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कांग्रेस नेता अलका लांबा को झटका, कोर्ट ने याचिका खारिज की; कहा- छूट का दावा नहीं कर सकतीं

कांग्रेस नेता अलका लांबा को झटका, कोर्ट ने याचिका खारिज की; कहा- छूट का दावा नहीं कर सकतीं

संक्षेप:

दिल्ली की एक अदालत ने शुक्रवार को कांग्रेस नेता अलका लांबा की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती दी थी। मजिस्ट्रेट ने 2024 में जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मियों पर हमले से जुड़े एक मामले में आरोप तय करने का निर्देश दिया था।

Feb 06, 2026 05:34 pm ISTSubodh Kumar Mishra पीटीआई, नई दिल्ली
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दिल्ली की एक अदालत ने शुक्रवार को कांग्रेस नेता अलका लांबा की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती दी थी। मजिस्ट्रेट ने 2024 में जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मियों पर हमले से जुड़े एक मामले में आरोप तय करने का निर्देश दिया था।स्पेशल जज दिग विनय सिंह ने दिसंबर 2025 के आदेश के खिलाफ लांबा की रिवीजन याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि मजिस्ट्रेट कोर्ट ने यह निष्कर्ष निकालने में अपने न्यायिक विवेक का इस्तेमाल किया था कि उनके खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला बनता है।

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मजिस्ट्रेट ने आरोप तय करने का आदेश दिया था

अभियोजन पक्ष ने कांग्रेस नेता पर 29 जुलाई 2024 को जंतर-मंतर पर महिला आरक्षण के समर्थन में विरोध प्रदर्शन करते समय पुलिस को रोकने और सार्वजनिक सड़क को ब्लॉक करने का आरोप लगाया था। 19 दिसंबर को मजिस्ट्रेट ने एक सरकारी कर्मचारी को ड्यूटी करने से रोकने के लिए हमला या आपराधिक बल का इस्तेमाल करने, एक सरकारी अधिकारी को रोकने, एक सरकारी कर्मचारी द्वारा जारी किए गए आदेश की अवज्ञा करने और सार्वजनिक रास्ते में खतरा या रुकावट पैदा करने के अपराधों के लिए आरोप तय करने का आदेश दिया था।

पहली नजर में मामला बनता है

शुक्रवार को दिए गए अपने आदेश में कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट (मजिस्ट्रेट) ने चश्मदीदों के बयानों और इलेक्ट्रॉनिक सबूतों की जांच करने के लिए अपने न्यायिक विवेक का इस्तेमाल किया है। वह इस नतीजे पर पहुंचा है कि पहली नजर में मामला बनता है। आरोप तय करने का पैमाना उचित संदेह से परे सबूत नहीं है, बल्कि आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त आधार है।

पहले से कोई राय नहीं बनाई जा सकती

स्वतंत्र गवाहों की कमी, चोटों की गैर-मौजूदगी और विरोध के स्वरूप के बारे में कांग्रेस नेता की दलीलों को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि इन पहलुओं को ट्रायल के दौरान साबित करने की जरूरत है। इन पर पहले से कोई राय नहीं बनाई जा सकती। कोर्ट ने कहा कि चूंकि मजिस्ट्रेट के आदेश में साफ तौर पर कोई गैर-कानूनी बात, मनमानी या अधिकार क्षेत्र की गलती नहीं है, इसलिए यह रिवीजन याचिका खारिज की जाती है।

आरोप सिर्फ वीडियो के आधार पर नहीं

कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट के मुताबिक, शिकायतकर्ता (एक हेड कांस्टेबल) और दूसरे पुलिस अधिकारियों के बयानों से पता चलता है कि लांबा प्रदर्शनकारियों को तय जगह से बाहर ले जाने, अधिकारियों के खिलाफ क्रिमिनल फोर्स का इस्तेमाल करने और जानबूझकर आदेश का पालन न करने में शामिल थीं। इसमें कहा गया है कि आरोप सिर्फ वीडियो के आधार पर नहीं लगाए गए हैं। वीडियो के अलावा, चश्मदीदों के बयान भी हैं। अगर चश्मदीदों के बयानों और वीडियो में कुछ फर्क भी है तो यह ट्रायल का मामला होगा। इस स्टेज पर इस पर पहले से कोई राय नहीं बनाई जा सकती।

