प्रेग्नेंसी में वकील कोर्ट नहीं पहुंची तो मुवक्किल पर लगा जुर्माना, HC ने क्या दी राहत?
वकील के 8 माह की गर्भवती होने के कारण गैरहाजिर रहने को ठोस वजह मानते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता पर लगाया गया 25 हजार का जुर्माना रद्द कर दिया। क्या था पूरा मामला? इस रिपोर्ट में जानें…

हेमलता कौशिक, नई दिल्ली
दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है कि अदालतों को मातृत्व से जुड़ी मुश्किलों का सामना कर रही महिला वकीलों के प्रति संवेदनशील व मानवीय रवैया अपनाना चाहिए। दिल्ली हाई कोर्ट ने माना कि अगर वकील के न आ पाने का ठोस कारण बताया गया है, तो मुवक्किल पर भारी जुर्माना नहीं लगाया जा सकता है।
25 हजार रुपये के जुर्माने को रद्द कर दिया
जस्टिस अजय डिगपॉल की पीठ ने याचिकाकर्ता दिलबाग सिंह पर लगाए गए 25 हजार रुपये के जुर्माने को रद्द कर दिया और उन्हें राहत दी। यह मामला तीस हजारी कोर्ट में चल रहे एक दीवानी मुकदमे से जुड़ा है।
गवाह से जिरह का था मौका
याचिकाकर्ता ने प्रतिवादी के गवाह से जिरह करने का एक और मौका मांगा था, क्योंकि उनका पिछला मौका खत्म कर दिया गया था। उनकी वकील अदिति दराल ने पहले गवाह से कुछ हद तक जिरह की थी, लेकिन बाद की तारीखों पर मौजूद नहीं रह सकीं।
खत्म कर दिया था याचिकाकर्ता का मौका
आदेश के मुताबिक, एक तारीख पर दिल्ली बार काउंसिल के चुनाव के दौरान वकील उपलब्ध नहीं थीं। अगली तारीख पर वकील के कार्यवाही में शामिल न हो पाने के बाद याचिकाकर्ता का मौका खत्म कर दिया गया था।
दी गई थी आराम की सलाह
इसके बाद याचिकाकर्ता ने मौका बहाल करने और जिरह पूरी करने के लिए एक आखिरी मौका पाने की अर्जी दी। यह बताया गया कि मुख्य वकील का नहीं आना जानबूझकर नहीं था, क्योंकि उस समय वह आठ महीने की गर्भवती थीं और उन्हें आराम की सलाह दी गई थी।
25 हजार रुपये के जुर्माने से दी थी राहत
सत्र अदालत ने अर्जी मंजूर कर ली और जिरह का मौका बहाल कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने यह राहत इस शर्त पर दी कि प्रतिवादी के वकील को 25 हजार रुपये का जुर्माना दिया जाए। जुर्माना लगाए जाने से परेशान होकर याचिकाकर्ता दिल्ली हाई कोर्ट पहुंचे।
वकील को दी थी आराम की सलाह
उन्होंने तर्क दिया कि वकील के न आ पाने का ठोस कारण बताया गया था और लगाया गया जुर्माना बहुत ज्यादा है। पीठ ने पाया कि वकील को आराम की सलाह दी गई थी। पीठ ने माना कि यह उनके न आ पाने का ठोस कारण था।
सही कारण हों तो बोझ डालना उचित नहीं
पीठ ने कहा कि जुर्माने का मकसद टालने योग्य गलतियों को रोकना और पीड़ित पक्ष को उचित मुआवजा देना होता है, लेकिन जब न आ पाने के असली कारण साबित हो गए हों, तो यह बहुत भारी बोझ नहीं बनना चाहिए।
याचिकाकर्ता पर भारी जुर्माने का बोझ उचित नहीं
अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता पर भारी जुर्माने का बोझ नहीं डाला जाना चाहिए, खासकर तब जब न आ पाने का ठोस कारण बताया गया हो। पीठ ने पूरा खर्च माफ कर दिया है। पीठ ने सत्र अदालत के उस आदेश की शर्त को रद्द कर दिया, जिसमें याचिकाकर्ता को गवाह से जिरह करने की इजाजत देने के लिए रकम का भुगतान करना जरूरी था।


