
पुराने फैसलों को पलटने का ट्रेंड बढ़ रहा, अपनी ही बेंचों से नाराज SC; पूर्व CJI ने भी किया था ये काम
दिलचस्प बात यह है कि पूर्व CJI गवई की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने हाल ही में वनशक्ति बनाम भारत संघ मामले में दिए गए फैसले को पलट दिया, जिसमें असाधारण मामलों में कार्योत्तर पर्यावरणीय मंजूरी देने की अनुमति दी गई।
देश की सर्वोच्च अदालत में बदलती पीठों द्वारा पहले से सुनाए गए फैसलों को चुनौती देने की बढ़ती प्रवृत्ति पर सुप्रीम कोर्ट की दो न्यायाधीशों वाली पीठ ने बुधवार को गंभीर चिंता जताई। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा कि यह ट्रेंड न केवल सुप्रीम कोर्ट की प्रतिष्ठा और अधिकार को कमजोर करती है, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 141 की भावना के भी विपरीत है। पीठ ने कहा कि फैसले को अंतिम तौर पर बरकरार रखने से न केवल अंतहीन मुकदमेबाजी को रोका जा सकेगा, बल्कि न्यायपालिका में जनता का विश्वास भी कायम रहेगा।
फैसला अंतिम होना चाहिए, वरना अनुच्छेद 141 का क्या अर्थ?- कोर्ट
पीठ ने कहा कि हाल के दिनों में देखा जा रहा है कि एक पीठ द्वारा सुनाए गए फैसलों को कुछ समय बाद दूसरी पीठों द्वारा पलट दिया जाता है, चाहे वह न्यायाधीश सेवा में हों या सेवानिवृत्त हो चुके हों। अदालत ने इसे चिंताजनक और दर्दनाक बताया। न्यायमूर्ति दत्ता ने कहा- अनुच्छेद 141 का उद्देश्य यही है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा घोषित कानून अंतिम हो और सभी अदालतें उसका पालन करें। लेकिन यदि कोई फैसला सिर्फ इसलिए फिर से खोला जाए कि बाद में कोई दूसरी राय बेहतर लगती है, तो अनुच्छेद 141 का उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा।
बेल शर्तों में ढील की अर्जी खारिज
यह टिप्पणी पश्चिम बंगाल निवासी और हत्या के एक आरोपी एस के मोहम्मद अनिसुर रहमान की याचिका पर सुनवाई के दौरान आई। रहमान राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी की हत्या के आरोप में गिरफ्तार हुआ था। 3 जनवरी को जस्टिस ए एस ओका (अब सेवानिवृत्त) और जस्टिस मसीह की पीठ ने उसे सशर्त जमानत दी थी, जिसमें यह शर्त भी शामिल थी कि वह कोलकाता से बाहर नहीं जाएगा। इसके बाद आरोपी ने इस शर्त में छूट के लिए आवेदन किया, जिसे 5 मई को जस्टिस ओका की अध्यक्षता वाली बेंच ने खारिज कर दिया। फिर 8 अगस्त को तीसरी बार आवेदन दाखिल किया गया- ठीक उस वक्त जब जस्टिस ओका रिटायर हो चुके थे।
सेवानिवृत्ति के बाद फिर नई अर्जी- कोर्ट ने कहा ‘मकसद साफ दिख रहा है’
जस्टिस दत्ता की पीठ ने बताया कि आरोपी ने 8 अगस्त को एक बार फिर जमानत की शर्तों में संशोधन के लिए याचिका दाखिल की- यह वह समय था जब जस्टिस ओका सेवानिवृत्त हो चुके थे। अदालत ने कहा- इस नई अर्जी का उद्देश्य स्पष्ट है। इसे बदलती पीठ का लाभ उठाने और अलग नतीजे की उम्मीद में फाइल किया गया है। पीठ ने कहा कि असल परिस्थितियों में कोई महत्वपूर्ण बदलाव नहीं हुआ, इसलिए याचिका में कोई दम नहीं है।
हम उस रास्ते पर नहीं चलेंगे- सुप्रीम कोर्ट
अपनी टिप्पणी में न्यायालय ने संकेत दिया कि कई मामलों में देखा जा रहा है कि नए न्यायाधीशों वाली पीठें पुराने फैसलों को पलट रही हैं। अदालत ने इसे न्याय व्यवस्था के लिए नुकसानदायक बताते हुए कहा कि गहरी असंतुष्टि और खेद के साथ हम कहते हैं कि हम इस रास्ते पर नहीं चलना चाहते। पीठ ने स्पष्ट किया कि सिर्फ पीठ की संरचना बदलने से न्याय हासिल नहीं होता और लगातार फैसलों की समीक्षा से सर्वोच्च अदालत की गरिमा कम होती है।
पीठ ने कहा- हमने इस न्यायालय (जिसका हम भी एक अभिन्न अंग हैं) में एक ऐसी बढ़ती प्रवृत्ति को पाया है कि जिसमें न्यायाधीशों, चाहे वे अभी भी पद पर हों या नहीं, द्वारा सुनाए गए फैसलों और चाहे निर्णय सुनाए जाने के बाद से कितना भी समय बीत गया हो, उन्हें बाद की पीठों या विशेष रूप से गठित पीठों द्वारा किसी ऐसे पक्ष के कहने पर पलट दिया जाता है, जो पहले के फैसलों से व्यथित हो।
शीर्ष अदालत ने कहा कि हालांकि यह प्राथमिक बात है, लेकिन इस बात को फिर से कहने की आवश्यकता है कि न्यायिक निर्णयों की पवित्रता और अंतिमता को बनाए रखना कानून के शासन के लिए मौलिक है। इसने कहा कि बाद की पीठों के समक्ष चुनौती का एक और दौर शुरू करने की संभावना, यह उम्मीद करते हुए कि संरचना में बदलाव से अलग परिणाम निकलेगा, इस न्यायालय के अधिकार और इसके निर्णयों के मूल्य को कमजोर करेगा।
दिलचस्प बात यह है कि पूर्व प्रधान न्यायाधीश बी आर गवई की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने हाल ही में वनशक्ति बनाम भारत संघ मामले में दिए गए फैसले को पलट दिया, जिसमें असाधारण मामलों में कार्योत्तर पर्यावरणीय मंजूरी देने की अनुमति दी गई। न्यायमूर्ति अभय एस ओका (अब सेवानिवृत्त) ने मई 2025 में केंद्र सरकार की कार्योत्तर पर्यावरणीय मंजूरी देने की प्रथा को रद्द कर दिया था।
हाल ही में, पूर्व प्रधान न्यायाधीश गवई की अध्यक्षता वाली एक संविधान पीठ ने राष्ट्रपति के एक संदर्भ का उत्तर देते हुए कहा कि राज्यपाल राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों पर अनिश्चित काल तक रोक नहीं लगा सकते, जिसमें यह सवाल उठाया गया था कि क्या अदालतें संवैधानिक प्राधिकारियों के लिए समय सीमा तय कर सकती हैं। आठ अप्रैल को, न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति को भेजे गए राज्य विधेयकों को मंजूरी देने या न देने का निर्णय लेने के लिए तीन महीने की समयसीमा तय की थी।
(इनपुट एजेंसी)





