बच्चा कोई जीता जाने वाला इनाम नहीं है, उसे भी आगे बढ़ने की आजादी का हकः दिल्ली हाई कोर्ट
दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि बच्चा माता-पिता में से किसी के द्वारा जीता जाने वाला कोई इनाम नहीं है। बच्चे को भी माता-पिता के झगड़ों के बोझ के बिना आगे बढ़ने की आजादी पाने का हक है। बच्चों से जुड़े मामलों में बच्चे का कल्याण सबसे अहम बात है और हर अदालती फैसले में यही मार्गदर्शक होना चाहिए।

दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है कि कोर्ट किसी ऐसे व्यक्ति को कानूनी फायदा नहीं उठाने दे सकता जो जानबूझकर अदालती आदेशों का उल्लंघन करता हो। कोर्ट ने कहा कि किसी बच्चे के किसी खास देश में बस जाने का हवाला देकर अदालती आदेश को लगातार न मानने वालों को इनाम नहीं दिया जा सकता। डिवीजन बेंच ने कहा कि बच्चों से जुड़े मामलों में बच्चे का कल्याण सबसे अहम बात है और हर अदालती फैसले में यही मार्गदर्शक होना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि बच्चा माता-पिता में से किसी के द्वारा जीता जाने वाला कोई इनाम नहीं है, बल्कि उसे सुरक्षा, स्थिरता, सम्मान, स्नेह और माता-पिता के झगड़ों के बोझ के बिना आगे बढ़ने की आजादी पाने का हक है।
दिल्ली हाई कोर्ट ने अंतरराष्ट्रीय कस्टडी विवाद में नाबालिग बच्चे को कनाडा में रह रहे उसके पिता के पास भेजने का आदेश दिया है। हाई कोर्ट ने कहा कि किसी विदेशी अदालत के आदेश की अवहेलना कर बच्चे को अपने पास रखने वाला अभिभावक बाद में यह कहकर कानूनी लाभ नहीं ले सकता कि समय बीतने के कारण बच्चा अब नए माहौल में पूरी तरह रच-बस गया है।
नाबालिग बेटे को कनाडा वापस भेजने की मांग
जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद और जस्टिस हरिश वैद्यनाथन शंकर की पीठ ने कहा कि विदेशी अदालत के फैसले की अवहेलना को स्वीकार करने का मतलब होगा कि न्यायिक व्यवस्था की विश्वसनीयता व अनुशासन पर गंभीर असर पड़ेगा। पीठ ने कहा कि यदि पक्षकार पहले विदेशी अदालत के अधिकार क्षेत्र को स्वीकार करें, वहां मुकदमा लड़ें और प्रतिकूल आदेश आने के बाद उसकी अनदेखी कर दूसरे देश में चले जाएं तो यह स्वीकार्य नहीं है।
पीठ ने कहा कि ऐसा आचरण अंतरराष्ट्रीय कस्टडी विवादों में न्यायिक आदेशों से बचने को बढ़ावा देगा। यह मामला पिता द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका से जुड़ा है। पिता ने मार्च 2020 में कनाडा के ओंटारियो स्थित न्यायालय द्वारा पारित आदेश के अनुसार अपने नाबालिग बेटे को कनाडा वापस भेजने व उसकी कस्टडी सौंपने की मांग की है।
पिता का कहना था कि अक्टूबर 2019 में मां उसकी सहमति के बिना बच्चे को भारत ले आई थी। बाद में कनाडा की अदालत ने बच्चे को वापस भेजने का आदेश देते हुए अस्थायी एकल कस्टडी पिता को सौंप दी थी। मां ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि बच्चा पिछले लगभग छह वर्षों से भारत में रह रहा है। यहां के सामाजिक एवं भावनात्मक माहौल में पूरी तरह घुल-मिल चुका है। ऐसे में उसे कनाडा भेजना उसके लिए नुकसानदेह होगा। पीठ ने इस दलील को खारिज कर दिया है।
बच्चे की कस्टडी पिता को सौंपने का निर्देश
पीठ ने कहा कि मां ने स्वयं कनाडा की अदालत के अधिकार क्षेत्र को स्वीकार किया था। वहां कार्यवाही में हिस्सा लिया था। इसलिए केवल फैसला अपने विरुद्ध आने के कारण अब वह उस अदालत के आदेश को नजरअंदाज नहीं कर सकती। पीठ ने पाया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है, जिससे यह साबित हो कि बच्चे को कनाडा भेजने से उसके शारीरिक, मानसिक, शैक्षणिक या मनोवैज्ञानिक हितों को नुकसान पहुंचेगा।
अदालत ने यह भी दर्ज किया कि पिता आर्थिक रूप से सक्षम है और उसने मां तथा बच्चे दोनों के रहने की उचित व्यवस्था करने का आश्वासन दिया है। इन परिस्थितियों में हाइकोर्ट ने मां को छह सप्ताह के भीतर बच्चे को कनाडा की अदालत के अधिकार क्षेत्र में वापस ले जाने और अस्थायी कस्टडी पिता को सौंपने का निर्देश दिया है।
लेखक के बारे में
Subodh Kumar Mishraसुबोध कुमार मिश्रा पिछले 19 साल से हिंदी पत्रकारिता में योगदान दे रहे हैं। वर्तमान में वह 'लाइव हिन्दुस्तान' में स्टेट डेस्क पर बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। दूरदर्शन के 'डीडी न्यूज' से इंटर्नशिप करने वाले सुबोध ने पत्रकारिता की विधिवत शुरुआत 2007 में दैनिक जागरण अखबार से की। दैनिक जागरण के जम्मू एडीशन में बतौर ट्रेनी प्रवेश किया और सब एडिटर तक का पांच साल का सफर पूरा किया। इस दौरान जम्मू-कश्मीर को बहुत ही करीब से देखने और समझने का मौका मिला। दैनिक जागरण से आगे के सफर में कई अखबारों में काम किया। इनमें दिल्ली-एनसीआर से प्रकाशित होने वाली नेशनल दुनिया, नवोदय टाइम्स (पंजाब केसरी ग्रुप), अमर उजाला और हिन्दुस्तान जैसे हिंदी अखबार शामिल हैं। अखबारों के इस लंबे सफर में खबरों को पेश करने के तरीकों से पड़ने वाले प्रभावों को काफी बारीकी से समझने का मौका मिला।
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