
आज के दिन दिल्ली की गद्दी पर बैठा अलाउद्दीन खिलजी, अपने चाचा का कत्ल कर हासिल की सत्ता
इतिहास के सबसे क्रूर शासकों में से एक अलाउद्दीन खिलजी आज ही के दिन, यानी 21 अक्टूबर 1296 को अपने चाचा जलालुद्दीन खिलजी की धोखे से हत्या करके दिल्ली की गद्दी पर बैठा था।
दिल्ली पर कई शासकों ने राज किया है। इनमें से एक था अलाउद्दीन खिलजी। खिलजी इतिहास के सबसे क्रूर शासकों में से एक था। आज के ही दिन वो दिल्ली की गद्दी पर बैठा था। तारीख थी 21 अक्टूबर 1296.. यानी 729 साल पहले। उसकी कहानी सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि रणनीतिक चालों और खूनी साजिशों से भरी है। ये ऐसी कहानी है जहां एक भतीजे ने चाचा का तख्ता पलट दिया और खुद सुल्तान बन गया।

धोखे और विश्वासघात से रची सत्ता की कहानी
अलाउद्दीन खिलजी मूल रूप से खिलजी वंश के संस्थापक जलालुद्दीन खिलजी के भतीजे और दामाद थे। जलालुद्दीन ने 1290 में दिल्ली सल्तनत में खिलजी राजवंश की नींव रखी थी, लेकिन अलाउद्दीन की नजरें ऊंची थीं। उन्होंने अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए 1296 में देवगिरी (आज का महाराष्ट्र क्षेत्र) पर धावा बोला, जहां यादव राजा रामचंद्र को हराकर भारी धन-दौलत लूटा। यहीं से लक्ष्य दिल्ली जीतना हो गया।
देवगिरी से लौटते हुए, अलाउद्दीन ने एक योजना बनाई। उन्होंने जलालुद्दीन को मिलने का बहाना बनाया और गंगा नदी के किनारे करा (आज का प्रयागराज क्षेत्र) में उनकी हत्या कर दी। इस घटना के बाद, उसने खुद को सुल्तान घोषित कर दिया और 21 अक्टूबर 1296 को दिल्ली पहुंचकर औपचारिक रूप से गद्दी संभाली। यह तख्तापलट इतना तेज था कि विरोधियों को संभलने का मौका ही नहीं मिला और अलाउद्दीन ने जलालुद्दीन के परिवार के सदस्यों को भी खत्म कर अपनी पकड़ मजबूत की।
कई युद्धों को जीता
अलाउद्दीन ने पूरे शासन काल में कई युद्ध लड़े। क्रूरता और युद्धों के दमपर उसने खिलजी सल्तनत का विस्तार किया। गद्दी संभालते ही उन्सने मंगोल आक्रमणों का सामना किया। 1297 से 1307 तक कई मंगोल हमलों को उन्होंने कुचल दिया, जिसमें चंगेज खान के वंशजों की सेनाओं को दिल्ली की सीमाओं से दूर रखा। इन युद्धों ने उसे 'मंगोल-विजेता' का खिताब दिलाया।
1299 में गुजरात पर कब्जा किया, जहां वाघेला राजा करण को हराकर सोमनाथ मंदिर से लूट लाया। फिर 1301 में रणथंबोर का घेरा डाला, जहां राजपूत राजा हमीर देव ने बहादुरी दिखाई लेकिन अंततः हार गए। 1303 का चित्तौड़ अभियान प्रसिद्ध है, जहां राणा रतन सिंह की सेना को पराजित किया। दक्षिण की ओर मुड़ते हुए, उनके विश्वसनीय सेनापति मलिक काफूर ने 1307-1311 के बीच देवगिरी, वारंगल (काकतीय राजवंश) और होयसल साम्राज्य पर हमले किए, जिससे दिल्ली में अपार धन आया।





