कैंसर मरीजों को दिल्ली HC ने दी बड़ी राहत, इस खास दवा को बेचने की मिल गई परमिशन

Utkarsh Gaharwar लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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इस फैसले से कैंसर के उन मरीजों को तुरंत राहत मिलने की उम्मीद है, जिनके लिए इलाज का खर्च अक्सर भारी कर्ज का कारण बन जाता है। निवोलुमैब जैसी दवाओं के एक कोर्स की कीमत कई लाख रुपये तक होती है, जिससे यह कई परिवारों और यहां तक कि सरकारी अस्पतालों की पहुंच से भी बाहर हो जाती है।

कैंसर मरीजों को दिल्ली HC ने दी बड़ी राहत, इस खास दवा को बेचने की मिल गई परमिशन

कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से जूझ रहे मरीजों के लिए दिल्ली हाई कोर्ट का राहतभरा फैसला आया है। अदालत ने दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाते हुए भारतीय फार्मा कंपनी जायडस लाइफसाइंसेज (Zydus Lifesciences) को कैंसर की बेहद लोकप्रिय दवा निवोलुमैब (Nivolumab) का सस्ता 'बायोसिमिलर' वर्जन बेचने की अनुमति दे दी है। इस दवा को मूल रूप से अमेरिकी दवा कंपनी ब्रिस्टल मायर्स स्क्विब (BMS) द्वारा बनाया गया था।

'द टाइम्स ऑफ इंडिया' की रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने जायडस को यह दवा बाजार में बेचने की इजाजत दे दी है, लेकिन साथ ही कंपनी को अपनी बिक्री का पूरा रिकॉर्ड रखने का निर्देश दिया है ताकि पेटेंट धारक (BMS) के अधिकारों की रक्षा की जा सके। इस फैसले को भारत जैसे देश के लिए एक ऐतिहासिक क्षण माना जा रहा है, जहां आधुनिक चिकित्सा उपचार की भारी लागत अक्सर आबादी के एक बड़े हिस्से की पहुंच से बाहर होती है।

ब्रिस्टल मायर्स स्क्विब (BMS) निवोलुमैब को 'Opdivo' (ओपडिवो) ब्रांड नाम के तहत बेचती है। यह दुनिया भर में सफल एक 'इम्यूनोथेरेपी' दवा है, जिसका उपयोग कई प्रकार के आक्रामक कैंसर के इलाज में किया जाता है। जायडस ने इसका एक बायोसिमिलर वर्जन 'ZRC 3276' विकसित किया है, जिसके बारे में कंपनी का दावा है कि यह पेटेंट वाली मूल दवा की तुलना में लगभग 70% सस्ती होगी।

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इससे पहले, हाई कोर्ट की एक एकल-न्यायाधीश पीठ (Single-judge bench) ने जायडस को यह दवा बेचने से रोक दिया था, क्योंकि निवोलुमैब का पेटेंट मई 2026 तक वैध है। हालांकि, अब जस्टिस सी. हरि शंकर और जस्टिस ओम प्रकाश शुक्ला की खंडपीठ (Division bench) ने उस पुराने आदेश को रद्द कर दिया है। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि जीवन रक्षक दवाओं से जुड़े मामलों में, अदालतों को जनहित और मरीजों के कल्याण की ओर झुकना चाहिए।

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अदालत ने टिप्पणी की कि हालांकि बौद्धिक संपदा अधिकारों (पेटेंट) का संरक्षण जरूरी है, लेकिन वे मरीजों की स्वास्थ्य संबंधी आपातकालीन जरूरतों से ऊपर नहीं हो सकते। न्यायाधीशों ने कहा, “अदालतों को ऐसे मामलों में अपने कर्तव्यों के प्रति बहुत जागरूक होना चाहिए। पेटेंट और जनहित के बीच संतुलन बनाना मुश्किल होता है, लेकिन हमारे पद की शपथ हमें ऐसा करने के लिए बाध्य करती है। ऐसा करते समय हमें देश के उन अनगिनत नागरिकों के प्रति अपने कर्तव्य को याद रखना होगा, जिन्हें इस इलाज की सख्त जरूरत है और जिसे रोकने के लिए याचिकाकर्ता (पेटेंट कंपनी) कोर्ट आया है।"

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इस फैसले से कैंसर के उन मरीजों को तुरंत राहत मिलने की उम्मीद है, जिनके लिए इलाज का खर्च अक्सर भारी कर्ज का कारण बन जाता है। निवोलुमैब जैसी दवाओं के एक कोर्स की कीमत कई लाख रुपये तक होती है, जिससे यह कई परिवारों और यहां तक कि सरकारी अस्पतालों की पहुंच से भी बाहर हो जाती है। जायडस ने कहा है कि उसका बायोसिमिलर वर्जन इलाज की लागत में भारी कमी ला सकता है, जिससे कीमतें मूल कीमत के एक छोटे से हिस्से (काफी कम) तक आ सकती हैं।

निवोलुमैब का उपयोग फेफड़ों के कैंसर, किडनी कैंसर और मेलानोमा जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज में किया जाता है। यह 'इम्यूनोथेरेपी' दवाओं की श्रेणी में आती है, जो शरीर की अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता को सक्रिय करके कैंसर कोशिकाओं पर हमला करने का काम करती हैं। पारंपरिक कीमोथेरेपी के विपरीत, इम्यूनोथेरेपी को सहन करना अक्सर आसान होता है और कई मामलों में यह अधिक प्रभावी भी होती है।

Utkarsh Gaharwar

लेखक के बारे में

Utkarsh Gaharwar
एमिटी और बेनेट विश्वविद्यालय से पत्रकारिता के गुर सीखने के बाद अमर उजाला से करियर की शुरुआत हुई। अमर उजाला में बतौर एंकर सेवाएं देने के बाद 3 साल नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में डिजिटल कंटेंट प्रोड्यूसर के पद पर काम किया। वर्तमान में लाइव हिंदुस्तान में डिजिटल कंटेंट प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हूं। एंकरिंग और लेखन के अलावा मिमिक्री और थोड़ा बहुत गायन भी कर लेता हूं। और पढ़ें
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