनाए रखने का अधिकार है। पीठ ने कहा कि कस्टडी के मामलों में देरी से बच्चे का ही नुकसान होता है। नाबालिग बच्चे को अपने दोनों माता-पिता के साथ सार्थक समय बिताने का अधिकार है। छुट्टियों के समय बच्चे को सौंपने में देरी करने के लिए बार-बार अदालत जाने के चलन को अगर मंज़ूरी दी गई तो यह बच्चे के हित व उसके दोनों माता-पिता के साथ संबंधों के लिए नुकसानदेह होगा।
मां ने फैमिली कोर्ट के आदेश को दी थी चुनौती
मां ने फैमिली कोर्ट के एक आदेश को चुनौती दी थी। इस आदेश में पिता को छुट्टियों के दौरान बच्चे की अंतरिम कस्टडी की इजाजत दी गई थी। मां का तर्क था कि पिता पहले तय मुलाक़ात के नियमों का पालन करने में नाकाम रहा था। वह अकेले बच्चे की देखभाल करने में सक्षम नहीं है। इस तर्क को खारिज करते हुए पीठ ने कहा कि मां को खुद भी इस बात से कोई आपत्ति नहीं है कि पिता भारत में रहने के दौरान बच्चे की कस्टडी लें। ऐसे हालात में उनका यह तर्क नहीं माना जा सकता कि लंदन में रहने के दौरान पिता अकेले बच्चे की देखभाल करने में सक्षम नहीं है। पीठ ने महिला की दलीलें खारिज की। साथ ही पिता के साथ बच्चे के सार्थक समय बिताने के आदेश को बरकरार रखा है।


