सरकार नहीं झाड़ सकती अपना पल्ला; सत्य निकेतन में 7 की मौत पर हाई कोर्ट ने सुना दिया, कहा- सिर्फ मालिक जिम्मेदार नहीं
सत्य निकेतन बिल्डिंग हादसे में मरने वालों की संख्या सात हो गई है। मामले में हाई कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की कि त्रासदी के लिए सिर्फ इमारत के मालिक ही जिम्मेदार नहीं है। सरकार अपना पल्ला नहीं झाड़ सकती।

दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में पांच मंजिला इमारत गिरने वाली घटना पर हाई कोर्ट ने सुनवाई पूरी कर ली है। जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने अवैध इमारतों के खिलाफ कार्रवाई का आदेश दिया। साथ ही सख्त टिप्पणी की कि सत्य निकेतन में इमारत गिरने की घटना 'अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण' है। त्रासदी के लिए सिर्फ इमारत का मालिक ही नहीं, बल्कि एमसीडी और दिल्ली विश्वविद्यालय भी जिम्मेदार हैं। सरकार अपना पल्ला नहीं झाड़ सकती।
बता दें कि सत्य निकेतन हादसे में जान गंवाने वालों की संख्या सात हो गई है। इस मामले में इमारत के मालिक हरीराम को राजस्थान के भिवाड़ी से गिरफ्तार कर लिया है। उससे पूछताछ की जा रही है।
आज सुबह अनिकेत कुमार गुप्ता नामक व्यक्ति द्वारा हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई थी, जिसे हाई कोर्ट ने तुरंत सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया था। सुनवाई मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ ने की।
अदालत की सख्त टिप्पणी
बार एंड बेंच के मुताबिक, अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा, “सरकार अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती। 50 युवा छात्र, जो अपने जीवन की शुरुआत के दौर में हैं... उनमें से ज्यादातर शायद अभी भी मलबे में दबे हुए हैं। इससे ज्यादा दुखद और कुछ नहीं हो सकता।”
कोर्ट ने दुख जताते हुए कहा कि राष्ट्रीय राजधानी में ऐसी त्रासदियां हर दूसरे साल होती हैं। कोर्ट ने दिल्ली सरकार से सवाल किया कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए वह क्या कदम उठा रही है?
टिप्पणीः देश के भविष्य हैं छात्र, इन्हें ऐसे मत छोड़िए
अदालत ने सॉलिसिटर जनरल मेहता से यह भी कहा कि वे सरकार को छात्रों के लिए छात्रावास सुविधाओं की आवश्यकता पर जोर दें। पीठ ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि पीजी का निर्माण अक्सर नागरिक कानूनों का उल्लंघन करते हुए किया जाता है। कहा, " पे-गेस्ट हॉस्टल न केवल बहुत खतरनाक हैं, बल्कि छात्रों के जीवन और सुरक्षा के लिए खतरा पैदा कर रहे हैं। इसका कारण छात्रों के लिए हॉस्टलों की बिल्कुल अपर्याप्त संख्या है।"
अदालत ने आगे कहा," आप देश के भविष्य पर निवेश कर रहे हैं। सरकार और विश्वविद्यालयों द्वारा संचालित छात्रावासों की संख्या के लिहाज से स्थिति बेहद दयनीय है। इन पीजी को विनियमित करने के लिए कोई व्यवस्था बनाई जानी चाहिए। ये पीजी मालिक लापरवाही से निर्माण कार्य करते हैं। अगर दो मंजिला इमारत बनाने की अनुमति होती है, तो छह मंजिला इमारत बना दी जाती है, और संभवतः इसी वजह से यह हादसा हुआ है।"
अदालत का आदेश
दिल्ली हाई कोर्ट ने आदेश दिया कि पीजी और निजी हॉस्टलों को नियंत्रित करने के लिए एक उचित नियम-कायदा और नियामक व्यवस्था होनी चाहिए। कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को 10 दिन के भीतर हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने एमसीडी और दिल्ली पुलिस के रेस्क्यू अभियान की भी जानकारी ली कि सभी जरूरी कदम उठाए जा रहे हैं।
सरकार से जवाब मांगा
अदालत ने जनहित याचिका पर सरकार, एमसीडी और दिल्ली विश्वविद्यालय से जवाब मांगा है। निर्देश दिया है कि ऐसे पीजी में कितने छात्र रहते हैं? दिल्ली विश्वविद्यालय से यह बताने को कहा गया है कि कितने छात्र प्रवेश लेते हैं और कितने छात्रों को छात्रावास की सुविधा दी जाती है।
अदालत ने दिल्ली सरकार को निर्देश दिया है कि वह भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए अपनी योजनाओं के बारे में अदालत को सूचित करे। वहीं, एमसीडी को यह बताने को कहा गया कि क्या दिल्ली में पीजी होटलों को विनियमित करने वाले कोई वैधानिक या कार्यकारी नियम हैं?
ऐक्शन में सरकार, एमसीडी उपायुक्त समेत पांच अधिकारी निलंबित
इस घटना को लेकर दिल्ली की सरकार ने भी ऐक्शन लिया है। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के निर्देश पर दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) के एक उपायुक्त समेत पांच अधिकारियों को सोमवार को निलंबित कर दिया गया है। मुख्यमंत्री कार्यालय की तरफ से बताया गया कि एमसीडी के दक्षिण जोन के उपायुक्त (डीसी) राकेश कुमार के साथ-साथ अधिशासी अभियंता, अधीक्षण अभियंता सहायक अभियंता और कनिष्ठ अभियंता को निलंबित कर दिया गया है।


