Explainer: सस्ता रूसी तेल अब भारत को पड़ेगा महंगा? अमेरिका के 100% 'ट्रंप टैरिफ' का कितना असर; जानें

लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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सस्ता रूसी तेल अब भारत को महंगा पड़ सकता है। अमेरिकी सीनेटरों ने मंगलवार को नया बिल पेश कर भारत, चीन समेत पांच देशों पर रूस से तेल खरीद जारी रखने के लिए 100 प्रतिशत ट्रंप टैरिफ लगाने का प्रस्ताव दिया है…

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अमेरिका में भारत समेत रूस से तेल आयात करने वाले देशों पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने का नया प्रस्ताव सामने आया है। मंगलवार को अमेरिकी सीनेटरों के एक समूह ने संशोधित बिल पेश किया, जिसमें भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान पर रूसी तेल खरीद जारी रखने पर भारी टैरिफ लगाने की बात कही गई है। यह अमेरिका की ओर से रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर सजा देने की कोशिशों में नई कड़ी है। गौरतलब है कि पिछले साल वॉशिंगटन ने भारत पर रूसी कच्चे तेल के आयात पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगाया था, जिसे बाद में फरवरी में वापस ले लिया गया था।

बिल में क्या है?

संशोधित बिल में एक महत्वपूर्ण प्रावधान जोड़ा गया है, जिसमें राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को राष्ट्रीय हित में सैंक्शन से छूट देने का अधिकार दिया गया है। दिवंगत सीनेटर लिंडसे ग्राहम के नेतृत्व वाले इस कानून में 15 यूरोपीय देशों को छूट दी गई है, जो रूसी गैस का आयात जारी रखे हुए हैं। इन देशों को इसलिए छूट मिली है क्योंकि रूसी सप्लाई उनकी कुल जरूरतों का बहुत छोटा हिस्सा है और वे मॉस्को पर निर्भरता कम करने की दिशा में काम कर रहे हैं।

कनेक्टिकट के डेमोक्रेटिक सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने कहा कि इसे टैरिफ बिल कहा जा रहा है, लेकिन असल में यह रूस की अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्से पर लगाम लगाने वाला कदम है, जिसमें उसकी ऊर्जा, वित्तीय, रक्षा उद्योग, अमीर कारोबारी और खुद राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन शामिल हैं। अगर यह कानून पास होता है तो यह पहला मौका होगा जब अमेरिकी कांग्रेस टैरिफ को उन देशों को सजा देने के औजार के रूप में इस्तेमाल करने की मंजूरी देगी जो दूसरे देश की जंग को वित्तीय मदद पहुंचाते हैं। बिल के प्रायोजकों को राष्ट्रपति ट्रंप का समर्थन मिलने की उम्मीद है, हालांकि सीनेट में वोटिंग का समय अभी तय नहीं है।

वैश्विक तेल बाजार पर क्या असर?

केप्लर के मॉडलिंग और रिफाइनिंग लीड एनालिस्ट सुमित रिटोलिया ने कहा कि प्रस्तावित टैरिफ का आकलन अत्यधिक अस्थिर वैश्विक तेल बाजार को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। रूसी क्रूड ने अब तक बाजार को स्थिर रखने में मदद की है। रिटोलिया ने चेतावनी दी कि अगर 100 प्रतिशत या कोई भी सेकेंडरी टैरिफ लागू होता है और रूसी क्रूड की खरीद में बड़ी कमी आती है, तो सवाल उठेगा कि रिप्लेसमेंट बैरल कहां से आएंगे? स्पेयर प्रोडक्शन क्षमता सीमित होने, होर्मुज स्ट्रेट में जोखिम बने रहने और वैकल्पिक सप्लाई कम होने के कारण बिना कीमतों में तेज उछाल के रूसी वॉल्यूम को बदलना बेहद मुश्किल होगा।

भारत के लिए क्या मायने रखता है?

