11 साल में सबसे खराब मॉनसून की भविष्यवाणी! महंगाई का खतरा, क्या-क्या हो सकता है महंगा?

लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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भारत में 2026 का मॉनसून 11 साल में सबसे कमजोर रहने का अनुमान है। अल नीनो के कारण कृषि, खाद्य कीमतों और आर्थिक विकास पर संकट मंडरा रहा है। जानिए इसका आपकी जेब और खेती पर क्या असर होगा।

11 साल में सबसे खराब मॉनसून की भविष्यवाणी! महंगाई का खतरा, क्या-क्या हो सकता है महंगा?

भारत सरकार ने 2026 के लिए अल नीनो के प्रभाव के कारण कमजोर मॉनसून का अनुमान जताया है। इसके चलते इस साल पिछले 11 वर्षों में सबसे कम बारिश होने की आशंका है। दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के लिए यह एक बड़ी चिंता का विषय है, क्योंकि देश पहले से ही ईरान युद्ध के कारण उत्पन्न हुई महंगाई की मार झेल रहा है। इस कमजोर मॉनसून का सीधा असर फसलों, खाने-पीने की चीजों की कीमतों और देश के आर्थिक विकास पर पड़ सकता है।

मॉनसून का महत्व क्यों है ज्यादा?

भारत के महत्वपूर्ण जल स्रोतों को भरने और खेती के लिए सालाना होने वाली कुल बारिश का लगभग 70% हिस्सा मानसून से ही आता है। देश की करीब आधी खेती के लिए सिंचाई की पक्की सुविधा नहीं है, यानी ये खेत पूरी तरह बारिश पर निर्भर हैं। साथ ही, देश की लगभग आधी आबादी अपनी आजीविका के लिए खेती-किसानी पर ही निर्भर है।

अर्थव्यवस्था और महंगाई पर खतरा

रॉयटर्स से बात करते हुए आईडीएफसी फर्स्ट बैंक की मुख्य अर्थशास्त्री गौरा सेनगुप्ता ने बताया कि खासकर जुलाई और अगस्त के मुख्य महीनों में कम बारिश के कारण महंगाई का दबाव बढ़ सकता है। अगर खाने-पीने की चीजें महंगी हुईं, तो महंगाई दर बढ़कर औसतन 5.5% तक पहुंच सकती है।

अप्रैल के महीने में भारत की खुदरा महंगाई दर 3.48% थी। हालांकि, मध्य पूर्व में चल रहे तनाव के कारण तेल और ऊर्जा की कीमतों पर अनिश्चितता बनी हुई है।

बारिश के आंकड़े और नया पूर्वानुमान

पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव एम. रविचंद्रन के अनुसार, इस साल मॉनसून लंबी अवधि के औसत (LPA) का 90% रहने की उम्मीद है। यह अप्रैल में लगाए गए 92% के अनुमान से कम है।

यह 2015 के बाद का सबसे कमजोर मॉनसून होगा। 2015 में भी अल नीनो के कारण सिर्फ 87% बारिश हुई थी। जून के महीने में औसत से कम (92% से भी कम) बारिश होने का अनुमान है। मौसम विभाग (IMD) 50 साल के औसत (जो कि 87 सेंटीमीटर है) के 96% से 104% के बीच होने वाली बारिश को 'सामान्य' मानता है।

अल नीनो क्या है?

अल नीनो मौसम से जुड़ी एक घटना है जिसमें मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर के पानी का तापमान सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। इसके कारण दक्षिण-पूर्व एशिया और अन्य कई क्षेत्रों में मौसम गर्म और सूखा हो जाता है। इस साल मॉनसून के दूसरे हिस्से (उत्तरार्ध) में अल नीनो का प्रभाव मध्यम से लेकर काफी तेज होने की संभावना है।

खेती और ग्रामीण जीवन पर संभावित असर

भारत के पास चावल और गेहूं जैसे प्रमुख खाद्यान्नों का पर्याप्त भंडार मौजूद है। अगर बारिश सही तरीके से नहीं होती है, तो देश की 1.4 अरब आबादी के उस बड़े हिस्से (लगभग दो-तिहाई) की आय कम हो सकती है, जो गांवों में रहता है। गांवों में लोगों की कमाई घटने से मोटरसाइकिल और फ्रिज जैसे कंज्यूमर गुड्स (उपभोक्ता वस्तुओं) की बिक्री में भी गिरावट आती है।

किन फसलों को है खतरा

फिलिप कैपिटल इंडिया की कमोडिटी रिसर्च की उपाध्यक्ष अश्विनी बंसोड़ के अनुसार, कम बारिश से दालों, कपास, खाने वाले तिलहन और मक्के जैसी फसलों की शुरुआती बुवाई पर बुरा असर पड़ सकता है। उत्तर और उत्तर-पश्चिमी राज्यों के बिना सिंचाई वाले इलाकों में धान की फसल भी खतरे में पड़ सकती है।

भारत की वैश्विक स्थिति

भारत दुनिया में चावल और प्याज का सबसे बड़ा निर्यातक (बेचने वाला) है और चीनी का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। इसके अलावा, भारत अपनी जरूरत का लगभग दो-तिहाई खाद्य तेल आयात (खरीदता) करता है। मॉनसून के खराब होने से इन सभी वैश्विक व्यापारिक समीकरणों पर भी असर पड़ने की संभावना है।

