‘पावर और अधिकार का दुरुपयोग’: दिल्ली कोर्ट ने IPS अफसर की अग्रिम जमानत याचिका कर दी खारिज
दिल्ली की द्वारका कोर्ट ने आईपीएस अफसर शंकर चौधरी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी। यह याचिका उनके खिलाफ दिल्ली में 2023 के नारकोटिक्स ऑपरेशन के दौरान बिना इजाजत छापेमारी और संदिग्धों को गैर-कानूनी ढंग से हिरासत में लेने के आरोप में दर्ज आपराधिक मुकदमे के सिलसिले में दायर की गई थी।

राजधानी दिल्ली में 2023 के कथित अवैध नारकोटिक्स छापेमारी मामले में द्वारका कोर्ट ने मिजोरम में तैनात रहे एसपी (नारकोटिक्स) और द्वारका के पूर्व डीसीपी शंकर चौधरी की अग्रिम जमानत याचिका शनिवार को खारिज कर दी। शंकर चौधरी 2011 बैच के आईपीएस अफसर हैं। स्पेशल जज (एनडीपीएस) मनु गोयल खरब की अदालत ने कहा कि यह मामला एक आईपीएस अफसर द्वारा पावर और अधिकार के दुरुपयोग का क्लासिक उदाहरण है, जो कानूनी प्रक्रिया को भलीभांति जानता था और लॉ एनफोर्समेंट मशीनरी का अंदरूनी आदमी था। एफआईआर के अनुसार, 21 से 29 नवंबर 2023 के बीच बिना वैधानिक अनुमति छापेमारी, तलाशी और जब्ती की गई। एडिशनल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर विजेंद्र खरब ने शंकर चौधरी की अग्रिम जमानत याचिका का विरोध किया था।
एचटी की रिपोर्ट के अनुसार जज ने कहा, ''आईपीएस रैंक के व्यक्ति से अपनी ड्यूटी करते समय अनुशासन बनाए रखने, पब्लिक सर्विस में ईमानदारी, ऊंचे नैतिक मानकों की उम्मीद की जाती है, लेकिन वह पारदर्शिता और जवाबदेही बनाए रखने में नाकाम रहा और उसने पूरी तरह से गलत ढंग से काम किया।”
जून 2022 तक दिल्ली के द्वारका में डीसीपी रहे
शंकर चौधरी नारकोटिक्स छापेमारी के समय मिजोरम पुलिस में एसपी (नारकोटिक्स) के पद पर तैनात थे। इससे पहले वे जून 2022 तक दिल्ली में डीसीपी (द्वारका) के पद पर तैनात रहे थे। हालांकि, एक रात पार्टी में हुए झगड़े में शामिल होने के आरोपों के बाद उन्हें डीसीपी पद से हटा दिया गया था। इसके बाद चौधरी का ट्रांसफर मिजोरम में कर दिया गया।
शंकर चौधरी पर क्या हैं आरोप
दिल्ली पुलिस ने 5 फरवरी को विजिलेंस जांच के बाद जो एफआईआर दर्ज की, उसके मुताबिक शंकर चौधरी ने “मिजोरम सरकार से बिना किसी लिखित इजाजत या दिल्ली पुलिस हेडक्वार्टर को कोई जानकारी दिए बिना 21 से 29 नवंबर 2023 के बीच डाबरी-बिंदापुर इलाके में खुद छापेमारी की थी।”
एफआईआर में शंकर चौधरी पर 26 नवंबर को एक नाइजीरियन नागरिक के घर में घुसने और एक लॉकर और दो बैग लेकर बाहर निकलने का भी आरोप है। डॉक्यूमेंट में कहा गया है कि कोई सीजर मेमो, इन्वेंट्री लिस्ट या पंचनामा तैयार नहीं किया गया था। इसके साथ ही मिजोरम पुलिस और मिजोरम सरकार की ओर से इस घटना पर गृह मंत्रालय को एक रिपोर्ट भेजी गई थी, जिसमें प्रक्रिया में गंभीर चूक और अधिकारी द्वारा पावर के गलत इस्तेमाल और बिना इजाजत काम करने का जिक्र किया गया था।
कोर्ट ने सीसीटीवी फुटेज का किया जिक्र
स्पेशल कोर्ट ने अपने आदेश में उस सीसीटीवी फुटेज का भी जिक्र किया, जिसमें शंकर चौधरी दिल्ली पुलिस कर्मियों संग हिरासत में लिए गए एक व्यक्ति के घर में घुसते और उसे 72 घंटे से अधिक समय तक हिरासत में रखते हुए और बिना सीजर मेमो तैयार किए केस प्रॉपर्टी जब्त करते हुए दिखे थे। जज ने कहा कि मिजोरम सरकार की जांच से पता चला है कि वह छुट्टी पर मिजोरम से दिल्ली आए थे, जो 20 नवंबर को खत्म हो गई थी और उन्होंने बिना इजाजत दिल्ली में ही रहकर मिजोरम की एंटी-नारकोटिक्स टीम को लीड किया। कोर्ट ने कहा कि छापेमारी के दौरान कई चीजें जब्त की गईं, जिनमें डॉक्यूमेंट्स, नकली करेंसी नोट और मोबाइल फोन शामिल थे। कोर्ट ने यह भी कहा कि चौधरी पर यह भी आरोप है कि उन्होंने तीन सह-आरोपियों के बयानों को मुख्य सरगना से जोड़ने के लिए उनके साथ छेड़छाड़ की थी।
सबूतों से छेड़छाड़ कर सकते हैं आवेदक
कोर्ट ने कहा, “मिजोरम सरकार की रिपोर्ट में कहा गया है कि आवेदक की झूठे और बनावटी दस्तावेज बनाने के अपराधों की भी जांच होनी चाहिए। आवेदक द्वारा किया गया अपराध ऐसा है, जो न्याय व्यवस्था की ईमानदारी को कमजोर करता है, जनता का भरोसा कम करता है और पुलिस की छवि को खराब करता है।”
कोर्ट ने कहा कि इस बात की संभावना है कि अगर अग्रिम जमानत दी जाती है तो हाई-रैंकिंग पुलिस अधिकारी सबूतों से छेड़छाड़ और गवाहों को प्रभावित कर सकता है।
शंकर चौधरी के वकील की क्या दलील
आईपीएस अफसर शंकर चौधरी की तरफ से पेश हुए वकील अंकित भूषण ने सुनवाई के दौरान दलील दी कि स्वतंत्र गवाहों या छापेमारी टीम के सदस्यों के बयान अधिकारी के किसी गलत काम की तरफ इशारा नहीं करते। वकील ने यह भी कहा कि सीसीटीवी फुटेज में पुलिस अधिकारी बरामदगी का बैग पकड़े हुए नहीं, बल्कि हिरासत में लिए गए लोगों में से एक को पकड़े हुए दिखा।
शंकर चौधरी से उनका पक्ष जानने के लिए संपर्क नहीं हो सका। उन्होंने अपनी याचिका में खुद पर लगे आरोपों से इनकार किया था और इस बात पर जोर दिया था कि प्रॉसिक्यूशन के पास मिजोरम पुलिस एक्ट के तहत उन पर केस चलाने के लिए जरूरी मंजूरी नहीं थी।



