सिंगल जज के फैसले को HC में चुनौती, केंद्र की अपील पर कोर्ट ने नोटिस जारी किया; क्या मामला

पीटीआई, नई दिल्ली
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केंद्र सरकार ने दिल्ली हाई कोर्ट के सिंगल जज के एक फैसले को चुनौती दी है। केंद्र के वकील ने कहा कि सिंगल जज का फैसला असिस्टेड रिप्रोडक्शन और सरोगेसी पर मौजूदा कानून के खिलाफ है। 

delhi high court

केंद्र सरकार ने दिल्ली हाई कोर्ट के सिंगल जज के एक फैसले को चुनौती दी है। केंद्र के वकील ने कहा कि सिंगल जज का फैसला असिस्टेड रिप्रोडक्शन और सरोगेसी पर मौजूदा कानून के खिलाफ है। केंद्र सरकार ने दिल्ली हाई कोर्ट में एक प्राइवेट अस्पताल को एक अविवाहित मृत व्यक्ति के फ्रोजन गेमेट्स (अंडे या शुक्राणु) उसके माता-पिता को देने के आदेश को चुनौती दी है।

दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस डी के उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की बेंच ने केंद्र की अपील पर माता-पिता को नोटिस जारी किया, जिसमें सिंगल जज के 2024 के फैसले को चुनौती दी गई थी। इस फैसले में कहा गया था कि अगर स्पर्म या अंडे के मालिक की सहमति साबित की जा सकती है तो मौत के बाद रिप्रोडक्शन (प्रजनन) पर कोई रोक नहीं है। 29 जनवरी को दिए गए अपने आदेश में बेंच ने अपील की सुनवाई के लिए 27 फरवरी की तारीख तय की।

सुनवाई के दौरान केंद्र के वकील ने कहा कि सिंगल जज का फैसला असिस्टेड रिप्रोडक्शन और सरोगेसी पर मौजूदा कानून के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि कानून में दादा-दादी को IVF और सरोगेसी के मकसद से कपल बनने की इजाजत नहीं है। कोर्ट के सवाल पर वकील ने यह भी बताया कि सिंगल जज के निर्देश के बावजूद मृतक के फ्रोजन गेमेट अभी तक उसके माता-पिता को नहीं दिए गए हैं। माता-पिता की तरफ से दायर अवमानना ​​याचिका भी हाई कोर्ट में पेंडिंग है। हाई कोर्ट ने केंद्र से अपील दायर करने में एक साल से ज्यादा की देरी के बारे में भी पूछा।

4 अक्टूबर 2024 को सिंगल जज ने गंगा राम हॉस्पिटल को मृतक के फ्रोजन गेमेट उसके माता-पिता को देने का निर्देश दिया था। जज का यह आदेश माता-पिता की याचिका पर आया था।

कोर्ट ने केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय से पूछा था कि क्या मरने के बाद रिप्रोडक्शन या पोस्ट-मॉर्टम रिप्रोडक्शन से जुड़े मुद्दों को सुलझाने के लिए किसी कानून, अधिनियम या गाइडलाइन की जरूरत है। पोस्टहुमस रिप्रोडक्शन (PR) का मतलब है, बायोलॉजिकल माता-पिता में से किसी एक या दोनों की मौत के बाद असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (ART) का इस्तेमाल करके बच्चा पैदा करने की प्रक्रिया।

याचिकाकर्ताओं के बेटे को कैंसर का पता चलने के बाद उसने 2020 में कीमोथेरेपी शुरू होने से पहले अपने सीमेन का सैंपल फ्रीज़ करवा लिया था, क्योंकि डॉक्टरों ने बताया था कि कैंसर के इलाज से बांझपन हो सकता है। इसलिए उसने जून 2020 में अस्पताल की IVF लैब में अपने स्पर्म को सुरक्षित रखने का फैसला किया।

सिंगल जज ने अपने फैसले में कहा कि स्पर्म का सैंपल एक प्रॉपर्टी या जायदाद है और किसी मरे हुए व्यक्ति के मामले में यह इंसान के शरीर या उसके अंगों की तरह ही व्यक्ति के बायोलॉजिकल मटीरियल का हिस्सा होता है।

सिंगल जज ने कहा था कि याचिकाकर्ताओं के बेटे ने अपने सीमेन सैंपल को सुरक्षित रखने की सहमति देते समय साफ तौर पर कहा था कि वह फर्टिलिटी बनाए रखने के लिए सीमेन फ्रीजिंग के लिए तैयार है। सिंगल जज ने फैसला सुनाया कि होने वाला बच्चा किसी पहचानी हुई सरोगेट मां के ज़रिए या किसी सहमति देने वाली महिला के साथ स्पर्म के फर्टिलाइज़ेशन से पैदा हो सकता है, जिसे याचिकाकर्ता IVF के जरिए पहचान सकते हैं।

Subodh Kumar Mishra

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Subodh Kumar Mishra

सुबोध कुमार मिश्रा पिछले 19 साल से हिंदी पत्रकारिता में योगदान दे रहे हैं। वर्तमान में वह 'लाइव हिन्दुस्तान' में स्टेट डेस्क पर बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। दूरदर्शन के 'डीडी न्यूज' से इंटर्नशिप करने वाले सुबोध ने पत्रकारिता की विधिवत शुरुआत 2007 में दैनिक जागरण अखबार से की। दैनिक जागरण के जम्मू एडीशन में बतौर ट्रेनी प्रवेश किया और सब एडिटर तक का पांच साल का सफर पूरा किया। इस दौरान जम्मू-कश्मीर को बहुत ही करीब से देखने और समझने का मौका मिला। दैनिक जागरण से आगे के सफर में कई अखबारों में काम किया। इनमें दिल्ली-एनसीआर से प्रकाशित होने वाली नेशनल दुनिया, नवोदय टाइम्स (पंजाब केसरी ग्रुप), अमर उजाला और हिन्दुस्तान जैसे हिंदी अखबार शामिल हैं। अखबारों के इस लंबे सफर में खबरों को पेश करने के तरीकों से पड़ने वाले प्रभावों को काफी बारीकी से समझने का मौका मिला।

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