शादी के वक्त नशे में था, दिल्ली हाईकोर्ट ने पति को क्यों नहीं दी तलाक की मंजूरी?
दिल्ली हाई कोर्ट ने उस पति की तलाक याचिका खारिज कर दी जिसमें उसने कहा था कि शादी के समय वह नशे में था। इस रिपोर्ट में जाने अदालत ने अपने फैसले में क्या बातें कही।

हेमलता कौशिक, नई दिल्ली
दिल्ली हाई कोर्ट ने तलाक के एक मामले में बड़ा फैसला दिया है। इस मामले में एक शख्स ने तलाक मांगते हुए दावा किया था कि उसकी शादी अमान्य है क्योंकि 2008 में शादी की रस्में निभाते समय वह किसी नशीली दवा के असर में था। अदालत ने पति की दलीलें खारिज करते हुए शादी खत्म करने की अपील खारिज कर दी।
एक साल के भीतर दाखिल करनी थी याचिका
जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस रेनू भटनागर की पीठ ने कहा कि पति का दावा ज्यादा से ज्यादा से ज्यादा हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 12(1)(c) के तहत आ सकता है। यह धारा कहती है कि यदि शादी के लिए सहमति जबरदस्ती या धोखाधड़ी से ली गई हो तो शादी को रद्द करने योग्य माना जा सकता है। ऐसी स्थिति में धोखाधड़ी का पता चलने के एक साल के भीतर शादी रद्द करने की अर्जी दाखिल करनी होती है।
तलाक की अर्जी कर दी गई थी खारिज
अदालत ने कहा कि यह बात मानी हुई कि शादी की वैधता को लेकर पति ने पत्नी द्वारा हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 9 के तहत दायर याचिका में चुनौती दी थी, जिसका फैसला उसके खिलाफ आया था। वह फैसला अंतिम हो चुका था। पीठ ने पति की उस अपील को खारिज किया, जिसमें उसने फैमिली कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी, जिसने हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 13(1ए) और 13(1)(आईबी) के तहत उसकी तलाक की अर्जी खारिज की थी।
आर्य समाज मंदिर में हुई थी शादी
दोनों की शादी 20 फरवरी 2008 को आर्य समाज मंदिर में हुई। इस शादी से कोई बच्चा नहीं हुआ। वैवाहिक कलह के बाद पत्नी ने जून 2008 में दहेज प्रताड़ना की शिकायत दर्ज कराई थी। अदालत में वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए कार्यवाही शुरू की गई थी। पत्नी की बहाली की अर्जी सितंबर 2013 में मंजूर कर ली गई। हालांकि दोनों ने साथ रहना शुरू नहीं किया।
पति ने किस कानून का दिया था हवाला
2016 में पति ने तलाक के लिए फैमिली कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और अन्य बातों के अलावा यह तर्क दिया कि जरूरी समय तक वैवाहिक अधिकारों की बहाली नहीं हुई। पीठ के सामने पति ने तर्क दिया कि वैवाहिक अधिकारों की बहाली का आदेश मिलने के बावजूद पत्नी अलग रह रही थी। इसलिए वह हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 13(1ए) के तहत तलाक का हकदार था।
अदालत ने पाई पति में कमी
पीठ ने उसकी याचिका खारिज करते हुए कहा कि फैमिली कोर्ट के रिकॉर्ड से पता चलता है कि पति ने ही तलाक की अर्जी दाखिल करने से पहले या वैवाहिक अधिकारों की बहाली का आदेश मिलने के बाद भी मामले को सुलझाने की कोई कोशिश नहीं की। कोर्ट ने यह भी गौर किया कि पत्नी हमेशा उसके साथ रहने और उनके बीच चल रहे सभी कानूनी मामलों को वापस लेने के लिए तैयार थी।


