मुझे शक है, आपका मुद्दा क्या है; अदालत में केजरीवाल और जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के बीच की पूरी बहस

Sudhir Jha हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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आबकारी नीति घोटाला मामले में अरविंद केजरीवाल (खुद वकील बन) की ओर से उठाए गए सवालों और न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा की तीखी टिप्पणियों के बीच अदालत में सोमवार को जोरदार बहस देखने को मिली।

आबकारी नीति घोटाला मामले में अरविंद केजरीवाल (खुद वकील बन) की ओर से उठाए गए सवालों और न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा की तीखी टिप्पणियों के बीच अदालत में सोमवार को जोरदार बहस देखने को मिली। बहस सिर्फ कानूनी बिंदुओं तक सीमित नहीं रही, बल्कि फैसलों के तरीके, समय और परिस्थितियों पर भी सवाल-जवाब हुए। इस दौरान केजरीवाल और सीबीआई ने भी मजबूती से अपना पक्ष रखा। कोर्टरूम से पेश है हेमलता कौशिक की रिपोर्ट...

केजरीवाल: न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा की पीठ ने सीबीआई के मामले के लंबित रहने के दौरान जमानत याचिका व गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज करते हुए ऐसी टिप्पणी की जिससे लग रहा था वह दोषी हैं। जिसे उच्चतम न्यायालय ने पलट दिया था।

न्यायमूर्ति का मौखिक जवाब: आपका मुद्दा क्या है? हाईकोर्ट द्वारा जमानत याचिका व गिरफ्तारी पर रोक ना लगाने के फैसले के बाद निचली अदालत ने सही सुनवाई की। बहरहाल मामला दूसरी अदालत में भेजने का चल रहा है। इस पर पक्ष रखें।

केजरीवाल: न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा की पीठ सांसद व विधायकों के मामले की सुनवाई करती है। लंबी-लंबी तारीखें दी जाती हैं। लेकिन हमारे मामले में दो से तीन तारीखों में जल्दबाजी में बगैर ठोस तथ्यों के फैसला सुना दिया जाता है। 9 मार्च का आदेश भी आशंका पैदा करता है।

न्यायमूर्ति शर्मा ने पूछा: तो क्या आप राजनीतिक पक्षपात का इशारा कर रहे हैं। एक मामले में तीन महीने का समय दिया गया था। एक अन्य मामले में, 6 महीने का समय दिया गया। उन्होंने कहा कि मामले की गंभीरता से तारीखें तय होती हैं।

केजरीवाल: संघ के अधिवक्ता परिषद के कार्यक्रम में न्यायमूर्ति शर्मा चार बार शामिल हुईं। हम उस विचारधारा के पूरी तरह खिलाफ हैं। ऐसे में वाजिब पक्षपात का शक पैदा होता है।

न्यायमूर्ति शर्मा ने मौखिक जवाब में कहा: जब वह उस कार्यक्रम में गईं तो क्या उन्होंने कोई राजनीतिक बयान दिया या कोई वैचारिक बयान दिया, या फिर वह एक कानूनी कार्यक्रम था। यह सिर्फ वकीलों का कार्यक्रम था।

केजरीवाल: गृह मंत्री अमित शाह ने कार्यक्रम में कहा है कि आप प्रमुख को हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ उच्चतम न्यायालय जाना होगा। इससे प्रमाणित होता है कि हाईकोर्ट से क्या फैसला आने वाला है।

न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा : वह या आप जो कुछ भी कहते हैं, उस पर अदालत का क्या नियंत्रण है।

केजरीवाल: 9 मार्च को सीबीआई की याचिका की सुनवाई की पहली तारीख पर ही न्यायमूर्ति शर्मा ने सत्र अदालत के आदेश पर आंशिक रोक लगाई थी। पहली नजर में यह पाया कि सत्र अदालत की कुछ टिप्पणियां गलत थीं, जबकि उन्होंने दूसरे पक्ष की बात सुनी भी नहीं थी। केजरीवाल ने कहा कि यह एक असाधारण कदम था, जिससे उनके मन में पक्षपात का एक वाजिब शक पैदा हो गया। इसलिए मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखा।

●एसजी तुषार मेहता: 9 मार्च के आदेश का जिक्र करते हुए मेहता ने इस बात को खारिज कर दिया कि यह एकतरफा था या इससे कोई नुकसान हुआ। उन्होंने कहा कि नोटिस सही तरीके से जारी किया गया था। आरोपी का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील के जरिए सर्विस हाईकोर्ट के नियमों के तहत कानूनी तौर पर मान्य थी। उन्होंने बताया कि जिन वकीलों को नोटिस दिया गया था, वे आज भी पेश हो रहे हैं।

