दिल्ली का भूजल स्तर तेजी से पाताल में समा रहा, जानें बीते 5 साल में कहां कितनी आई गिरावट
दिल्ली में भूजल का स्तर बहुत तेजी से गिरता जा रहा है। केंद्रीय भूजल प्राधिकरण की रिपोर्ट में इसको लेकर चौंकाने वाली बात सामने आई है। रिपोर्ट में दर्शाए गए आंकड़े वाकई सरकार के साथ ही दिल्लीवालों के लिए भी चिंताजनक हैं।

राजधानी दिल्ली में भूजल का स्तर तेजी से नीचे जा रहा है। पिछले पांच सालों में दिल्ली में भूजल का स्तर साढ़े चार मीटर से अधिक नीचे चला गया है। स्थिति इतनी खराब है कि भूजल दोहन के मामले में दिल्ली के दो ही इलाके यानी उत्तर पश्चिमी जिला और नजुल लैंड सुरक्षित श्रेणी में हैं। इसका खुलासा, केंद्रीय भूजल प्राधिकरण द्वारा नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में पेश एक रिपोर्ट में किया गया है।
केंद्रीय भूजल प्राधिकरण की ओर से एनजीटी प्रमुख जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव और विशेषज्ञ सदस्य डॉ. अफरोज अहमद की बेंच के समक्ष पेश की गई रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली में तेजी से भूजल स्तर में तेज गिरावट देखने को मिल रही है। इस रिपोर्ट के दिल्ली में भूजल स्तर और जनसंख्या को लेकर तुलनात्मक आंकड़े दिए गए हैं। इन आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि जैसे-जैसे दिल्ली की जंनसंख्या बढ़ी है, भूजल के स्तर में गिरावट देखी गई।
केंद्रीय भूजल प्राधिकरण की ओर से ट्रिब्यूनल में पेश वार्षिक भूजल संसाधन आकलन 2025 (जीडब्ल्यूआरए 2025) के आंकड़ों से साफ पता चलता है कि दिल्ली में भूजल के स्तर में तेजी से गिरावट आ रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2020 में जब दिल्ली की जनसंख्या 20.193 मिलियन यानी करीब 2 करोड़ थी, उस वक्ता जमीन की सतह से 64.1 मीटर नीचे पानी मिल जाता था। वहीं, 2025 में जब दिल्ली की जनसंख्या 2 करोड़ 22 लाख हुई, तब भूजल का स्तर 68.69 मीटर नीचे चला गया।
भूजल के स्तर के लिए सुरक्षित इलाका
रिपोर्ट के मुताबिक अधिकांश दिल्ली में भूजल का दोहन के लिहाज से अति गंभीर, गभीर या अर्द्ध गंभीर श्रेणी में। हालांकि औसतन पूरी दिल्ली में भूजल गंभीर श्रेणी में बना हुआ है यानी तय मानक से अधिक हो रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली में सिर्फ उत्तर पश्चिमी जिला और और नजुल लैंड क्षेत्र में भूजल की स्थिति सुरक्षित श्रेणी यानी यहां पर कम दोहन हो रहा है। इसके अलावा, नई दिल्ली, दक्षिणी दिल्ली, शहादरा और उत्तर पूर्वी दिल्ली अति गंभीर श्रेणी में है यानी इन इलाकों में सबसे अधिक भूजल का दोहन हो रहा है। इसके अलावा, पूर्वी और पश्चिमी जिला भूजल दोहन के मामले में गंभीर श्रेणी में बना हुआ है, जबकि मध्य जिला, उत्तरी, दक्षिण-पूर्वी, दक्षिण-पश्चिमी, अर्द्ध गंभीर श्रेणी में बना हुआ है।
बता दें कि राजधानी दिल्ली अनेक इलाकों में हर साल गर्मी आते ही जल संकट गहराने लगता है। इसे देखते हुए दिल्ली के जल मंत्री प्रवेश साहिब सिंह ने 2 जून को कहा था कि सरकार जल के समान वितरण, जल हानि में कमी, पुरानी पाइपलाइनों के आधुनिकीकरण और शोधित जल के पुनः उपयोग को बढ़ावा देने के लिए कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं पर काम कर रही है।
