शब्दों के जाल बुनकर बच नहीं सकती बीमा कंपनी, ब्याज सहित रकम और मुआवजा भी देः आयोग

Subodh Kumar Mishra हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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उपभोक्ता आयोग ने एक अहम फैसले में कहा कि बीमा कंपनियां क्लेम देने के लिए शब्दों के जाल बुनकर बच नहीं सकतीं। आयोग ने पीड़िता के पक्ष में फैसला देते हुए उसे न्याय दिलाया। आयोग ने कंपनी को निर्देश दिया कि वह पॉलिसी के तहत देय राशि का भुगतान ब्याज सहित करे और मानसिक पीड़ा के लिए मुआवजा भी दे।

शब्दों के जाल बुनकर बच नहीं सकती बीमा कंपनी, ब्याज सहित रकम और मुआवजा भी देः आयोग

उपभोक्ता आयोग ने एक अहम फैसले में कहा कि बीमा कंपनियां क्लेम देने के लिए शब्दों के जाल बुनकर अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकतीं। आयोग ने पीड़िता के पक्ष में फैसला देते हुए उसे न्याय दिलाया। आयोग ने कंपनी को निर्देश दिया कि वह पॉलिसी के तहत देय राशि का भुगतान ब्याज सहित करे और मानसिक पीड़ा के लिए मुआवजा भी दे।

दरअसल, पति की मौत के बाद जिस बीमा पॉलिसी से राहत की उम्मीद थी, उसी ने ऐन वक्त पर साथ छोड़ दिया। ऐसे में विधवा उपभोक्ता को न केवल अपनों को खोने का गम सहना पड़ा, बल्कि वह कर्ज और बीमा कंपनी की बेरुखी के बीच कानूनी लड़ाई में भी उलझ गई। बीमा कंपनी ने मौत की वजह को तकनीकी जाल में उलझाकर क्लेम खारिज कर दिया, लेकिन आखिरकार अस्पताल की ओर से जारी मृत्यु प्रमाण पत्र ने पूरा मामला पलटते हुए करीब छह साल बाद पीड़िता को न्याय दिलाया।

बीमा कंपनी की मनमानी पर सख्त रुख

उत्तर जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने मामले में बीमा कंपनी की मनमानी पर सख्त रुख अपनाया। आयोग अध्यक्ष दिव्य ज्योति जयपुरियार, सदस्य अश्विनी कुमार मेहता और हरप्रीत कौर चर्या की पीठ ने एचडीएफसी एर्गो जनरल इंश्योरेंस कंपनी को फटकार लगाते हुए पीड़िता के पक्ष में फैसला सुनाया। आयोग ने कंपनी को निर्देश दिया कि वह पॉलिसी के तहत देय राशि का भुगतान ब्याज सहित करे और मानसिक पीड़ा के लिए मुआवजा भी दे।

ठोस आधार के बिना बदला मौत का कारण

आयोग ने पाया कि कंपनी ने बिना पर्याप्त साक्ष्य के मृत्यु के कारण को बदलने की कोशिश की, जबकि आधिकारिक मृत्यु प्रमाण पत्र सबसे विश्वसनीय दस्तावेज था। आयोग ने माना कि कंपनी ने बिना पर्याप्त आधार के क्लेम खारिज कर सेवा में कमी की। हालांकि, पॉलिसी की शर्तों के अनुसार सह-आवेदक को बीमा राशि का 50 प्रतिशत मिलना ही तय था। इस आधार पर आयोग ने कंपनी को 10.28 लाख रुपये देने का आदेश दिया। एक लाख रुपये मानसिक उत्पीड़न के लिए भी देने को कहा।

पॉलिसी में कवर थी बीमारी लेकिन नहीं मिला लाभ

यह मामला संत नगर निवासी ज्योति सिंह की शिकायत से जुड़ा है। ज्योति और उनके पति अतुल शर्मा ने गुरुग्राम में फ्लैट खरीदने के लिए वर्ष 2020 में 19.92 लाख रुपये का होम लोन लिया था। ऋण को सुरक्षित करने के लिए होम क्रेडिट एश्योर बीमा पॉलिसी भी ली, ताकि अनहोनी की स्थिति में परिवार पर कर्ज का बोझ न पड़े।

अप्रैल 2021 में पति अतुल की तबीयत बिगड़ी और उपचार के दौरान उनकी मौत हो गई। अस्पताल ने मृत्यु प्रमाण पत्र में ह्दयाघात को मौत की वजह बताया। यह बीमारी बीमा पॉलिसी के तहत कवर भी थी। लेकिन कंपनी ने क्लेम खारिज कर दिया और कहा कि मौत कोविड निमोनाइटिस से हुई, जो पॉलिसी में शामिल नहीं है।

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लेखक के बारे में

Subodh Kumar Mishra

सुबोध कुमार मिश्रा पिछले 19 साल से हिंदी पत्रकारिता में योगदान दे रहे हैं। वर्तमान में वह 'लाइव हिन्दुस्तान' में स्टेट डेस्क पर बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। दूरदर्शन के 'डीडी न्यूज' से इंटर्नशिप करने वाले सुबोध ने पत्रकारिता की विधिवत शुरुआत 2007 में दैनिक जागरण अखबार से की। दैनिक जागरण के जम्मू एडीशन में बतौर ट्रेनी प्रवेश किया और सब एडिटर तक का पांच साल का सफर पूरा किया। इस दौरान जम्मू-कश्मीर को बहुत ही करीब से देखने और समझने का मौका मिला। दैनिक जागरण से आगे के सफर में कई अखबारों में काम किया। इनमें दिल्ली-एनसीआर से प्रकाशित होने वाली नेशनल दुनिया, नवोदय टाइम्स (पंजाब केसरी ग्रुप), अमर उजाला और हिन्दुस्तान जैसे हिंदी अखबार शामिल हैं। अखबारों के इस लंबे सफर में खबरों को पेश करने के तरीकों से पड़ने वाले प्रभावों को काफी बारीकी से समझने का मौका मिला।

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