मिष्टी, कोको और कॉटन की कस्टडी पर फैसला, HC ने कहा- पालतू जानवरों के लिए भावनात्मक रिश्ते अहम

Subodh Kumar Mishra एएनआई, नई दिल्ली
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दिल्ली हाई कोर्ट ने जानवरों की कस्टडी को लेकर बड़ा फैसला दिया है। कोर्ट ने कहा कि जानवरों की कस्टडी को प्रॉपर्टी की कस्टडी के बराबर नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि ऐसे विवादों का फैसला करते समय पालतू जानवरों और उनकी देखभाल करने वालों के बीच के भावनात्मक रिश्ते को पूरी अहमियत दी जानी चाहिए।

मिष्टी, कोको और कॉटन की कस्टडी पर फैसला,  HC ने कहा- पालतू जानवरों के लिए भावनात्मक रिश्ते अहम

दिल्ली हाई कोर्ट ने जानवरों की कस्टडी को लेकर बड़ा फैसला दिया है। कोर्ट ने कहा कि जानवरों की कस्टडी को प्रॉपर्टी की कस्टडी के बराबर नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि ऐसे विवादों का फैसला करते समय पालतू जानवरों और उनकी देखभाल करने वालों के बीच के भावनात्मक रिश्ते को पूरी अहमियत दी जानी चाहिए।

कोर्ट ने यह भी कहा कि चीजों के उलट जानवर महसूस करने वाले जीव होते हैं। जो लोग उनकी देखभाल करते हैं, उनके साथ उनका एक मजबूत भावनात्मक रिश्ता बन जाता है। कोर्ट ने कहा कि पालतू जानवरों को उनकी देखभाल करने वालों से अलग करने पर जानवरों को गहरा भावनात्मक सदमा पहुंच सकता है। कस्टडी से जुड़े मामलों में फैसला करते समय इन बातों को ध्यान में रखना बहुत जरूरी है।

मौजूदा मामले में तीन पालतू कुत्तों को लेकर विवाद खड़ा हुआ था, जिन्हें बाद में याचिकाकर्ताओं ने गोद ले लिया था। ट्रायल कोर्ट ने पहले यह निर्देश दिया था कि कुत्तों को 'सुपरदारी' पर उनके असली मालिक को लौटा दिया जाए। वहीं, हाई कोर्ट ने जानवरों के कल्याण और उनकी भावनात्मक भलाई पर ध्यान केंद्रित करते हुए इस मुद्दे पर फिर से विचार किया। सुपरदारी का मतलब है कोर्ट द्वारा जब्त की गई संपत्ति को किसी व्यक्ति को अस्थायी तौर पर सौंपना।

हाई कोर्ट ने एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए दोनों पक्षों के बीच आपसी सहमति को दर्ज करते हुए निर्देश दिया कि तीनों कुत्तों मिष्टी, कोको और कॉटन को याचिकाकर्ताओं को वापस सौंप दिया जाए। हालांकि, कोर्ट ने कुछ शर्तें भी लगाईं, जिनमें जरूरत पड़ने पर इन जानवरों को ट्रायल कोर्ट के समक्ष पेश करना भी शामिल है।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि असली मालिक अंततः बरी हो जाता है तो जानवरों के कल्याण को ध्यान में रखते हुए उनकी कस्टडी पर पुनर्विचार किया जा सकता है। याचिका के निपटारे में इस बात पर बल दिया गया कि ऐसे विवादों में पशु कल्याण और भावनात्मक पहलुओं को सर्वोपरि महत्व दिया जाना चाहिए।

इससे पहले, एक अन्य घटना में दिल्ली हाई कोर्ट ने नियमित रूप से कुत्ते को टहलाते समय हुई तीखी बहस के बाद पड़ोसियों द्वारा दर्ज कराई गई दो क्रॉस-एफआईआर को रद्द कर दिया था। कोर्ट ने कहा था कि यह विवाद निजी प्रकृति का था और कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।

जस्टिस अरुण मोंगा ने याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कहा कि दोनों एफआईआर एक ही घटना से जुड़ी हैं, जो उनके पालतू कुत्तों को संभालने को लेकर हुई थी। बात कहासुनी से शुरू हुई थी जो बढ़कर हाथापाई में बदल गई। इसके बाद दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर मारपीट, धमकाने और बदतमीज़ी करने के आरोप लगाए।

Subodh Kumar Mishra

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Subodh Kumar Mishra

सुबोध कुमार मिश्रा पिछले 19 साल से हिंदी पत्रकारिता में योगदान दे रहे हैं। वर्तमान में वह 'लाइव हिन्दुस्तान' में स्टेट डेस्क पर बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। दूरदर्शन के 'डीडी न्यूज' से इंटर्नशिप करने वाले सुबोध ने पत्रकारिता की विधिवत शुरुआत 2007 में दैनिक जागरण अखबार से की। दैनिक जागरण के जम्मू एडीशन में बतौर ट्रेनी प्रवेश किया और सब एडिटर तक का पांच साल का सफर पूरा किया। इस दौरान जम्मू-कश्मीर को बहुत ही करीब से देखने और समझने का मौका मिला। दैनिक जागरण से आगे के सफर में कई अखबारों में काम किया। इनमें दिल्ली-एनसीआर से प्रकाशित होने वाली नेशनल दुनिया, नवोदय टाइम्स (पंजाब केसरी ग्रुप), अमर उजाला और हिन्दुस्तान जैसे हिंदी अखबार शामिल हैं। अखबारों के इस लंबे सफर में खबरों को पेश करने के तरीकों से पड़ने वाले प्रभावों को काफी बारीकी से समझने का मौका मिला।

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