मारपीट हिंसा की प्रवृत्ति नहीं... युवक को हिंसक बताकर नौकरी से रोका, दिल्ली HC ने किया बहाल
दिल्ली हाईकोर्ट ने 2016 की भर्ती में एक युवक को राहत देते हुए उसे कांस्टेबल नियुक्त करने के आदेश दिए हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बरी होने के बाद मारपीट के पुराने केस को हिंसक प्रवृत्ति नहीं माना जा सकता।

हिंसक बताकर नौकरी करने से रोकने के मामले में युवक को हाईकोर्ट से राहत मिली है। हाईकोर्ट ने युवक को कांस्टेबल पद पर नियुक्त करने के आदेश दिए हैं। न्यायमूर्ति मधु जैन एवं न्यायमूर्ति नवीन चावला की पीठ ने युवक के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा कि उम्मीदवार ने सभी मापदंडों को पूरा किया है, लेकिन पुलिस सत्यापन में एक ऐसे मुकदमे के आधार पर उसकी नियुक्ति रद्द कर दी गई, जिसमें वह पहले ही बरी हो चुका था।
पीठ ने कहा कि दस्तावेजों में कहा गया है कि आरोपी की हिंसक प्रवृति को देखते हुए उसकी नियुक्ति खारिज की जा रही है। इस पर टिप्पणी करते हुए पीठ ने कहा कि दो पक्षों के बीच मामूली कहासुनी के बाद मारपीट को हिंसा की प्रवृति नहीं ठहराया जा सकता। कई बार बेवजह मारपीट के हालात बनते हैं। फिर इस मामले में तो आरेापी बरी हो चुका है। संबंधित अदालत ने जब इस युवक को बरी कर दिया है, तो उस पर इस तरह की टीका-टिप्पणी करना उचित नहीं है। हरियाणा के इस युवक को आठ साल की लंबी लड़ाई के बाद न्याय मिला है।
मामले में सभी गवाह मुकरे
इस मामले में सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस की तरफ से अधिवक्ता ने दलील पेश की कि इस मामले के सभी गवाह मुकर गए थे। इसलिए आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी किया गया था। इस पर पीठ ने कहा कि बरी होना अपने आप में किसी को भी आरोपों के कलंक से बाहर कर देता है। ऐसे में गवाहों के मुकरने को मुद्दा नहीं बनाया जा सकता। संबंधित अदालत के समक्ष आए तथ्य ही अंतिम माने जाएंगे।
2016 में आया था विज्ञापन
दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड ने सितंबर 2016 में दिल्ली पुलिस में भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किया था। युवक ने पुलिस में कांस्टेबल पद के लिए आवेदन किया। इसी बीच अक्तूबर 2016 में उसके खिलाफ दंगा व मारपीट की प्राथमिकी दर्ज हो गई। हालांकि, चयन प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही अदालत ने उसे इस मामले से बरी कर दिया। इस बीच उसने लिखित, शारीरिक व चिकित्सा परीक्षा उर्तीण कर ली थी।
अंतिम चयन प्रक्रिया के दौरान पुलिस सत्यापन में पता चला कि युवक के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज हुई थी। उसकी प्रवृत्ति का हवाला देते हुए उसे पुलिस में भर्ती करने से इनकार कर दिया गया।
नियुक्ति पत्र आठ साल पहले का रहेगा
दिल्ली उच्च न्यायालय ने निर्देश दिए हैं कि पुलिस विभाग को युवक को वर्ष 2018 में नियुक्त अन्य कांस्टेबल के मुताबिक वेतन बढ़ोतरी, वरिष्ठता क्रम आदि लाभ प्रदान करने होंगे। हालांकि, इस बीच आठ साल की तनख्वाह उसे नहीं दी जाएगी। इसके अतिरिक्त वेतन वृद्धि पूर्व के हिसाब से रहेगी।





