Explainer: शी जिनपिंग 7 साल बाद भारत आए, मगर ये 2019 वाला भारत नहीं; चीन भी कितना बदल गया!
शी जिनपिंग 7 साल बाद दिल्ली लौटे हैं। 2019 के बाद गलवान, सीमा तनाव, सैन्य समझौते और बदलती वैश्विक राजनीति ने भारत-चीन रिश्तों को बदल दिया। जानिए 2026 में दोनों देशों के संबंध 2019 से कितने अलग हैं और शी की भारत यात्रा क्यों अहम है।

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग सात साल बाद भारत आए हैं। यह सिर्फ एक हाई-प्रोफाइल कूटनीतिक दौरा नहीं है, बल्कि भारत और चीन के रिश्तों में आए बड़े बदलाव की तस्वीर भी है। 2019 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग मामल्लापुरम में मिले थे, तब दोनों देश सीमा विवाद के बावजूद रिश्तों को संभालने और सहयोग बढ़ाने की कोशिश कर रहे थे। आज हालात काफी अलग हैं।
शी जिनपिंग 12-13 सितंबर को होने वाले 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए दिल्ली पहुंचे हैं। ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि वे सात साल बाद भारत क्यों आए हैं, बल्कि यह भी है कि 2019 वाले भारत-चीन और 2026 वाले भारत-चीन के बीच आखिर कितना बदलाव आ चुका है।
2019 में भी मतभेद थे, लेकिन रिश्ते संभालने की कोशिश जारी थी
भारत और चीन के रिश्ते 2019 में भी पूरी तरह सामान्य नहीं थे। 2017 में डोकलाम में दोनों देशों के बीच सैन्य तनाव हो चुका था और सीमा विवाद का समाधान नहीं हुआ था।
इसके बावजूद दोनों देशों के बीच एक राजनीतिक समझ थी कि सीमा विवाद को पूरे रिश्ते को प्रभावित करने की वजह नहीं बनने दिया जाना चाहिए। इसी माहौल में प्रधानमंत्री मोदी और शी जिनपिंग के बीच 2018 में वुहान और 2019 में मामल्लापुरम में अनौपचारिक शिखर बैठकें हुई थीं।
2019 में मामल्लापुरम बैठक के बाद विदेश मंत्रालय ने कहा था कि दोनों नेताओं ने वुहान की समझ को दोहराया है। दोनों का मानना था कि भारत और चीन अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में स्थिरता के कारक हैं और मतभेदों को विवाद में बदलने से रोकना चाहिए।
दोनों देशों ने नियम आधारित और समावेशी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के महत्व पर भी सहमति जताई थी। यानी उस समय रिश्ते का फॉर्मूला था- प्रतिस्पर्धा भी और सहयोग भी। सीमा, व्यापार असंतुलन, पाकिस्तान और चीन की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं को लेकर मतभेद थे, लेकिन इसके साथ ही आर्थिक संबंध और उच्चस्तरीय राजनीतिक संपर्क भी जारी थे।
गलवान ने बदल दी रिश्तों की पूरी तस्वीर
2020 में हालात पूरी तरह बदल गए। भारत सरकार के मुताबिक, उस साल अप्रैल-मई में पश्चिमी क्षेत्र में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर चीन की गतिविधियों का उद्देश्य यथास्थिति को एकतरफा तरीके से बदलना था। भारत ने इसका सैन्य और कूटनीतिक जवाब दिया। जून 2020 में गलवान घाटी में हुई झड़प में 20 भारतीय सैनिक और कई चीनी सैनिक मारे गए। 1975 के बाद यह दोनों देशों के बीच पहली घातक सैन्य झड़प थी। इसका असर सिर्फ सीमा तक सीमित नहीं रहा।
भारत ने:
- चीनी निवेश पर निगरानी बढ़ाई
- चीनी कंपनियों की जांच सख्त की
- कई चीनी ऐप्स पर प्रतिबंध लगाया
- सीधी उड़ानों और लोगों के बीच संपर्क के कई माध्यमों में व्यवधान देखा
नई दिल्ली का संदेश भी स्पष्ट था- सीमा विवाद को रिश्ते के एक अलग हिस्से की तरह नहीं देखा जा सकता, जबकि बाकी क्षेत्रों में सामान्य रूप से आगे बढ़ा जाए। यहीं से रिश्तों का मूल समीकरण बदल गया।
गलवान से पहले यह धारणा थी कि सीमा विवाद अनसुलझा होने के बावजूद आर्थिक और राजनीतिक संबंध जारी रखे जा सकते हैं। गलवान के बाद सीमा ही पूरे रिश्ते की परीक्षा बन गई।
रिश्तों में सुधार की शुरुआत कैसे हुई?