●केजरीवाल: सीबीआई का मामला पूरी तरह से सरकारी गवाहों पर था। छापेमारी में कुछ भी बरामद हुआ था। निचली अदालत ने माना है कि गोवा कोई पैसा नहीं गया फिर भी उच्च न्यायालय की पीठ ने वर्ष 2024 में ऐसा फैसला दिया जैसे केजरीवाल महाभ्रष्ट है।

●एसजी तुषार मेहता: अभी इसी छापेमारी व बरामदगी को लेकर प्रवर्तन निदेशालय(ईडी) का मामला लंबित है। इसलिए इस तरह के आरोपों को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता।

●केजरीवाल: पीठ ने प्रवर्तन निदेशालय के खिलाफ टिप्पणी पर रोक लगाई। जबकि सीबीआई के मामले का ईडी से लेना-देना नहीं था। ईडी की तरफ से कोई लिखित आग्रह नहीं किया गया था। फिर भी ईडी के पक्ष में आदेश दिया गया।

●एसजी तुषार मेहता: हाईकोर्ट ने धनशाोधन रोकथाम अधिनियम के तहत दर्ज मामले पर रोक नहीं लगाई है, बल्कि उन्हें सिर्फ़ टाल दिया है। उन्होंने तर्क दिया कि धनशोधन की कार्यवाही अपराध पर निर्भर करती है। अगर आरोपमुक्त आदेश को चुनौती नही दी जाती तो इसका असर ईडी के मामले की सुनवाई पर पड़ता।

●केजरीवाल: सीबीआई के जांच अधिकारी के खिलाफ निचली अदालत की टिप्पणी पर रोक लगाने का जिक्र किया। केजरीवाल ने कहा कि यहां सीबीआई को कटघरे में खड़ा नहीं किया गया था बल्कि जांच अधिकारी पर सवाल थे। फिर भी सीबीआई हाईकोर्ट आई। जांच अधिकारी की तरफ से कोई याचिका दायर नहीं की गई।

●एसजी तुषार मेहता: किसी भी आपराधिक मामले में जिम्मेदारी किसी एक व्यक्ति विशेष की नहीं होती, बल्कि यह भार पूरे विभाग पर होता है। सीबीबाई का आरोपपत्र खारिज होने का आधार महज जांच अधिकारी नहीं था। इसलिए सीबीआई कोमामले में अपने जांच अधिकारी पर की गई टिप्पणी पर रोक की अपील का आधार था।

●केजरीवाल: उच्चतम न्यायालय ने एक फैसले में कहा था कि आमतौर पर किसी भी आरोपमुक्त आदेश पर रोक नहीं लगाई जानी चाहिए। फिर भी हमारी सुनवाई किए बगैर आदेश के एक हिस्से पर रोक लगा दी गई।

●एसजी तुषार मेहता: सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला मामले विशेष को लेकर था। यहा आरोपमुक्त आदेश पर रोक सुनवाई के लिहाज से लगाई गई है। इस रोक में कहीं भी यह नहीं कहा गया कि निचली अदालत में सुनवाई जारी रहेगी। बस कुछ आदेशों के कार्यान्वयन पर रोक लगाई गई, जिसका कुछ विपरीत प्रभाव पड़ सकता था।

●केजरीवाल: निचली अदालत द्वारा आरोपमुक्त का फैसला सुनाए जाने के चार घंटे के भीतर सीबीआई की निचली अदालत के फैसले के खिलाफ अपील को स्वीकार कर लिया। जबकि यह फैसला बहुत बड़ा था। इससे चार हजार दस्तावेज जुड़े थे। यह पक्षपात की शंका पैदा करता है।

सीबीआई ने किया विरोध

सीबीआई ने कहा कि इस तरह तो हर वादी-प्रतिवादी को यह अधिकार प्राप्त हो जाएगा कि वह जज पर गलत इल्जाम लगाए और दूसरी अदालत बदलवा ले। तुषार मेहता ने कहा कि इससे यह मिसाल बनेगी। सवाल यह नहीं है कि न्यायाधीश इस मामले की सुनवाई कर सकती हैं या नहीं, बल्कि यह है कि अगर इस आधार पर जज खुद को अलग करने लगें तो क्या कोई भी जज इन मामलों की सुनवाई कर पाएगा।

क्या है मामला

27 फरवरी 2026 को निचली अदालत ने अरविंद केजरीवाल सहित 23 को आबकारी नीति घोटाला मामले से आरोपमुक्त कर दिया था। 9 मार्च 2026 को न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा ने सीबीआई की याचिका पर केजरीवाल सहित 23 लोगों को नोटिस जारी किया था। वहीं केजरीवाल व अन्य ने इस मामले को न्यायमूर्ति शर्मा की पीठ से दूसरी पीठ के समक्ष स्थानान्तरित करने की याचिका दायर की थी।

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सुधीर झा | वरिष्ठ पत्रकार और स्टेट टीम लीड
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