कमजोर मॉनसून और मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों (जैसे अंतरराष्ट्रीय तनाव और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें) के कारण कई जरूरी चीजों के दाम बढ़ने की आशंका है। मुख्य रूप से ये चीजें महंगी हो सकती हैं:

अनाज और दालें

कम बारिश का सबसे सीधा असर खेती पर पड़ता है। बारिश पर निर्भर रहने वाले इलाकों में धान (चावल), मक्का और अन्य मोटे अनाजों की पैदावार घट सकती है। इसके अलावा, अरहर, उड़द और मूंग जैसी दालों की बुवाई और उत्पादन प्रभावित होने से इनकी कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं।

खाद्य तेल

भारत खाद्य तेलों का बड़ा आयातक है, लेकिन घरेलू स्तर पर भी सोयाबीन, सरसों और अन्य तिलहन की फसल कमजोर मानसून से प्रभावित होती है। उत्पादन घटने से सरसों का तेल, सोयाबीन ऑयल और रिफाइंड तेल महंगा हो सकता है।

सब्जियां

मॉनसून की देरी या असमान बारिश के कारण सब्जियों की फसल खराब होती है। पानी की कमी और अत्यधिक गर्मी से मंडियों में सब्जियों की सप्लाई कम हो जाती है, जिससे टमाटर, प्याज, आलू और हरी सब्जियों की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है।

चीनी

गन्ने की फसल को बहुत अधिक पानी की जरूरत होती है। महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक जैसे प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में अगर बारिश कम होती है, तो गन्ने की पैदावार गिरेगी, जिससे आने वाले समय में चीनी के दाम बढ़ सकते हैं।

दूध, अंडे और पोल्ट्री

कमजोर मानसून के कारण जानवरों के लिए चारे और पानी का संकट पैदा हो जाता है। चारे की कमी और गर्मी के तनाव से पशुओं की उत्पादकता घटती है, जिसके कारण दूध, अंडे और मीट जैसी चीजों की कीमतों में भी वृद्धि देखी जा सकती है।

रोजमर्रा की वस्तुएं

खेती के अलावा महंगाई का एक बड़ा कारण ट्रांसपोर्टेशन यानी माल ढुलाई का महंगा होना है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें ऊंची बनी हुई हैं, जिससे पेट्रोल और डीजल के दाम पर दबाव है। जब ट्रांसपोर्ट का खर्च बढ़ता है, तो साबुन, टूथपेस्ट, पैकेज्ड फूड से लेकर कपड़े और रोजमर्रा के इस्तेमाल की हर छोटी-बड़ी चीज के दाम बढ़ जाते हैं।

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Amit Kumar

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डिजिटल पत्रकारिता की बदलती लहरों के बीच समाचारों की तह तक जाने की ललक अमित कुमार को इस क्षेत्र में खींच लाई। समकालीन राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर पैनी नजर रखने के साथ-साथ अमित को जटिल विषयों के गूढ़ विश्लेषण में गहरी रुचि है। उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के रहने वाले अमित को मीडिया जगत में एक दशक का अनुभव है। वे पिछले 4 वर्षों से लाइव हिन्दुस्तान में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।


अमित न केवल समाचारों के त्वरित प्रकाशन में माहिर हैं, बल्कि वे खबरों के पीछे छिपे 'क्यों' और 'कैसे' को विस्तार से समझाने वाले एक्सप्लेनर लिखने में भी विशेष रुचि रखते हैं। डिजिटल पत्रकारिता के नए आयामों, जैसे कि कीवर्ड रिसर्च, ट्रेंड एनालिसिस और एआई-असिस्टेड कंटेंट ऑप्टिमाइजेशन को वे बखूबी समझते हैं। उनकी पत्रकारिता की नींव 'फैक्ट-चेकिंग' और सत्यापन पर टिकी है। एक मल्टीमीडिया पत्रकार के तौर पर अमित का सफर देश के प्रतिष्ठित संस्थानों के साथ रहा है। उन्होंने अमर उजाला, वन इंडिया, इंडिया टीवी और जी न्यूज जैसे बड़े मीडिया घरानों के साथ काम किया है।


अमित ने देश के प्रतिष्ठित भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा और गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय से जनसंचार में मास्टर डिग्री हासिल की है। उन्होंने यूनिसेफ और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से हेल्थ जर्नलिज्म का सर्टिफिकेशन भी प्राप्त किया है। एआई-असिस्टेड कंटेंट ऑप्टिमाइजेशन और एडिटोरियल प्लानिंग में उनकी विशेषज्ञता उन्हें आज के आधुनिक न्यूज रूम के लिए एक अनिवार्य स्तंभ बनाती है। पेशेवर जीवन से इतर, अमित एक जुनूनी घुमक्कड़ हैं जिन्हें हार्डकोर ट्रेकिंग और फोटोग्राफी का शौक है, साथ ही वे ऐतिहासिक और वास्तविक जीवन पर आधारित सिनेमा देखने के भी शौकीन हैं।

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