भारत के लिए रूसी क्रूड ऊर्जा सुरक्षा की मजबूत ढाल साबित हुआ है, खासकर मिडिल ईस्ट तनाव के बाद। रिटोलिया के अनुसार, रूसी सप्लाई ने भारतीय रिफाइनरियों को उच्च क्षमता पर चलाने, ईंधन की निर्बाध उपलब्धता बनाए रखने और एशिया के अन्य रिफाइनिंग सिस्टम में देखी गई सप्लाई रुकावटों से बचने में मदद की है। जून में भारत का रूसी तेल आयात बढ़कर करीब 2.6 मिलियन बैरल प्रतिदिन (mbd) हो गया, जो कुल क्रूड आयात का 50 प्रतिशत से अधिक है। जुलाई में भी आयात मजबूत बना हुआ है। रिटोलिया ने कहा कि मौजूदा बाजार स्थितियों में रूसी क्रूड भारतीय रिफाइनरों के लिए सबसे व्यावहारिक और प्रतिस्पर्धी स्रोत बना हुआ है। इतनी बड़ी मात्रा को जल्दी सिस्टम से हटाना मुश्किल है।

भारत को चिंता करने की जरूरत है?

ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के संस्थापक अजय श्रीवास्तव का मानना है कि भारत को इस प्रस्ताव को लेकर ज्यादा चिंतित होने की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा कि मूल बिल 15 महीने से सीनेट में लंबित था, जो दर्शाता है कि इतने बड़े टैरिफ के लिए कांग्रेस में समर्थन सीमित था। संशोधित बिल का भी यही हश्र हो सकता है। श्रीवास्तव ने अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि रेसिप्रोकल टैरिफ और सेक्शन 122 टैरिफ को अमान्य ठहराए जाने से कानूनी बाधाएं और मजबूत हो गई हैं। इसके अलावा, बिल में यूरोपीय देशों और चीन के प्रति दिखाई गई छूट से यह प्रस्ताव कितना चयनात्मक है, यह साफ दिखता है।

हालांकि उन्होंने सलाह दी कि भारत को अपनी ऊर्जा नीति देश के हित और ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखकर बनानी चाहिए। रूसी तेल ने महंगाई पर काबू और स्थिर सप्लाई सुनिश्चित करने में अहम भूमिका निभाई है। इस बिल के कानून बनने और लागू होने की संभावना कम है। अगर फिर भी ऐसा होता है, तो भारत को चीन की तरह रूसी तेल खरीद जारी रखनी चाहिए, न कि बाहरी दबाव को अपनी नीति तय करने देना चाहिए।

Devendra Kasyap

लेखक के बारे में

Devendra Kasyap

देवेन्द्र कश्यप पिछले 13 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अगस्त 2025 से वह लाइव हिन्दुस्तान (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) में चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं। संस्थान की होम टीम का वह एक अहम हिस्सा हैं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर उनकी पैनी नजर रहती है। वायरल कंटेंट के साथ-साथ लीक से हटकर और प्रभावशाली खबरों में उनकी विशेष रुचि है।

देवेन्द्र ने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत वर्ष 2013 में महुआ न्यूज से की। करियर के शुरुआती दौर में उन्होंने बिहार की राजधानी पटना में रिपोर्टिंग की। इस दौरान राजनीति के साथ-साथ क्राइम और शिक्षा बीट पर भी काम किया। इसके बाद उन्होंने जी न्यूज (बिहार-झारखंड) में अपनी सेवाएं दीं। वर्ष 2015 में ईनाडु इंडिया के साथ डिजिटल मीडिया में कदम रखा। इसके बाद राजस्थान पत्रिका, ईटीवी भारत और नवभारत टाइम्स ऑनलाइन जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में कार्य किया।

मूल रूप से बिहार के भोजपुरी बेल्ट रोहतास जिले के रहने वाले देवेन्द्र कश्यप ने अपनी प्रारंभिक और उच्च शिक्षा पटना से प्राप्त की। उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातक की डिग्री हासिल की और MCU भोपाल से पत्रकारिता में डिप्लोमा किया। वर्तमान में वह उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में प्रवास कर रहे हैं।

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