
अरावली की नई परिभाषा इसे टुकड़ों में बांट देगी? कांग्रेस नेता ने पर्यावरण मंत्री से पूछे ये 4 सवाल
अरावली पर्वत श्रृंखला की नई परिभाषा को लेकर जारी सियासी घमासान के बीच कांग्रेस केंद्र की मोदी सरकार पर लगातार हमलावर बनी है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने रविवार को पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव को लेटर लिखकर उनसे 4 सवाल पूछे हैं।
अरावली पर्वत श्रृंखला की नई परिभाषा को लेकर जारी सियासी घमासान के बीच कांग्रेस केंद्र की मोदी सरकार पर लगातार हमलावर बनी है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने रविवार को पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव को लेटर लिखकर उनसे 4 सवाल पूछे हैं। रमेश ने दावा किया कि इस कदम से अरावली सहित कई छोटी पहाड़ियां और अन्य भू-आकृतियां नष्ट हो जाएंगी।
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने भूपेंद्र यादव को लिखे लेटर में कहा कि अरावली पहाड़ियों की नई परिभाषा को लेकर व्यापक चिंताएं होना स्वाभाविक है, क्योंकि इसके तहत इन्हें 100 मीटर या उससे अधिक की ऊंचाई वाले भू-आकृतियों तक सीमित कर दिया गया है।

ये 4 सवाल पूछे
उन्होंने इस लेटर में पर्यावरण मंत्री से अपने 4 खास सवाल पूछने की अनुमति मांगी है।
1. ‘‘पहला प्रश्न- क्या यह सच नहीं है कि राजस्थान में 2012 से अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं की परिभाषा 28 अगस्त 2010 की भारतीय वन सर्वेक्षण की रिपोर्ट पर आधारित रही है, जिसमें निम्नलिखित बातें कही गई हैं: सभी इलाके जिनका ढलान तीन डिग्री या उससे अधिक है, उन्हें पहाड़ियों के रूप में निरूपित किया जाएगा।’’
रमेश ने कहा, ‘‘इसके साथ ही ढलान की दिशा में एक समान 100 मीटर चौड़ा बफर जोड़ा जाएगा, ताकि 20 मीटर ऊंचाई की पहाड़ी के अनुरूप संभावित विस्तार को ध्यान में रखा जा सके, जो 20 मीटर के ‘कंटूर इंटरवल’ (समोच्च अंतराल) के बराबर है। इन पहचाने गए क्षेत्रों के अंदर आने वाले समतल क्षेत्र, पठार, गड्ढे और घाटियों को भी पहाड़ियों का हिस्सा माना जाएगा।”
2. उन्होंने दूसरा सवाल किया कि क्या यह सच नहीं है कि भारतीय वन सर्वेक्षण ने 20 सितंबर 2025 को पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को भेजे गए अपने एक पत्र में यह कहा था- ‘‘अरावली की छोटी पहाड़ी संरचनाएं मरुस्थलीकरण के खिलाफ प्राकृतिक अवरोध के रूप में काम करती हैं, क्योंकि वे भारी रेत कणों को रोकती हैं-इस प्रकार दिल्ली और आसपास के मैदानी इलाको को रेत के तूफानों से बचाती हैं।’’
रमेश ने कहा, ‘‘चूंकि हवा के साथ उड़ने वाली रेत के विरुद्ध किसी अवरोध की सुरक्षा क्षमता सीधे उसकी ऊंचाई के अनुपात में बढ़ती है, इसलिए 10 से 30 मीटर ऊंचाई वाली मामूली पहाड़ियां भी मजबूत प्राकृतिक हवा अवरोधकों के रूप में काम करती हैं।’’
3. उन्होंने कहा, ‘‘तीसरा सवाल- क्या यह सच नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित केंद्रीय अधिकार प्राप्त कमेटी (सीईसी) ने अपनी 7 नवंबर 2025 की रिपोर्ट में यह निष्कर्ष निकाला था कि राजस्थान में 164 खनन पट्टे उस समय प्रचलित भारतीय वन सर्वेक्षण की परिभाषा के अनुसार अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं के अंदर स्थित थीं?’’
4. रमेश ने कहा, ‘‘चौथा सवाल-क्या यह सच नहीं है कि इस नई परिभाषा से कई छोटी पहाड़ियां और अन्य भू-आकृतियां नष्ट हो जाएंगी और चार राज्यों में फैली पूरी अरावली पहाड़ियों एवं पर्वतमालाओं की भौगोलिक और पारिस्थितिक अखंडता टूटकर खत्म हो जाएगी?’’
विपक्षी कांग्रेस का दावा है कि अरावली पर्वतमाला की नई परिभाषा के तहत 90 प्रतिशत से अधिक भाग संरक्षित नहीं रहेगा और खनन एवं अन्य गतिविधियों के लिए खुल जाएगा। इस मुद्दे पर विवाद के बाद केंद्र ने राज्यों को निर्देश जारी कर पर्वत शृंखला के भीतर नए खनन पट्टे देने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने को कहा है।
अरावली पहाड़ी परिभाषा विवाद: SC में कल होगी सुनवाई
बता दें कि, अरावली पहाड़ियों की परिभाषा को लेकर उठे विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर स्वतः संज्ञान लिया है और वह सोमवार को मामले की सुनवाई करेगा।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली अवकाशकालीन बेंच इस मामले की सुनवाई करेगी जिसमें जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह शामिल हैं।
क्या है विवाद
सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर को अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं की एक समान परिभाषा को स्वीकार करते हुए, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में फैले अरावली क्षेत्रों में विशेषज्ञों की रिपोर्ट आने तक नए खनन पट्टों के आवंटन पर रोक लगा दी थी।
कोर्ट ने पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की एक समिति की सिफारिशों को स्वीकार किया था। समिति के अनुसार, ‘‘अरावली पहाड़ी’’ को उन चिह्नित अरावली जिलों में मौजूद किसी भी भू-आकृति के रूप में परिभाषित किया जाएगा, जिसकी ऊंचाई स्थानीय निचले बिंदु से 100 मीटर या उससे अधिक हो। वहीं, ‘‘अरावली पर्वतमाला’’ एक-दूसरे से 500 मीटर के भीतर दो या अधिक ऐसी पहाड़ियों का समूह होगा।





