तो क्या कसाब और हाफिज सईद जैसों को भी जमानत दे देंगे? सरकार का SC से तीखा सवाल

लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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सुप्रीम कोर्ट में UAPA के तहत जमानत पर बड़ी बहस। केंद्र सरकार ने पूछा- क्या ट्रायल में देरी होने पर अजमल कसाब और हाफिज सईद जैसे खूंखार आतंकियों को भी बेल मिल जाती? जानें पूरा मामला और सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बेंच का अपडेट।

तो क्या कसाब और हाफिज सईद जैसों को भी जमानत दे देंगे? सरकार का SC से तीखा सवाल

सुप्रीम कोर्ट में इन दिनों आतंकवाद निरोधी कानून 'UAPA' के तहत जमानत के नियमों को लेकर एक बड़ी बहस छिड़ी हुई है। केंद्र सरकार ने कोर्ट में एक बेहद कड़ा सवाल उठाया है- 'क्या ट्रायल में देरी के आधार पर अजमल कसाब या हाफिज सईद जैसे खूंखार आतंकियों को भी जमानत दी जा सकती है?' इस मामले का सीधा असर भारत की न्याय प्रणाली और जेलों में बंद उन सैकड़ों विचाराधीन कैदियों पर पड़ेगा, जो सालों से UAPA के तहत बिना सजा के जेल काट रहे हैं। यह बहस राष्ट्रीय सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच एक नई लकीर खींचेगी।

क्या है पूरा मामला और केंद्र की दलील?

सुप्रीम कोर्ट की दो अलग-अलग बेंचों ने UAPA आरोपियों की जमानत को लेकर विपरीत राय दी है। हाल ही में एक बेंच ने कहा था कि मुकदमे (Trial) में लंबी देरी होने पर आरोपियों को जमानत मिलनी चाहिए। इसी निष्कर्ष पर आपत्ति जताते हुए केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) एसवी राजू ने कोर्ट में कड़ा तर्क दिया। उन्होंने कहा कि ट्रायल में देरी के आधार पर सभी को एक ही चश्मे से नहीं देखा जा सकता।

"अजमल कसाब के मामले में बड़ी संख्या में गवाह थे, जिससे ट्रायल में देरी हुई। तो क्या आप उसे सिर्फ देरी के आधार पर जमानत दे देंगे? अगर हाफिज सईद को पाकिस्तान से लाया जाए और सबूत जुटाने के कारण ट्रायल में 5 साल लग जाएं, तो क्या उसे भी जमानत मिल जाएगी?" - एसवी राजू, ASG (सुप्रीम कोर्ट में)

अपराध की गंभीरता और भूमिका है अहम

ASG राजू ने जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पीबी वराले की बेंच के सामने स्पष्ट किया कि जमानत देते समय अपराध की गंभीरता और उसमें आरोपी की भूमिका को जरूर देखा जाना चाहिए।

उन्होंने 2020 के दिल्ली दंगा मामले का उदाहरण दिया। कोर्ट ने इस मामले में 5 आरोपियों को जमानत दी थी, लेकिन उमर खालिद और शरजील इमाम जैसे आरोपियों को उनकी गंभीर भूमिका के चलते राहत नहीं दी थी। इसे महज एक गणितीय फॉर्मूले की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट की दो बेंचों में मतभेद

UAPA के तहत जमानत के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट की ही दो बेंचों के फैसले आपस में टकरा रहे हैं। इसी वजह से यह विवाद इतना गहरा गया है। इसे समझने के लिए नीचे दी गई टेबल देखें:

बेंच (जज)मामलामुख्य टिप्पणी
जस्टिस बीवी नागरत्ना और उज्ज्वल भुइयांसैयद इफ्तिखार अंद्राबी केस (मई 2026)ट्रायल में लंबी देरी और जेल में लंबा समय बिताना जमानत का मजबूत आधार है। 'जेल अपवाद है, बेल नियम है' का सिद्धांत यहां भी लागू होता है।
जस्टिस अरविंद कुमार और पीबी वरालेदिल्ली दंगा केस / उमर खालिद (जनवरी 2026)केवल लंबी कैद को जमानत का 'गणितीय फॉर्मूला' नहीं बनाया जा सकता। आरोपी की भूमिका और अपराध की गंभीरता देखना अनिवार्य है।

अब 'बड़ी बेंच' करेगी इस विवाद का फैसला

इस मतभेद को हमेशा के लिए सुलझाने के लिए जस्टिस अरविंद कुमार और पीबी वराले की बेंच ने 22 मई 2026 को इस मामले को सुप्रीम कोर्ट की एक 'बड़ी बेंच' के पास भेज दिया है।

