पहली पत्नी के भरण-पोषण मामले में दूसरी पत्नी पक्षकार नहीं बन सकती: जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा

Subodh Kumar Mishra लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने अपने एक फैसले में कहा कि पहली पत्नी के भरण-पोषण मामले में दूसरी पत्नी पक्षकार नहीं बन सकती है। दूसरी पत्नी ने गुजारा भत्ता से जुड़ी कार्यवाही में खुद को शामिल करने की मांग की थी। जस्टिस शर्मा ने पक्षकार बनाने वाली उसकी याचिका को खारिज कर दिया।

पहली पत्नी के भरण-पोषण मामले में दूसरी पत्नी पक्षकार नहीं बन सकती: जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा

दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने अपने एक फैसले में कहा कि पहली पत्नी के भरण-पोषण मामले में दूसरी पत्नी पक्षकार नहीं बन सकती है। दूसरी पत्नी ने गुजारा भत्ता से जुड़ी कार्यवाही में खुद को शामिल करने की मांग की थी। जस्टिस शर्मा ने पक्षकार बनाने वाली उसकी याचिका को खारिज कर दिया।

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली हाई कोर्ट ने फैसला दिया है कि सीआरपीसी की धारा 125 के तहत पहली पत्नी और बच्चों द्वारा शुरू की गई भरण-पोषण की कार्यवाही में दूसरी पत्नी जरूरी पक्ष नहीं है। कोर्ट ने कहा कि ऐसी कार्यवाही को पति पर निर्भरता का दावा करने वाले हर व्यक्ति को इसमें शामिल करके बेवजह बढ़ाया नहीं जा सकता। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने यह टिप्पणी तब की जब उन्होंने एक महिला द्वारा दायर उस अर्जी को खारिज कर दिया, जिसमें उसने पहली पत्नी द्वारा अपने पति के खिलाफ दायर भरण-पोषण की पुनर्विचार याचिका में खुद को भी एक पक्ष के तौर पर शामिल करने की मांग की थी।

फैमिली कोर्ट के आदेश को चुनौती

पहली पत्नी ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें उसे गुज़ारा भत्ता देने से मना कर दिया गया था। हालांकि फैमिली कोर्ट ने शादी से पैदा हुए दो बच्चों में से हर एक को 10000 रुपए देने का आदेश दिया गया था। कार्यवाही के दौरान पति ने फैमिली कोर्ट से अपने पक्ष में तलाक का आदेश मिलने के बाद दूसरी शादी कर ली। इसके बाद दूसरी पत्नी ने गुजारा भत्ता से जुड़ी कार्यवाही में खुद को भी शामिल करने की मांग की। उसने यह दलील दी कि वह प्रतिवादी की कानूनी रूप से विवाहित पत्नी है और इस मामले में पारित कोई भी आदेश उसके अधिकारों और वित्तीय हितों पर बुरा असर डाल सकता है।

जरूरी पक्ष तथा उचित पक्ष के बीच के अंतर

याचिका का विरोध करते हुए पहली पत्नी ने यह तर्क दिया कि विवाद केवल उसके, बच्चों और पति के बीच भरण-पोषण के दावों तक ही सीमित था। दूसरी पत्नी के खिलाफ कोई राहत नहीं मांगी गई थी। हाई कोर्ट ने इस तर्क से सहमति जताई और जरूरी पक्ष तथा उचित पक्ष के बीच के अंतर को स्पष्ट किया। कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि जरूरी पक्ष वह होता है जिसकी गैरहाजिरी में कोई प्रभावी आदेश पारित नहीं किया जा सकता, जबकि उचित पक्ष वह होता है जिसकी मौजूदगी विवादों के पूर्ण और प्रभावी निपटारे के लिए जरूरी होता है।

हर व्यक्ति के लिए दरवाजा खुल जाएगा

कोर्ट ने माना कि दूसरी पत्नी ने दोनों में से किसी भी कसौटी को पूरा नहीं किया। कोर्ट ने टिप्पणी की कि सीआरपीसी की धारा 125 के तहत होने वाली कार्यवाही, याचिकाकर्ता और प्रतिवादी के बीच के आपसी अधिकारों और दायित्वों तक ही सीमित होती है। आवेदक की हैसियत या उसके दावों का इन अधिकारों के निर्णय पर कोई सीधा या ठोस असर नहीं पड़ता। इस दलील को खारिज करते हुए कि पति पर दूसरी पत्नी की आर्थिक निर्भरता उसे इस मामले में पक्षकार बनाने का उचित आधार है, कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि यदि ऐसी दलील को स्वीकार कर लिया जाए तो इससे हर उस आश्रित व्यक्ति के लिए यह दरवाजा खुल जाएगा, जो भरण-पोषण से जुड़ी कार्यवाही में हस्तक्षेप करना चाहता हो।