छूट का दावा नहीं कर सकतीं

अलका लांबा की इस दलील पर कि विरोध प्रदर्शन छूट वाले जंतर-मंतर इलाके में किया गया था, कोर्ट ने कहा कि छूट वाला जोन पहली बैरिकेड की लाइन के अंदर था। पहली बैरिकेड की लाइन पर चढ़ने और कूदने, दूसरे प्रदर्शनकारियों के साथ दूसरी बैरिकेड की लाइन को तोड़ने की कोशिश करने और फिर बैरिकेड के किनारे से खिसककर भाग जाने के बाद वह किसी भी तरह की छूट का दावा नहीं कर सकतीं।

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कोर्ट ने मजिस्ट्रेट की बात से सहमति जताई

इसमें कहा गया कि रिकॉर्ड से पता चलता है कि हालांकि जंतर मंतर को छूट दी गई थी, लेकिन याचिकाकर्ता (लांबा) ने उस इलाके से आगे संसद की तरफ मार्च किया, जिसका मकसद बिल्डिंग का घेराव करना था। कोर्ट ने मजिस्ट्रेट की इस बात से सहमति जताई कि पुलिस चेन के खिलाफ धक्का-मुक्की करना आपराधिक बल माना जाएगा और दो पुलिस अधिकारियों के बयानों के अनुसार उन्होंने ऐसे बल का इस्तेमाल किया था।

पुलिस अधिकारी भी एक काबिल गवाह होता है

इसमें आगे कहा गया है कि आरोप उनके जाने से पहले की गई हरकतों पर आधारित हैं। खासकर एक नेता के तौर पर प्रदर्शनकारियों को उकसाने में उनकी भूमिका पर। सिर्फ इसलिए कि याचिकाकर्ता के खिलाफ ही चार्जशीट दायर की गई है और किसी अन्य प्रदर्शनकारी के खिलाफ चार्जशीट दायर नहीं की गई है, यह बरी करने का आधार नहीं हो सकता।

कोर्ट ने अलका लांबा की स्वतंत्र गवाहों की कमी वाली दलील को भी खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि कानून की नजर में एक पुलिस अधिकारी भी एक काबिल गवाह होता है, जिसकी गवाही पर सिर्फ इसलिए शक नहीं किया जा सकता क्योंकि वह पुलिस से है।

Subodh Kumar Mishra

लेखक के बारे में

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सुबोध कुमार मिश्रा पिछले 19 साल से हिंदी पत्रकारिता में योगदान दे रहे हैं। वर्तमान में वह 'लाइव हिन्दुस्तान' में स्टेट डेस्क पर बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। दूरदर्शन के 'डीडी न्यूज' से इंटर्नशिप करने वाले सुबोध ने पत्रकारिता की विधिवत शुरुआत 2007 में दैनिक जागरण अखबार से की। दैनिक जागरण के जम्मू एडीशन में बतौर ट्रेनी प्रवेश किया और सब एडिटर तक का पांच साल का सफर पूरा किया। इस दौरान जम्मू-कश्मीर को बहुत ही करीब से देखने और समझने का मौका मिला। दैनिक जागरण से आगे के सफर में कई अखबारों में काम किया। इनमें दिल्ली-एनसीआर से प्रकाशित होने वाली नेशनल दुनिया, नवोदय टाइम्स (पंजाब केसरी ग्रुप), अमर उजाला और हिन्दुस्तान जैसे हिंदी अखबार शामिल हैं। अखबारों के इस लंबे सफर में खबरों को पेश करने के तरीकों से पड़ने वाले प्रभावों को काफी बारीकी से समझने का मौका मिला।

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