अब चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) इस कानूनी सवाल के लिए एक नई बेंच का गठन करेंगे। हालांकि, इस बीच कोर्ट ने 2020 दिल्ली दंगों के दो अन्य आरोपियों (तस्लीम अहमद और खालिद सैफी) को मामले के निपटारे तक 6 महीने की अंतरिम जमानत दे दी है।

UAPA मामलों की टाइमलाइन

इस कानूनी विवाद की जड़ें पिछले कुछ सालों के बड़े फैसलों से जुड़ी हैं।

2021 (केए नजीब केस): सुप्रीम कोर्ट की 3 जजों की बेंच ने ऐतिहासिक फैसला दिया था। इसमें माना गया कि अगर ट्रायल में बहुत ज्यादा देरी हो रही है, तो मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 21) के तहत UAPA में भी जमानत दी जा सकती है।

जनवरी 2026: दिल्ली दंगों के आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका इसी आधार पर खारिज हुई कि उनका अपराध गंभीर था और केवल समय बीतने पर जमानत नहीं मिल सकती।

मई 2026 (अंद्राबी केस): दूसरी बेंच ने कहा कि ट्रायल में देरी होने पर जमानत मिलनी ही चाहिए, जिससे यह मौजूदा विरोधाभास पैदा हुआ।

22 मई 2026: सुप्रीम कोर्ट ने जमानत के इस अहम मामले को अंतिम और स्पष्ट फैसले के लिए 'लार्जर बेंच' के पास रेफर कर दिया।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Q1: UAPA क्या है?

Ans: UAPA का पूरा नाम 'गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम' (Unlawful Activities Prevention Act) है। यह भारत का सबसे प्रमुख आतंकवाद निरोधी कानून है, जिसका मुख्य उद्देश्य देश की संप्रभुता और अखंडता को खतरे में डालने वाली आतंकी गतिविधियों को रोकना है।

Q2: UAPA की धारा 43D(5) क्या कहती है?

Ans: यह धारा UAPA के तहत जमानत के नियमों को बेहद सख्त बनाती है। इसके अनुसार, अगर जांच एजेंसी (जैसे NIA या पुलिस) द्वारा पेश किए गए दस्तावेजों को देखकर कोर्ट को लगता है कि आरोप 'प्रथम दृष्टया सही' (Prima Facie True) हैं, तो आरोपी को किसी भी हाल में जमानत नहीं दी जा सकती।

Q3: क्या UAPA में जमानत मिलना बिल्कुल असंभव है?

Ans: असंभव नहीं है, लेकिन बहुत मुश्किल है। सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों के अनुसार, यदि मुकदमे (Trial) में बेवजह बहुत ज्यादा समय लग रहा हो और कैदी लंबे समय से बिना सजा के जेल में हो, तो उसे मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 21) के तहत राहत दी जा सकती है।

Q4: अजमल कसाब और हाफिज सईद का जिक्र कोर्ट में क्यों हुआ?

Ans: केंद्र सरकार के वकील ने यह समझाने के लिए इनका उदाहरण दिया कि आतंकवाद जैसे गंभीर मामलों में 'सिर्फ मुकदमे में देरी' को जमानत का ग्राउंड नहीं बनाया जा सकता। सरकार का तर्क है कि अगर ऐसा हुआ, तो खूंखार आतंकी भी इस नियम का फायदा उठाकर जेल से बाहर आ सकते हैं।

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Amit Kumar

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डिजिटल पत्रकारिता की बदलती लहरों के बीच समाचारों की तह तक जाने की ललक अमित कुमार को इस क्षेत्र में खींच लाई। समकालीन राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर पैनी नजर रखने के साथ-साथ अमित को जटिल विषयों के गूढ़ विश्लेषण में गहरी रुचि है। उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के रहने वाले अमित को मीडिया जगत में एक दशक का अनुभव है। वे पिछले 4 वर्षों से लाइव हिन्दुस्तान में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।


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अमित ने देश के प्रतिष्ठित भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा और गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय से जनसंचार में मास्टर डिग्री हासिल की है। उन्होंने यूनिसेफ और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से हेल्थ जर्नलिज्म का सर्टिफिकेशन भी प्राप्त किया है। एआई-असिस्टेड कंटेंट ऑप्टिमाइजेशन और एडिटोरियल प्लानिंग में उनकी विशेषज्ञता उन्हें आज के आधुनिक न्यूज रूम के लिए एक अनिवार्य स्तंभ बनाती है। पेशेवर जीवन से इतर, अमित एक जुनूनी घुमक्कड़ हैं जिन्हें हार्डकोर ट्रेकिंग और फोटोग्राफी का शौक है, साथ ही वे ऐतिहासिक और वास्तविक जीवन पर आधारित सिनेमा देखने के भी शौकीन हैं।

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