काम की बात: दिल्ली में यहां-वहां पेशाब किया तो भारी जुर्माना, कई छोटे अपराधों में नहीं होगी जेल की सजा

Subodh Kumar Mishra हिन्दुस्तान टाइम्स, नई दिल्ली
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दिल्ली के लोगों को जल्द ही सिविक नियमों के उल्लंघन के लिए ज्यादा जुर्माना भरना पड़ सकता है। शुक्रवार को संसद में पेश किए गए 'जन विश्वास प्रावधानों में संशोधन विधेयक 2026 के तहत कई छोटे अपराधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने का भी प्रस्ताव है।

दिल्ली में यहां-वहां पेशाब किया तो भारी जुर्माना, कई छोटे अपराधों में नहीं होगी जेल की सजा

दिल्ली के लोगों को जल्द ही सिविक नियमों के उल्लंघन के लिए ज्यादा जुर्माना भरना पड़ सकता है। शुक्रवार को संसद में पेश किए गए 'जन विश्वास प्रावधानों में संशोधन विधेयक 2026 के तहत कई छोटे अपराधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने का भी प्रस्ताव है।

इन संशोधनों में दिल्ली नगर निगम अधिनियम, 1957 और नई दिल्ली नगर परिषद अधिनियम, 1994 शामिल हैं। दिल्ली नगर निगम के एक अधिकारी ने कहा कि इसका मकसद पुराने पड़ चुके प्रावधानों को तर्कसंगत बनाना और सजा-आधारित व्यवस्था अपनाकर लोगों के जीवन और कारोबार करने में आसानी को बढ़ावा देना है।

पहली बार उल्लंघन करने पर चेतावनी

दिल्ली नगर निगम एक्ट के तहत मामूली जुर्माने की जगह अब तय पेनल्टी लगाने का प्रस्ताव है। गंदगी न हटाने पर अभी 50 रुपए का जुर्माना लगता है। अब पहली बार उल्लंघन करने पर चेतावनी दी जाएगी और उसके बाद 500 रुपए का जुर्माना लगेगा। सार्वजनिक जगहों पर पेशाब करने या गंदगी फैलाने पर पहले 50 रुपए तक का जुर्माना लगता था, अब 500 रुपए का जुर्माना लग सकता है। दूसरे उल्लंघनों के लिए भी पेनाल्टी में भारी बढ़ोतरी होगी।

हाउस नंबर खराब करने पर भी जुर्माना बढ़ा

कुत्ते को बिना पट्टे के घूमने देने पर जुर्माना 50 रुपए से बढ़कर 1000 हो जाएगा। जबकि हाउस नंबर को खराब करने पर भी जुर्माना 50 से बढ़कर 1000 रुपए हो जाएगा। खतरनाक इमारत को खाली न करने और कंप्लीशन सर्टिफिकेट के बिना किसी इमारत में रहने पर लगने वाला जुर्माना 200 से बढ़कर 1000 रुपए हो जाएंगे। बिना अनुमति के सड़कों या खुली जगहों पर ऐसी इमारतें बनाने पर जिनसे रास्ता रुकता हो तो 5000 रुपए तक का जुर्माना लगेगा।

बिना लाइसेंस के स्टॉल चलाने पर 1000 तक जुर्माना

बिना लाइसेंस के चाय की दुकानों जैसी खाने-पीने की दुकानें या स्टॉल चलाने पर लगने वाला जुर्माना 100 से बढ़कर 1000 रुपए हो सकता है। बिना लाइसेंस के फेरी लगाने, मछली बेचने वाले या मुर्गी बेचने वाले के तौर पर काम करने पर लगने वाला जुर्माना बढ़कर 200 रुपए हो जाएगा। सार्वजनिक सड़कों पर जानवरों को बांधने या मवेशियों का दूध निकालने पर लगने वाला जुर्माना दस गुना बढ़कर 1000 रुपए हो जाएगा, जबकि नियमों का उल्लंघन करते हुए जानवर रखने पर लगने वाला जुर्माना दोगुना होकर 200 रुपए हो जाएगा।

कई मामलों में रोजाना लगने वाले जुर्माने की जगह एक बार लगने वाली पेनाल्टी लगाने का प्रस्ताव है। उदाहरण के लिए, बिना लाइसेंस वाले बूचड़खानों या बाजारों का इस्तेमाल करने पर पहले 500 रुपए के साथ-साथ रोजाना जुर्माना भी लगता था, लेकिन अब इस पर सिर्फ 500 रुपए की एक तय पेनाल्टी लगेगी।

