
सहमति से बने रिश्ते खराब हों, तो वह रेप नहीं; हाई कोर्ट ने रद्द की मामले में दर्ज SC-ST एक्ट वाली FIR
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि रिश्ता टूटने के बाद लगे बलात्कार के आरोपों के मामलों की जांच में बेहद सावधानी की जरूरत होती है, खासकर जहां दोनों पक्ष वयस्क हों, और सबूतों में स्वेच्छा से शारीरिक संबंध बनाने की बात सामने आ रही हो।
दिल्ली हाई कोर्ट ने बलात्कार और जाति के आधार पर की गई मारपीट को लेकर दर्ज एक FIR को रद्द कर दिया है, साथ ही कहा है कि आपसी सहमति से बने रिश्ते के खराब होने पर उसे रेप का नाम नहीं दिया जा सकता। इसके साथ ही अदालत ने फैसला देते हुए यह भी कहा कि असफल रिश्ते से उपजी निजी शिकायतों के समाधान के लिए आपराधिक कानून का सहारा नहीं लिया जा सकता। जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की सिंगल-जज बेंच ने फैसला सुनाते हुए कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सबूत साफ तौर पर बता रहे हैं कि दोनों पार्टियों के बीच एक लंबे समय से आपसी सहमति से रोमांटिक रिश्ता चल रहा था, जज ने आगे कहा कि ऐसे में इस मुकदमे को जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।
जातिगत अत्याचार के आरोप गलत निकले
मामले को लेकर दर्ज प्राथमिकी में SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(2)(v) के इस्तेमाल पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह प्रावधान तभी लागू होता है जब कोई अपराध पीड़ित व्यक्ति की जाति को देखकर किया जाता है, और वर्तमान मामले को देखने के बाद कोर्ट को ऐसा कोई सबूत या प्रामाणिक बातचीत नहीं मिली जिससे यह पता चल सके कि कथित काम जातिगत विचारों से प्रेरित होकर किया गया था, ऐसे में रेप और जातिगत अत्याचार के आरोप टिक नहीं सके।
इसके साथ ही कोर्ट ने यह निष्कर्ष निकालते हुए कि यह मामला सेक्शन 482 CrPC के तहत स्वाभाविक शक्तियों का इस्तेमाल करने के दायरे में आता है, इस मामले में दर्ज FIR और उससे जुड़ी सभी आगे की कार्यवाही को रद्द कर दिया।
'कथित घटना के बाद भी सामान्य बातचीत होती रही'
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता और आरोपी एक-दूसरे को पिछले लगभग चार सालों से जानते थे, और लगातार सम्पर्क में रहते थे। जिसमें लगातार मिलना-जुलना और बड़े पैमाने पर होने वाली वॉट्सऐप की बातचीत भी शामिल है। दोनों के बीच होने वाली बातचीत को देखने के बाद कोर्ट ने पाया कि इस बातचीत में आपसी स्नेह और सामान्य बातचीत दिखाई दे रही है, ना कि किसी तरह की धमकी, जबरदस्ती या फिर जाति आधारित दुर्व्यवहार भी नजर नहीं आ रहा है। यहां तक कि जिस तारीख को रेप होने के बारे में कहा गया है, उस तारीख के बाद भी दोनों की बातचीत में कोई असर नहीं दिख रहा है।
FIR में 5 महीने की देरी पर कोर्ट ने यह कहा
मामले की FIR दर्ज कराने में हुई पांच महीने की देरी का जिक्र करते हुए कोर्ट ने कहा कि हालांकि यौन अपराध के मामलों में यूं तो देरी अकेले घातक नहीं होती है, लेकिन शिकायतकर्ता अगर घटना के बाद भी लगातार आरोपी के साथ संपर्क में रहे और बातचीत करता रहे, तो यह देरी महत्वपूर्ण हो जाती है।
मेडिकल सबूतों पर गौर करते हुए कोर्ट ने कहा कि कोई भी चोट या सहायक मेडिकल निष्कर्ष इस बात की पुष्टि नहीं करते हैं कि शिकायतकर्ता पर जबरन यौन हमला हुआ हो। साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि कानूनी नोटिस देने के बावजूद शिकायतकर्ता द्वारा अपना मोबाइल फोन पेश नहीं करना, उसके द्वारा लगाए गए आरोपों की समग्र विश्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह लगाता है।
एक बात को लेकर अदालत ने चेताया
कोर्ट ने कहा कि रिश्ता टूटने के बाद लगे बलात्कार के आरोपों के मामलों की जांच में बेहद सावधानी की जरूरत होती है, खासकर जहां दोनों पक्ष वयस्क हों, और रिकॉर्ड पर रखे गए सबूतों में स्वेच्छा से शारीरिक संबंध बनाने का पता चल रहा हो। इस दौरान अदालत ने असफल रिश्तों को IPC की धारा 376 के तहत आपराधिक मुकदमों में बदलने की बढ़ती प्रवृत्ति के खिलाफ चेतावनी भी दी।
इसके साथ ही अदालत ने शादी के झूठे वादे पर यौन शोषण के दावे को खारिज कर दिया और कहा कि शिकायतकर्ता इस बारे में कोई सबूत पेश नहीं कर सकी कि रिश्ते की शुरुआत में शादी का कोई वादा बेईमानी के इरादे से किया गया था। यहां तक कि वॉट्सऐप बातचीत में भी शादी का कोई आश्वासन नहीं दिया गया था, बल्कि उससे तो आपसी सहमति वाले रिश्ते का ही पता चल रहा है।





