12 साल बाद बेगुनाह साबित, कोर्ट ने पति को दोषमुक्त करते हुए कहा- सबूत का स्थान नहीं ले सकता संदेह
दिल्ली की एक अदालत ने करीब 12 साल पुराने मामले में आरोपी पति को बेगुनाह करार देते हुए दोषमुक्त कर दिया। अदालत ने माना कि उस पर लगे गंभीर आरोप मेडिकल साक्ष्यों की कसौटी पर टिक नहीं पाए। अदालत ने कहा कि एमएलसी रिपोर्ट में न तो मारपीट के निशान मिले और न ही महिला ने डॉक्टर को ऐसी कोई जानकारी दी।

दिल्ली की कड़कड़डूमा अदालत ने करीब 12 साल पुराने मामले में आरोपी पति को बेगुनाह बताया। अदालत ने गौरव आनंद को आपराधिक धमकी, मारपीट, दुष्कर्म के लिए उकसाने व अन्य गंभीर आरोपों से दोषमुक्त कर दिया। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश रवींद्र कुमार पांडेय की अदालत ने माना कि शिकायतकर्ता महिला के गंभीर आरोप मेडिकल साक्ष्यों की कसौटी पर टिक नहीं पाए।
अदालत ने कहा कि घटना के तुरंत बाद तैयार की गई मेडिको-लीगल केस (एमएलसी) रिपोर्ट में न तो मारपीट के कोई निशान मिले और न ही महिला ने डॉक्टर को ऐसी किसी हिंसा की जानकारी दी, जबकि शिकायत में उसने बेहद गंभीर आरोप लगाए थे। इस बुनियादी विरोधाभास ने पूरे मामले को संदेहास्पद बना दिया और यही मेडिकल रिपोर्ट आरोपी की बेगुनाही का सबसे मजबूत आधार साबित हुई।
महिला ने 2014 में दर्ज कराया था मामला
मामला वर्ष 2014 का है। शिकायत के मुताबिक, एक महिला ने अपने पति गौरव आनंद और उसके साथियों सोनू बंगालन, तरुण सोनी और अफसाना खातून के खिलाफ शाहदरा थाने में शिकायत दर्ज कराई थी। महिला ने आरोप लगाया था कि उसका पति उसे जबरन देह व्यापार में धकेल रहा था। विरोध करने पर आरोपियों ने उसकी बेटी को छत से फेंकने की धमकी दी, उसे बंधक बनाया और चाकू की नोंक पर उसके साथ दुष्कर्म कर मारपीट की गई।
अदालत ने आरोप तय किए
इन आरोपों के आधार पर पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया। अदालत ने आरोपी के खिलाफ आईपीसी की धारा 323 (मारपीट), 109 सह-पठित 376 (दुष्कर्म के लिए उकसाने व सहयोग), 506 (आपराधिक धमकी) और अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम (आईटीपी एक्ट) की धारा पांच के तहत आरोप तय किए।
बार-बार बदली गवाही
आरोपी की ओर से अधिवक्ता अमित कुमार ढाका और अधिवक्ता हरमीत सिंह गुलाटी ने पैरवी करते हुए अभियोजन के पूरे मामले पर सवाल खड़े किए। बचाव पक्ष ने दलील दी कि शिकायतकर्ता महिला ने पुलिस, मजिस्ट्रेट और अदालत के समक्ष दिए गए अपने बयानों में बार-बार घटनाओं, तारीखों और परिस्थितियों को बदला, जिससे उसकी गवाही की विश्वसनीयता संदिग्ध हो गई।
अधिवक्ता अमित ने विशेष रूप से मेडिकल साक्ष्यों की ओर अदालत का ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने बताया कि महिला ने अपनी शिकायत में गंभीर मारपीट और बंधक बनाकर रखने के आरोप लगाए थे, लेकिन घटना के तुरंत बाद कराई गई एमएलसी में चोट या मारपीट का उल्लेख नहीं है।
सबूत का स्थान नहीं ले सकता संदेह
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि आपराधिक मामलों में केवल गंभीर आरोप पर्याप्त नहीं होते, बल्कि उन्हें ठोस और विश्वसनीय साक्ष्यों से साबित किया जाना आवश्यक है। अदालत ने कहा कि संदेह चाहे कितना भी गहरा क्यों न हों, वे कभी भी ठोस सबूतों का स्थान नहीं ले सकते। बयानों में भारी विरोधाभासों और एमएलसी में मारपीट की पुष्टि न होने के चलते अदालत ने पति गौरव आनंद को बरी कर दिया।
अदालत ने यह भी माना कि मामला अनैतिक व्यापार जैसे अपराध का नहीं, बल्कि वैवाहिक विवाद से उपजा है। मामले में आरोपी सोनू बंगालन की ट्रायल के दौरान ही मौत हो गई थी। वहीं, आरोपी तरुण सोनी और अफसाना खातून को अदालत पहले ही भगोड़ा घोषित कर चुकी है।
रिपोर्टः निखिल पाठक
लेखक के बारे में
Subodh Kumar Mishraसुबोध कुमार मिश्रा पिछले 19 साल से हिंदी पत्रकारिता में योगदान दे रहे हैं। वर्तमान में वह 'लाइव हिन्दुस्तान' में स्टेट डेस्क पर बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। दूरदर्शन के 'डीडी न्यूज' से इंटर्नशिप करने वाले सुबोध ने पत्रकारिता की विधिवत शुरुआत 2007 में दैनिक जागरण अखबार से की। दैनिक जागरण के जम्मू एडीशन में बतौर ट्रेनी प्रवेश किया और सब एडिटर तक का पांच साल का सफर पूरा किया। इस दौरान जम्मू-कश्मीर को बहुत ही करीब से देखने और समझने का मौका मिला। दैनिक जागरण से आगे के सफर में कई अखबारों में काम किया। इनमें दिल्ली-एनसीआर से प्रकाशित होने वाली नेशनल दुनिया, नवोदय टाइम्स (पंजाब केसरी ग्रुप), अमर उजाला और हिन्दुस्तान जैसे हिंदी अखबार शामिल हैं। अखबारों के इस लंबे सफर में खबरों को पेश करने के तरीकों से पड़ने वाले प्रभावों को काफी बारीकी से समझने का मौका मिला।
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