छोटे-मोटे अपराधों के लिए जेल की सजा नहीं

इस बिल में छोटे-मोटे अपराधों के लिए जेल की सजा के प्रावधान को हटा दिया गया है। बिना सूचना दिए ड्यूटी छोड़ने वाले नगर निगम के सफाईकर्मियों को एक महीने तक की जेल हो सकती थी। इस नियम को अब हटाने का प्रस्ताव है। इसी तरह, नगर निगम के नियमों का उल्लंघन करने पर तीन महीने तक की जेल और जुर्माने की सजा होती थी। अब सिर्फ 500 रुपए तक का जुर्माना लगेगा।

कुछ छोटे-मोटे अपराधों को पूरी तरह से अपराध की श्रेणी से बाहर करने का प्रस्ताव है। इनमें सड़कों पर कूड़ा डालना, बिना अनुमति के जगहों पर कपड़े धोना, खाली पड़ी संपत्तियों की जानकारी न देना और स्ट्रीटलाइट्स को नुकसान पहुंचाना शामिल है।

एनडीएमसी एक्ट में भी बदलाव

एनडीएमसी एक्ट में किए गए बदलाव भी इसी तरह के तरीके पर आधारित हैं। एक आधिकारिक नोट में बताया गया है कि 145 प्रावधानों को अपराध की श्रेणी से हटा दिया गया है। इनमें से 68 ऐसे हैं जिनमें जुर्माने या जेल की सजा को पेनाल्टी में बदल दिया गया है। 26 ऐसे हैं जिनमें दंडात्मक प्रावधानों को पूरी तरह से हटा दिया गया है। अधिकारियों ने बताया कि जुर्माने की रकम बढ़ाकर और आपराधिक दायित्व को हटाकर इस ढांचे का मकसद नियमों को लागू करने में संतुलन बनाना है।

Subodh Kumar Mishra

लेखक के बारे में

Subodh Kumar Mishra

सुबोध कुमार मिश्रा पिछले 19 साल से हिंदी पत्रकारिता में योगदान दे रहे हैं। वर्तमान में वह 'लाइव हिन्दुस्तान' में स्टेट डेस्क पर बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। दूरदर्शन के 'डीडी न्यूज' से इंटर्नशिप करने वाले सुबोध ने पत्रकारिता की विधिवत शुरुआत 2007 में दैनिक जागरण अखबार से की। दैनिक जागरण के जम्मू एडीशन में बतौर ट्रेनी प्रवेश किया और सब एडिटर तक का पांच साल का सफर पूरा किया। इस दौरान जम्मू-कश्मीर को बहुत ही करीब से देखने और समझने का मौका मिला। दैनिक जागरण से आगे के सफर में कई अखबारों में काम किया। इनमें दिल्ली-एनसीआर से प्रकाशित होने वाली नेशनल दुनिया, नवोदय टाइम्स (पंजाब केसरी ग्रुप), अमर उजाला और हिन्दुस्तान जैसे हिंदी अखबार शामिल हैं। अखबारों के इस लंबे सफर में खबरों को पेश करने के तरीकों से पड़ने वाले प्रभावों को काफी बारीकी से समझने का मौका मिला।

ज्यादातर नेशनल और स्टेट डेस्क पर काम करने का अवसर मिलने के कारण राजनीतिक और सामाजिक विषयों से जुड़ी खबरों में दिलचस्पी बढ़ती गई। कई लोकसभा और विधानसभा चुनावों की खबरों की पैकेजिंग टीम का हिस्सा रहने के कारण भारतीय राजनीति के गुणा-भाग को समझने का मौका मिला।

शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो सुबोध ने बीएससी (ऑनर्स) तक की अकादमिक शिक्षा हासिल की है। साइंस स्ट्रीम से पढ़ने के कारण उनके पास चीजों को मिथ्यों से परे वैज्ञानिक तरीके से देखने की समझ है। समाज से जुड़ी खबरों को वैज्ञानिक कसौटियों पर जांचने-परखने की क्षमता है। उन्होंने मास कम्यूनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा किया है। इससे उन्हें खबरों के महत्व, खबरों के एथिक्स, खबरों की विश्वसनीयता और पठनीयता आदि को और करीब से सीखने और लिखने की कला में निखार आया। सुबोध का मानना है कि खबरें हमेशा प्रमाणिकता की कसौटी पर कसा होना चाहिए। सुनी सुनाई और कल्पना पर आधारित खबरें काफी घातक साबित हो सकती हैं, इसलिए खबरें तथ्यात्मक रूप से सही होनी चाहिए। खबरों के चयन में क्रॉस चेकिंग को सबसे महत्वपूर्ण कारक मानने वाले सुबोध का काम न सिर्फ पाठकों को केवल सूचना देने भर का है बल्कि उन्हें सही, सुरक्षित और ठोस जानकारी उपलब्ध कराना भी है।

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