फैसला सुरक्षित रखने वाले जज ही निर्णय सुनाएं, भले ही तबादला हो गया हो: दिल्ली HC
दिल्ली हाई कोर्ट ने आदेश दिया है कि अंतिम बहस पूरी होने के बाद संबंधित जज को ही फैसला सुनाना होगा, भले ही उनका ट्रांसफर हो गया हो। अदालत ने कहा कि दोबारा बहस कराना न्यायिक प्रक्रिया में अनावश्यक देरी और अन्याय है।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। उच्च न्यायालय ने कहा कि एक बार जब किसी आपराधिक मामले की सुनवाई में अंतिम बहस पूरी हो जाती है। मामला फैसले के लिए सुरक्षित रख लिया जाता है तो जिस न्यायाधीश ने मुकदमा सुना है, उसे फैसला सुनाना ही होगा, भले ही उसका स्थानान्तरण हो गया हो।
तबादले के दो-तीन हफ्तों में सुनाने होंगे फैसले
न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा की पीठ ने फैसले में रजिस्ट्रार जनरल के 18 जनवरी 2025 और 26 नवंबर 2025 के आदेशों का हवाला दिया। इन आदेशों में स्पष्ट किया गया है कि स्थानान्तरित किए गए न्यायिक अधिकारियों को उन मामलों की जानकारी देनी होगी, जिनमें उन्होंने कार्यमुक्त होने से पहले फैसला या आदेश सुरक्षित रखा है। साथ ही यह भी निर्देश है कि ऐसे अधिकारी स्थानान्तरण की तारीख से दो से तीन सप्ताह के भीतर उन मामलों में फैसला सुनाएंगे, भले ही उनकी तैनाती किसी अन्य अदालत में हो गई हो।
अंतिम बहस सुन चुके जज देंगे फैसला
पीठ ने साफ कहा कि नए न्यायिक अधिकारी को अंतिम बहस दोबारा कराने का अधिकार नहीं है। अंतिम बहस सुन चुके न्यायाधीश को ही निर्णय देना होगा, क्योंकि दोबारा बहस कराना अनावश्यक है। इससे न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता व समयबद्धता प्रभावित होती है।
मकोका के एक आरोपी की याचिका पर आया आदेश
यह आदेश महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (मकोका) के तहत दर्ज मामले में आरोपी द्वारा दायर याचिका पर आया। याचिकाकर्ता ने बताया कि उसके मामले में अंतिम बहस पूरी हो चुकी थी और 4 जुलाई 2025 को फैसला सुरक्षित रखा गया था। 7 नवंबर 2025 को फैसला टाला गया क्योंकि आरोपी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश हुए थे।
अदालत ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से पेश होने का निर्देश दिया। इसी बीच संबंधित न्यायाधीश का स्थानांतरण हो गया। नए न्यायिक अधिकारी ने मामले में अंतिम बहस दोबारा शुरू करने का आदेश दे दिया।
निचली अदालत के आदेश को किया रद्द
उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के आदेश को रद्द करते हुए कहा कि हिरासत में बंद आरोपी के लिए फैसला सुरक्षित रखने के बाद हर दिन मानसिक तनाव और अनिश्चितता में बीतता है। नए जज के सामने दोबारा अंतिम बहस कराना गंभीर अन्याय होगा। अदालत ने मानवीय पहलू पर जोर दिया और निर्देश दिया कि मामला वापस उसी न्यायाधीश को सौंपा जाए जिन्होंने अंतिम बहस सुनी थी, ताकि दो से तीन सप्ताह के भीतर फैसला सुनाया जा सके।
हजारों आपराधिक मामलों पर प्रभाव पड़ेगा
उच्च न्यायालय का यह आदेश हजारों मामलों में राहत लेकर आया है। अदालत के इस फैसले से हजारों आपराधिक मामलों पर असर पड़ेगा और लंबे समय से चली आ रही देरी की समस्या पर अंकुश लगेगा। इससे न केवल आरोपियों और पीड़ितों को राहत मिलेगी, बल्कि न्यायिक व्यवस्था पर पड़ने वाला अतिरिक्त बोझ और खर्च भी कम होगा।