अर्जी को खारिज कर दिया

कोर्ट ने कहा कि अगर ऐसी किसी अर्जी पर विचार किया जाए तो इससे हर उस व्यक्ति के लिए दरवाजा खुल जाएगा जो यह दावा करता है कि वह उस व्यक्ति पर निर्भर है जिससे गुजारा-भत्ता मांगा जा रहा है। ऐसे लोग इन कार्यवाहियों में खुद को पक्षकार बनाने की मांग कर सकते हैं। इससे सीआरपीसी की धारा 125 के तहत होने वाली उन कार्यवाहियों का दायरा बेवजह बढ़ जाएगा जो संक्षिप्त होती हैं। कोर्ट ने आगे कहा कि भले ही यह मान भी लिया जाए कि आवेदक आर्थिक रूप से प्रतिवादी-पति पर निर्भर है, फिर भी प्रतिवादी के पास हमेशा यह विकल्प खुला रहता है कि वह ऐसे सभी प्रासंगिक तथ्य इस कोर्ट के सामने पेश करे। इसलिए, कोर्ट ने पक्षकार बनाने वाली अर्जी को खारिज कर दिया।

Subodh Kumar Mishra

लेखक के बारे में

Subodh Kumar Mishra

सुबोध कुमार मिश्रा पिछले 19 साल से हिंदी पत्रकारिता में योगदान दे रहे हैं। वर्तमान में वह 'लाइव हिन्दुस्तान' में स्टेट डेस्क पर बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। दूरदर्शन के 'डीडी न्यूज' से इंटर्नशिप करने वाले सुबोध ने पत्रकारिता की विधिवत शुरुआत 2007 में दैनिक जागरण अखबार से की। दैनिक जागरण के जम्मू एडीशन में बतौर ट्रेनी प्रवेश किया और सब एडिटर तक का पांच साल का सफर पूरा किया। इस दौरान जम्मू-कश्मीर को बहुत ही करीब से देखने और समझने का मौका मिला। दैनिक जागरण से आगे के सफर में कई अखबारों में काम किया। इनमें दिल्ली-एनसीआर से प्रकाशित होने वाली नेशनल दुनिया, नवोदय टाइम्स (पंजाब केसरी ग्रुप), अमर उजाला और हिन्दुस्तान जैसे हिंदी अखबार शामिल हैं। अखबारों के इस लंबे सफर में खबरों को पेश करने के तरीकों से पड़ने वाले प्रभावों को काफी बारीकी से समझने का मौका मिला।

ज्यादातर नेशनल और स्टेट डेस्क पर काम करने का अवसर मिलने के कारण राजनीतिक और सामाजिक विषयों से जुड़ी खबरों में दिलचस्पी बढ़ती गई। कई लोकसभा और विधानसभा चुनावों की खबरों की पैकेजिंग टीम का हिस्सा रहने के कारण भारतीय राजनीति के गुणा-भाग को समझने का मौका मिला।

शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो सुबोध ने बीएससी (ऑनर्स) तक की अकादमिक शिक्षा हासिल की है। साइंस स्ट्रीम से पढ़ने के कारण उनके पास चीजों को मिथ्यों से परे वैज्ञानिक तरीके से देखने की समझ है। समाज से जुड़ी खबरों को वैज्ञानिक कसौटियों पर जांचने-परखने की क्षमता है। उन्होंने मास कम्यूनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा किया है। इससे उन्हें खबरों के महत्व, खबरों के एथिक्स, खबरों की विश्वसनीयता और पठनीयता आदि को और करीब से सीखने और लिखने की कला में निखार आया। सुबोध का मानना है कि खबरें हमेशा प्रमाणिकता की कसौटी पर कसा होना चाहिए। सुनी सुनाई और कल्पना पर आधारित खबरें काफी घातक साबित हो सकती हैं, इसलिए खबरें तथ्यात्मक रूप से सही होनी चाहिए। खबरों के चयन में क्रॉस चेकिंग को सबसे महत्वपूर्ण कारक मानने वाले सुबोध का काम न सिर्फ पाठकों को केवल सूचना देने भर का है बल्कि उन्हें सही, सुरक्षित और ठोस जानकारी उपलब्ध कराना भी है।

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