
चुनाव बाद समझ आया कि...; राजनीति से संन्यास पर अवध ओझा, पीएम मोदी की भी तारीफ
हाल ही में राजनीति से संन्यास की घोषणा करने वाले अवध ओझा ने बताया है कि उन्हें चुनाव लड़ने के बाद समझ में आया कि वह इसके लिए ठीक नहीं हैं। 'आप' से नाता खत्म होने के बाद ओझा ने एक बार फिर पीएम मोदी की जमकर तारीफ की है।
सिर पर गमझे का मुरेठा बांधे हुए अपने खास अंदाज में कोचिंग पढ़ाने वाले अवध ओझा राजनीति के टेस्ट में खुद को अनफिट घोषित करते हुए बाहर निकल गए हैं। हाल ही में राजनीति से संन्यास की घोषणा करने वाले अवध ओझा ने बताया है कि उन्हें चुनाव लड़ने के बाद समझ में आया कि वह इसके लिए ठीक नहीं हैं। 'आप' से नाता खत्म होने के बाद ओझा ने एक बार फिर पीएम मोदी की जमकर तारीफ की है। उन्होंने कहा कि वह बहुत विजनरी और समझदार इंसान हैं।
दिल्ली में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले अरविंद केजरीवाल की पार्टी में शामिल होने वाले ओझा ने पटपड़गंज सीट से चुनाव लड़ा था। मनीष सिसोदिया की पुरानी सीट से चुनाव लड़े अवध ओझा को कड़ी मेहनत के बाद भी हार मिली थी। नतीजों की घोषणा के बाद से ही वह पार्टी के कामकाज से दूर होकर कोचिंग में सक्रिय हो गए थे। पिछले सप्ताह ही उन्होंने एक इंटरव्यू के दौरान राजनीति से संन्यास का ऐलान कर दिया था। अब एक पॉडकास्ट में संन्यास की वजहों को लेकर उन्होंने बात की।
ओझा से पूछा गया कि क्या वह अब भी 'आप' के हैं। ओझा ने इसका जवाब चुटीले अंदाज में देते हुए कहा, 'अब तो हमसे यह सवाल ज्यादा अच्छा होगा कि हम आपके हैं कौन?' जीवन में हमारे गुरु हैं परमहंस महराज जी को दोबारा जन्म लेना पड़ा क्योंकि उनकी दो इच्छाएं शेष रह गईं थीं। एक गांजा पीने की और दूसरी शादी करने की। ऐसे ही मेरी बहुत अत्कंठा थी राजनीति करने की, चुनाव लड़ने की। चुनाव लड़े पटपड़गंज की जनता का बहुत सम्मान मिला। दूसरे नंबर पर रहे। लेकिन चुनाव लड़ने के बाद मुझे अहसास हुआ कि मुझे राजनीति नहीं करनी चाहिए, इसलिए मैंने संन्यास ले लिया।
ओझा ने अपनी बात समझाने के लिए कुछ उदाहरण दिए और कहा कि यह डिमोटिवेशन की बात नहीं है, समझ की बात है। जैसे आपको कोई बात समझ आ जाए, शाहरुख खान गाना गाने गए थे, उसने पता चला कि वह एक्टिंग बहुत अच्छी कर सकते हैं। मैं जब चेस खेलता हूं तो सारी चालें दिमाग से गायब हो जाती हैं जब मैं देखता हूं तो एक से एक चालें आती हैं। तो मैंने कहा कि खिलवाओ बिठाके, खेलो नहीं। यह सच है कि राजनीति से संन्यास। चाणक्य का नाम चंद्रगुप्त से ज्यादा है। अगर कोई चीज हमें समझ आ जाए कि बॉस इस काम को मत कर, इच्छा थी वह पूरी हो गई और समझ भी आया।
ओझा ने कहा कि चुनाव के दौरान एक शख्स ने उन्हें सबके पैर छूने की सलाह दी। ओझा ने कहा कि वह भले 400 चुनाव हार जाएं लेकिन पैर नहीं छुएंगे। पैर नहीं छू सकते वोट के लिए। पैर छूना है मां-बाप, गुरु का, हमारे जो सम्मानीय लोग हैं जिन्होंने हमारे जीवन को बदला है। ओझा ने कहा कि चुनाव के दौरान यदि पीएम मोदी ने उनके प्रतिद्वंद्वी रवि नेगी के पैर नहीं छुए होते तो उन्हें और बेहतर वोट मिला होता। क्या वह भाजपा में भी जा सकते हैं? इसके जवाब में ओझा ने कहा कि मैं कुछ काम बहुत अच्छा कर सकता हूं जिसमें 25 वर्ष का अनुभव है। मैं लड़कों को बहुत अच्छी दिशा दे सकता हूं, मैं समाज को दिशा दे सकता हूं, गीता पढ़ा रहा हूं। अमिताभ बच्चन ने राजनीति की बाद में निकल गए, बहुत से लोगों को समझ में आया कि यह फील्ड उनके लिए नहीं है। सबकुछ ज्ञान होते हुए भी चुनाव क्यों लड़े इस पर ओझा ने कहा, 'इच्छा काया, इच्छा माया, इच्छा जग उपजाया, मानों नहीं लड़े होते तो इच्छा दबी रह जाती कि चुनाव नहीं लड़े।'
पॉडकास्ट के दौरान एक सवाल के जवाब में ओझा ने पीएम मोदी की तारीफ भी की। उन्होंने कहा कि शिक्षा का मुख्य उद्देश्य है समझ देना, मुलायम सिंह यादव कौन से दून स्कूल से पढ़े, लालू यादव, सबको छोड़ो हमारे प्रधानमंत्री, उनकी डिग्री लोग मानते हैं मुझे आश्चर्य होता है उस आदमी ने साबित कर दिया तीन बार प्रधानमंत्री बनकर। डिग्री देने की जरूरत है, मांगने की क्या जरूरत है। भारत जैसे देश जहां कई डायनेस्टी है वहां उस व्यक्ति ने अपना वजूद पैदा किया। मोदी जी के व्यक्ति का मैं... राजनीति में वैचारिक मतभेद है, पर्सनल नहीं। लालू जी ने अपने बेटे की शादी में मोदी जी को गेस्ट बुलाया था। व्यक्ति की तो तारीफ है ही।
मोदी जी में आपको क्या अच्छा लगता है, इस सवाल के जवाब में ओझा ने कहा, 'मोदी का विजन और समझ, इतने सारे नेता हैं। बाद में चाहे जो गमझा पहनकर गए हो, गमझा हिलाया नहीं किसी ने। किसी की भावनाओं को उत्तेजित करना। मखाने की माला पहन लेना। अगर आप तालाब में कूदे हं तो तालाब में कूदने से बिहारी सेंटिमेंट से क्या लेना देना। राहुल जी तालाब में कूद गए। आप जब स्टेप लेते हैं तो उसकी समीक्षा होती है। एक तरफ राहुल जी ने स्टेप लिया दूसरी तरफ मोदी जी ने। लेकिन दोनों के स्टेप में बहुत अंतर है। बिहारी, भोजपुरी जाकर बोले।'





