
लिव-इन पार्टनर को पारिवारिक पेंशन में शामिल किया जाए, कर्मचारी की याचिका पर HC का केंद्र को निर्देश
दिल्ली हाई कोर्ट ने रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी की एक याचिका पर केंद्र सरकार को विचार करने का निर्देश दिया है। याचिका में पारिवारिक पेंशन में लिव-इन पार्टनर को शामिल करने की मांग की गई है। कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता सरकारी कर्मचारी ने कभी भी अपने रिश्ते को नहीं छिपाया।
दिल्ली हाई कोर्ट ने रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी की एक याचिका पर केंद्र सरकार को विचार करने का निर्देश दिया है। याचिका में पारिवारिक पेंशन में लिव-इन पार्टनर को शामिल करने की मांग की गई है। कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता सरकारी कर्मचारी ने कभी भी अपने रिश्ते को नहीं छिपाया। ऐसे में उनकी साथी और बच्चों को सेवानिवृत्ति के बाद के लाभों से वंचित करने के लिए 'गंभीर दुराचार' मानना गलत है।
दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह एक सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी की याचिका पर विचार करे। इसमें पारिवारिक पेंशन और स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए पेंशन भुगतान आदेश में 40 साल से उनके साथ रह रही उनकी साथी और उनके बच्चों के नाम शामिल करने की मांग की गई है। जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस मधु जैन की पीठ ने माना कि याचिकाकर्ता सरकारी कर्मचारी ने कभी भी अपने रिश्ते को नहीं छिपाया। इसलिए, उनकी साथी और बच्चों के नाम परिवार में शामिल करने के उनके प्रयास को सेवानिवृत्ति के बाद के लाभों से वंचित करने के लिए गंभीर दुराचार मानना गलत है।
पीठ ने केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT) के 2018 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें अधिकारियों द्वारा 2012 में सेवानिवृत्त हुए कर्मियों को दी जाने वाली मासिक पेंशन और ग्रेच्युटी का 50 प्रतिशत हिस्सा रोकने के निर्णय को बरकरार रखा गया था। हाई कोर्ट ने 7 जनवरी को दिए अपने फैसले में कहा कि हमें याचिकाकर्ता की मासिक पेंशन और ग्रेच्युटी का 50 प्रतिशत हिस्सा स्थायी रूप से रोकने या याचिकाकर्ता के आश्रितों को पारिवारिक पेंशन देने से इनकार करने का कोई वैध कारण नजर नहीं आ रहा है।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि हम प्रतिवादियों को निर्देश देते हैं कि वे याचिकाकर्ता को बकाया रकम वास्तविक भुगतान तिथि तक 6 प्रतिशत सालाना ब्याज सहित जारी करें। आदेश में कहा गया कि प्रतिवादियों को यह भी निर्देश दिया जाता है कि वे पारिवारिक पेंशन और सीजीएचएस सुविधाओं के लिए पेंशन भुगतान आदेश में (साथी) और उसके बच्चों का नाम शामिल करने के याचिकाकर्ता के अनुरोध पर विचार करें।
याचिकाकर्ता के अनुसार, पत्नी द्वारा तलाक के लिए सहमत हुए बिना उसे छोड़ दिए जाने के बाद उसने 1983 में एक अन्य महिला के साथ रहना शुरू कर दिया और उनके दो बच्चे भी हुए। 1990 में उस पर पत्नी और बेटी की उपेक्षा करने और दूसरी महिला के साथ रहने के आरोप में विभागीय कार्यवाही शुरू की गई। उसे चार वर्षों की अवधि के लिए वेतन में चार चरणों की कटौती का दंड भुगतना पड़ा।
सेवानिवृत्ति से पहले याचिकाकर्ता के खिलाफ 2011 में एक और अनुशासनात्मक जांच शुरू की गई थी। इसमें उन पर अपनी पत्नी और बच्चों के लिए राजनयिक पासपोर्ट आवेदन करते समय कथित रूप से गलत जानकारी देने का आरोप था। इसके लिए उनकी मासिक पेंशन और ग्रेच्युटी लाभों का 50 प्रतिशत रोक दिया गया था।
कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता ने अपनी पत्नी की निरंतर अनुपस्थिति और अपने लिव-इन रिलेशनशिप के बारे में अपनी पूरी सेवा अवधि के दौरान खुलासा किया था। इसलिए राजनयिक पासपोर्ट प्राप्त करने में किसी प्रकार की छल या दुर्भावनापूर्ण इरादा नहीं था। कोर्ट ने कहा कि सीसीएस (पेंशन) नियम अधिकारियों को गंभीर दुराचार या लापरवाही के मामलों में सरकारी कर्मचारी की पेंशन रोकने या वापस लेने का अधिकार देते हैं, लेकिन याचिकाकर्ता ने ऐसा कोई गंभीर दुराचार या लापरवाही नहीं की थी।
कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता ने कभी भी अपने रिश्ते को नहीं छिपाया। उसने सेवा रिकॉर्ड में अपनी लिव-इन पार्टनर और उसके बच्चों के बारे में लगातार जानकारी दी और पारिवारिक पेंशन लाभ के लिए लंबे समय तक साथ रहने के आधार पर उसे अपनी पत्नी के रूप में बताया। इसलिए, हमारी राय है कि याचिकाकर्ता ने अपने संबंधों के संबंध में प्रतिवादियों के साथ हर समय पारदर्शिता बनाए रखी और राजनयिक पासपोर्ट प्राप्त करने के लिए गलत जानकारी देने या विभाग को धोखा देने का उसका कोई दुर्भावनापूर्ण इरादा नहीं था।