भारत और चीन के बीच तनाव अचानक खत्म नहीं हुआ। कई वर्षों तक सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर बातचीत चलती रही। विदेश मंत्रालय के मुताबिक, 2020 के बाद दोनों देशों ने वर्किंग मैकेनिज्म फॉर कंसल्टेशन एंड कोऑर्डिनेशन के जरिए कई बैठकें कीं। सैन्य कमांडर स्तर की बातचीत भी जारी रही।
इस प्रक्रिया में अक्टूबर 2024 एक अहम मोड़ साबित हुआ। भारत और चीन ने देपसांग और डेमचोक में गश्त की व्यवस्था को लेकर समझौता किया। भारत सरकार के मुताबिक, इसके बाद 2020 में बने सभी घर्षण बिंदुओं से सैनिकों की वापसी हुई और पुरानी व्यवस्थाओं के अनुसार गश्त तथा जहां लागू हो, चराई फिर शुरू हुई। इससे दोनों देशों के बीच राजनीतिक बातचीत का रास्ता खुला।
मोदी-शी की मुलाकातों से बढ़ा ‘पॉजिटिव मोमेंटम’
अक्टूबर 2024 में कजान में हुए ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग की करीब पांच साल बाद प्रतिनिधिमंडल स्तर की पहली द्विपक्षीय बैठक हुई। विदेश मंत्रालय के अनुसार, दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय रिश्तों को स्थिर करने और फिर से मजबूत बनाने के लिए बातचीत के मौजूदा माध्यमों के इस्तेमाल के महत्व पर सहमति जताई।
इसके बाद अगस्त 2025 में तियानजिन में शंघाई सहयोग संगठन के सम्मेलन के दौरान भी मोदी और शी की मुलाकात हुई। विदेश मंत्रालय ने कहा था कि दोनों नेताओं ने रिश्तों में आए “सकारात्मक मोमेंटम” का स्वागत किया। इसलिए 2026 में शी जिनपिंग की दिल्ली यात्रा रिश्तों में सुधार की शुरुआत नहीं है। यह उस सुधार प्रक्रिया का अगला चरण है, जो सीमा पर सैन्य तनाव कम होने के बाद शुरू हुई।
2026 का चीन भी 2019 वाला चीन नहीं है
2019 के बाद चीन का भू-राजनीतिक माहौल भी काफी बदल चुका है। अमेरिका और चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा तेज हुई है। टेक्नोलॉजी प्रतिबंध, सप्लाई चेन में बदलाव और सेमीकंडक्टर, मैन्युफैक्चरिंग तथा महत्वपूर्ण तकनीकों को लेकर प्रतिस्पर्धा वैश्विक अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा बन चुकी है।
चीन ने ग्लोबल साउथ, ब्रिक्स और ज्यादा बहुध्रुवीय अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर भी ज्यादा जोर दिया है। ब्राजील, रूस, भारत और चीन से शुरू हुआ ब्रिक्स अब 11 सदस्य देशों और 10 पार्टनर देशों वाला समूह है। इससे चीन को एशिया, अफ्रीका, मध्य पूर्व और लैटिन अमेरिका की विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के साथ जुड़ने के लिए बड़ा मंच मिला है। हालांकि, ब्रिक्स में चीन का बढ़ता प्रभाव यह नहीं बताता कि सभी सदस्य देश बीजिंग के रणनीतिक उद्देश्यों से सहमत हैं। भारत इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है।
2019 के मुकाबले भारत भी काफी बदल चुका है
भारत ने अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को और मजबूत किया है। इसके साथ ही रूस और अन्य गैर-पश्चिमी देशों के साथ भी संबंध बनाए रखे हैं। क्वाड भारत की हिंद-प्रशांत रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। भारत ने खाड़ी, यूरोप और व्यापक ग्लोबल साउथ के साथ भी अपना जुड़ाव बढ़ाया है।
हालांकि, नई दिल्ली लगातार यह स्पष्ट करती रही है कि इन साझेदारियों का मतलब चीन के खिलाफ किसी गुट में शामिल होना नहीं है। यहीं भारत की रणनीतिक स्वायत्तता महत्वपूर्ण हो जाती है।
2019 के एक भाषण में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भारत की विदेश नीति को एक साथ कई रिश्तों को संभालने की नीति के तौर पर बताया था। उन्होंने क्वाड और एससीओ जैसे मंचों के बीच दिखने वाले विरोधाभासों तथा अमेरिका, रूस, ईरान, सऊदी अरब और अन्य देशों के साथ भारत के रिश्तों का उदाहरण दिया था। उनका तर्क था कि भारत का लक्ष्य कठोर गुटबंदी से आगे बढ़कर उन क्षेत्रों पर ध्यान देना है, जहां हितों में समानता हो। 2020 के बाद यह सोच और महत्वपूर्ण हो गई है।
आज भारत एक साथ कई लक्ष्य साधना चाहता है:
- अमेरिका के साथ सहयोग, लेकिन चीन के खिलाफ अमेरिकी सहयोगी बने बिना
- रूस के साथ रिश्ते, लेकिन मॉस्को पर निर्भर हुए बिना
- ब्रिक्स में भागीदारी, लेकिन उसे पश्चिम विरोधी समूह बनाए बिना
- चीन के साथ बातचीत, लेकिन एशिया में चीनी वर्चस्व स्वीकार किए बिना
यही वह बदला हुआ भारत है, जहां शी जिनपिंग लौट रहे हैं। भारत और चीन के राजनीतिक रिश्तों में भले ही गिरावट आई हो, लेकिन आर्थिक संबंध खत्म नहीं हुए। बल्कि यही रिश्ते दोनों देशों के संबंधों का एक बड़ा विरोधाभास हैं।