दिल्ली में हर साल बढ़ रही पानी की मांग
प्रवेश वर्मा ने कहा कि दिल्ली सरकार ने राजधानी की जल आपूर्ति व्यवस्था को मजबूत और भविष्य के लिए टिकाऊ बनाने के उद्देश्य से व्यापक सुधार अभियान की शुरुआत की है।उन्होंने बताया कि सरकार जल के समान वितरण, जल हानि में कमी, पुरानी पाइपलाइनों के आधुनिकीकरण और शोधित जल के पुनः उपयोग को बढ़ावा देने के लिए कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं पर काम कर रही है। इसे दिल्ली की जल प्रबंधन व्यवस्था में पिछले कई दशकों का सबसे बड़ा सुधार अभियान माना जा रहा है। उन्होंने कहा कि दिल्ली में हर साल पानी की मांग बढ़ रही है, जबकि उपलब्ध जल संसाधन सीमित हैं। उन्होंने बताया कि गर्मियों के दौरान राजधानी को लगभग 1,250 एमजीडी (मिलियन गैलन प्रतिदिन) पानी की आवश्यकता होती है, लेकिन यमुना नदी में लंबे समय से बने शुष्क हालात के कारण हाल के दिनों में जल उत्पादन में करीब 100 एमजीडी की कमी आई है, जिससे कुछ इलाकों में जल आपूर्ति प्रभावित हुई है। उन्होंने कहा कि सरकार तत्काल और दीर्घकालिक दोनों स्तरों पर समाधान लागू कर रही है ताकि दिल्ली के हर नागरिक को पानी की न्यायसंगत उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके। प्रवेश साहिब सिंह ने कहा कि बढ़ती आबादी और सीमित जल संसाधनों के बीच उपलब्ध पानी की हर बूंद का बेहतर प्रबंधन ही स्थायी समाधान है।
एक दर्जन विधानसभाओं से आती हैं सबसे अधिक शिकायतें
जल मंत्री के अनुसार दिल्ली की लगभग 12 से 13 विधानसभा क्षेत्रों से हर वर्ष गर्मियों में सबसे अधिक जल संकट की शिकायतें आती हैं, जबकि कुछ क्षेत्रों में अपेक्षाकृत अधिक जल उपलब्ध होता है। इस असंतुलन को दूर करने के लिए सरकार 'वॉटर रेशनलाइजेशन प्रोजेक्ट' शुरू कर रही है, जिसके तहत जनसंख्या घनत्व, जल मांग, उपलब्ध आपूर्ति और मौजूदा अवसंरचना का वैज्ञानिक अध्ययन कर संतुलित जल वितरण प्रणाली विकसित की जाएगी।
उन्होंने बताया कि दिल्ली के 16,634 किलोमीटर लंबे जल वितरण नेटवर्क में से लगभग 5,500 किलोमीटर पाइपलाइनें 30 वर्ष से अधिक पुरानी हैं। इन पाइपलाइनों में रिसाव और प्रदूषण का खतरा अधिक रहता है, जिससे बड़ी मात्रा में शोधित पानी उपभोक्ताओं तक पहुंचने से पहले ही नष्ट हो जाता है। सरकार ने पुरानी पाइपलाइनों को बदलने और पूरे नेटवर्क को मजबूत बनाने का अभियान शुरू कर दिया है।
प्रवेश वर्मा ने कहा कि जल सुरक्षा केवल अस्थायी उपायों से हासिल नहीं की जा सकती। इसके लिए संरचनात्मक सुधार, अवसंरचना में निवेश, वैज्ञानिक योजना और जिम्मेदार जल उपयोग आवश्यक है। पाइपलाइन प्रतिस्थापन, जल रेशनलाइजेशन, जल हानि में कमी, वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण और जल पुनर्चक्रण जैसे सभी पहलुओं पर सरकार एक साथ काम कर रही है। उन्होंने कहा कि सरकार का लक्ष्य राजधानी के हर घर तक स्वच्छ पानी पहुंचाना, पानी की हर बूंद का प्रभावी उपयोग सुनिश्चित करना और दिल्ली के किसी भी क्षेत्र को उपेक्षित महसूस न होने देना है।
(वार्ता के इनपुट के साथ)


